भारत और फ्रांस की दोस्ती अब सिर्फ राफेल विमानों या रणनीतिक समझौतों तक नहीं सीमित रही है बल्कि अब यह दिलों और आस्था के उस मुकाम पर पहुंच गई है जिसका गवाह बनेगा फ्रांस का पहला भव्य हिंदू मंदिर। सितंबर 2026 यह वह तारीख है जब फ्रांस की धरती पर इतिहास रचा जाएगा। पेरिस से महज 30 किमी दूर बसी सेंट जॉर्ज में बीएपीएस स्वामी नारायण हिंदू मंदिर का भव्य उद्घाटन होने जा रहा है। पूरे भारत के लिए गर्व की बात है और 50 साल से भी ज्यादा का इंतजार अब खत्म होने वाला है। दरअसल इस मंदिर की सबसे खास बात जानते हैं क्या है? वो यह है कि यह सिर्फ ईंट पत्थरों की इमारत नहीं है बल्कि इसमें भारत की 1000 साल पुरानी नक्काशी कला का संगम है। मंदिर के लिए खास पत्थरों को भारत में तराशा गया है। हमारे देश के कुशल कारीगरों ने अपने हाथों से इन पत्थरों पर वो जादू उखेरा है जिसे देख दुनिया दंग रह गई है। इन पत्थरों को भारत से फ्रांस ले जाया गया है और वहां इन्हें मंदिर के ढांचे में पिरोया गया है और यहीं पर भारत और फ्रांस की जुगलबंदी नजर आती है। मंदिर के निर्माण में सिर्फ भारतीय कारीगर ही नहीं बल्कि फ्रांस के वो विशेषज्ञ भी शामिल थे जिन्होंने प्रसिद्ध नोट्रे डाम कैथेड्रल की मरम्मत की है। यानी एक तरफ भारत की प्राचीन शिल्पकला और दूसरी तरफ फ्रांस की मॉडर्न इंजीनियरिंग दोनों ने मिलकर इस दिव्य धाम को तैयार कर लिया है।
महापर्व फेस्टिवल ऑफ कल्चर क्या है?
सितंबर 2026 में जब इस मंदिर के द्वार खुलेंगे तो सिर्फ पूजा अर्चना नहीं होगी वहां। 2 सितंबर से 14 सितंबर तक पूरे 13 दिनों के लिए वहां फेस्टिवल ऑफ कल्चर का आयोजन किया जाएगा। सोचिए पेरिस की हवाओं में जब भारतीय शास्त्री संगीत, लोक कला और हिंदू परंपराओं की गूंज सुनाई देगी तो वो नजारा कैसा होगा। यह उत्सव भारतीय मूल के लोगों के साथ-साथ उन फ्रांसीसी नागरिकों के लिए भी होगा जो भारत की संस्कृति को करीब से समझना चाहते हैं। यह मंदिर फ्रांस में मिनी इंडिया की तरह काम करेगा जहां शिक्षा, कला और सामुदायिक एकता का पाठ पढ़ाया जाएगा। दोस्तों अब आपने यह तो जान लिया लेकिन क्या आप जानते हैं कि फ्रांस में एक भव्य मंदिर बनाने का सपना आज का नहीं है। ये कहानी शुरू होती है 1970 में। करीब 56 साल पहले यह विचार आया था लेकिन जमीन मिलने और निर्माण शुरू होने में दशकों लग गए।
1970 से 2026 एक लंबा और ऐतिहासिक सफर क्या है?
सबसे पहले बात करें 1995 की तो योजना पर गंभीरता से काम शुरू हुआ। 2017 में बुसी सेंट जॉर्ज में मंदिर के लिए जमीन मिली। 2021 में निर्माण की प्रक्रिया में गति पकड़ी गई और फिर साल 2026 में अब उद्घाटन की तैयारी है। यह मंदिर धैर्य और अटूट विश्वास की जीत है। अब बीएपीएस यानी कि बोचासन वासी अक्षर पुरुषोत्तम स्वामी नारायण संस्था। यह नाम आज दुनिया भर में भव्यता और पवित्रता का दूसरा नाम बन चुका है। दिल्ली का अक्षरधाम हो या अमेरिका के विशाल मंदिर बीएपीएस ने दुनिया के 50 से ज्यादा देशों में 1300 से ज्यादा मंदिर बनाकर भारतीय संस्कृति का परचम लहराया है पूरी दुनिया में। अब इसी कड़ी में पेरिस का यह मंदिर भी जुड़ने जा रहा है।
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अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस आदेश को फिलहाल आगे बढ़ने की इजाज़त दे दी है, जिसमें मेल वोटिंग पर रोक लगाने की बात कही गई थी। इस फैसले ने देश के लगभग एक-तिहाई लोगों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले वोटिंग के तरीके पर नई अनिश्चितता पैदा कर दी है, भले ही इससे नवंबर के मध्यावधि चुनावों (मिडटर्म्स) की वोटिंग प्रक्रिया में तुरंत कोई बदलाव न आए। कोर्ट ने यह नहीं कहा कि आदेश कानूनी है। सोमवार को बिना हस्ताक्षर वाले एक फैसले में कोर्ट ने कहा कि डेमोक्रेटिक-शासित राज्यों के लिए जून में ही इस कदम को चुनौती देना जल्दबाजी थी, जब उन्होंने बोस्टन में एक फेडरल जज को नवंबर के चुनाव के लिए इसे रोकने के लिए मना लिया था। इस फैसले ने कानूनी लड़ाई को एक तरह से फिर से शुरू कर दिया है, जबकि शुरुआती वोटिंग की तैयारियां पहले से ही चल रही हैं और नॉर्थ कैरोलिना में विदेशी और सैन्य वोटरों को 4 सितंबर को पहला बैलेट भेजा जाना है।
एक अलग आदेश अभी भी लागू है जो US पोस्टल सर्विस को ट्रंप के निर्देश के अनुसार बदलाव करने से रोकता है। लेकिन प्रशासन ने सोमवार देर रात उस आदेश को हटवाने के लिए कदम उठाए, और पोस्टल सर्विस ने पहले ही नए नियम जारी कर दिए हैं जो कानूनी रास्ता साफ होने पर मंगलवार से लागू हो जाएंगे। नए नियम के तहत मेल बैलेट वाले लिफाफों के लिए खास फॉर्मेटिंग की ज़रूरत है, जिससे कुछ इलाकों को उन्हें पूरी तरह से दोबारा डिज़ाइन करना पड़ सकता है। इसमें राज्यों के लिए एक इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम का इस्तेमाल करना भी ज़रूरी है ताकि पोस्टल सर्विस को पता चल सके कि कौन मेल से वोट कर रहा है। अगर राज्य ऐसा नहीं करते हैं, तो उनके मेल बैलेट नहीं भेजे जाएंगे। आलोचकों का कहना था कि कुछ ही दिनों में इतने बड़े बदलाव करना मुमकिन नहीं है। जस्टिस केतनजी ब्राउन जैक्सन ने अपनी असहमति जताते हुए कहा कि इस फ़ैसले से "आने वाले मध्यावधि चुनावों में बेवजह अफ़रा-तफ़री और अनिश्चितता पैदा होगी। सेंटर फ़ॉर इलेक्शन इनोवेशन एंड रिसर्च' के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर डेविड बेकर ने कहा कि बहुमत का फ़ैसला "मध्यावधि चुनावों से ठीक पहले पूरी तरह अफ़रा-तफ़री पैदा करने वाला लगता है" और राज्यों के लिए इतनी देर से इन नियमों को लागू करना नामुमकिन होगा।
मौके पर मौजूद चुनाव अधिकारियों का कहना है कि समय-सीमा को देखते हुए इसमें किसी भी तरह के बदलाव की गुंजाइश बहुत कम है। कैलिफ़ोर्निया की योलो काउंटी के रजिस्ट्रार और राज्य के चुनाव अधिकारियों के संगठन के अध्यक्ष जेसी सलिनास ने कहा कि कैलिफ़ोर्निया में 11 दिनों में बैलेट भेजे जाने शुरू हो जाएंगे और उनकी काउंटी ने पहले ही अपने लिफ़ाफ़े छपवा लिए हैं। सलिनास ने कहा, "अगर आप समय-सीमा को देखें, तो स्थिति थोड़ी अव्यवस्थित है।" उन्होंने आगे कहा कि उन्हें ठीक-ठीक नहीं पता कि कौन से लिफ़ाफ़े नए नियमों के मुताबिक हैं। उन्होंने आखिरी समय में बड़े बदलाव करने के विचार को खारिज करते हुए कहा मुझे ऐसा करने की क्षमता नहीं दिखती।
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