बलूचिस्तान के अलग-अलग इलाकों - जैसे मस्तुंग, चमन और सोहबतपुर - से पांच शव बरामद किए गए हैं। मस्तुंग ज़िले के खाद कोचा इलाके में एक अज्ञात व्यक्ति का शव मिला। स्थानीय सूत्रों का कहना है कि ऐसा लगता है कि सड़क के किनारे शव को फेंकने से पहले उस व्यक्ति की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। शव को पहले पहचान और कानूनी औपचारिकताओं के लिए शहीद नवाब गौस बख्श रायसानी अस्पताल ले जाया गया और बाद में क्वेटा भेज दिया गया। 'द बलूचिस्तान पोस्ट' की रिपोर्ट के मुताबिक, एक अलग घटना में चमन इलाके से भी एक अज्ञात शव बरामद किया गया और उसे पहचान व ज़रूरी प्रक्रियाओं को पूरा करने के लिए अस्पताल ले जाया गया। सोहबतपुर में स्थानीय प्रशासन ने तीन शव मिलने की पुष्टि की है। 'द बलूचिस्तान पोस्ट' के अनुसार, शवों को अस्पताल भेजा गया, लेकिन खबर लिखे जाने तक उनकी पहचान नहीं हो पाई थी।
ये शव ऐसे समय में मिले हैं जब बलूचिस्तान के कई ज़िलों में अज्ञात शव मिलने की खबरें लगातार आ रही हैं। मानवाधिकार संगठनों और लापता लोगों के रिश्तेदारों ने बार-बार आरोप लगाया है कि जिन लोगों को ज़बरदस्ती गायब किए जाने की बात कही जाती है, उनमें से कुछ बाद में मृत पाए जाते हैं और उनके शव अलग-अलग जगहों पर पड़े मिलते हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, पिछले हफ़्ते पंजगुर के एक अस्पताल में पाँच शव लाए गए थे और बाद में उनकी पहचान उन पुरुषों के तौर पर हुई जिनके लापता होने की पहले सूचना मिली थी। 'द बलूचिस्तान पोस्ट' द्वारा बताए गए परिवार के सदस्यों और स्थानीय सूत्रों के अनुसार, इनमें से दो लोगों को कथित तौर पर 2022 में पाकिस्तानी सेना ने हिरासत में लिया था, जबकि बाकी तीन के भी पहले लापता होने की सूचना थी।
अज्ञात शवों के बार-बार मिलने से लापता लोगों के परिवारों और मानवाधिकार समूहों के बीच बलूचिस्तान में कथित तौर पर लोगों को ज़बरदस्ती गायब करने और उनकी हत्याओं को लेकर चिंता फिर से बढ़ गई है, हालाँकि अधिकारियों ने अभी तक इन ताज़ा मौतों से जुड़े हालात के बारे में सार्वजनिक रूप से कोई जानकारी नहीं दी है।
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ईरान ने सोमवार को संकेत दिया कि हालांकि उसे सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के नेतृत्व वाले 'मक्का समझौते' में शामिल होने का निमंत्रण नहीं मिला है, लेकिन क्षेत्रीय सुरक्षा मुद्दों पर बातचीत के प्रस्ताव ज़रूर दिए गए हैं। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बक़ाई ने आज एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में ये बातें कहीं। उन्होंने कहा हमें मक्का समझौते में शामिल होने का निमंत्रण नहीं मिला है, लेकिन इन देशों के साथ क्षेत्रीय सुरक्षा पर बातचीत के प्रस्ताव ज़रूर आए हैं। मक्का रक्षा समझौते पर 7 अगस्त को मक्का में सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने हस्ताक्षर किए थे। इसका मकसद तीनों देशों के बीच रक्षा सहयोग और सामूहिक प्रतिरोध (deterrence) को मज़बूत करना है। समिट के बयान के अनुसार, तीनों में से किसी भी देश पर सशस्त्र हमला होने पर उसे तीनों देशों पर हमला माना जाएगा।
हालांकि इस समझौते में ऑपरेशन या सैन्य प्रतिबद्धताओं का विस्तार से ज़िक्र नहीं है, लेकिन यह बेहतर रक्षा सहयोग के लिए एक ढांचा तैयार करता है और क्षेत्र व उसके बाहर शांति, स्थिरता और सुरक्षा को अपने व्यापक लक्ष्यों के तौर पर पहचानता है।
यह समझौता पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और संघर्षों के बीच हुआ, जहां यह क्षेत्र कई सुरक्षा चुनौतियों और बढ़ती भू-राजनीतिक अनिश्चितता का सामना कर रहा है। साथ ही अगस्त में पाकिस्तान, तुर्की और सऊदी अरब के बीच हाल ही में बने त्रिपक्षीय रक्षा समझौते पर बात करते हुए बाक़ाई ने कहा था कि यह समझौता क्षेत्रीय सोच में एक बुनियादी बदलाव का संकेत है, जो यह साबित करता है कि मध्य-पूर्व के देशों को यह एहसास हो गया है कि "सुरक्षा कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसे झूठे सुरक्षा दलालों से खरीदा जा सके।
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