अयोध्या के किसानों के लिए मखाने की खेती बनी कमाई का नया जरिया, सरकार दे रही 50% अनुदान
उत्तर प्रदेश के अयोध्या और आसपास के तराई क्षेत्रों में किसानों के लिए मखाने की खेती आमदनी बढ़ाने का नया विकल्प बनकर उभर रही है. खासकर ऐसे इलाके जहां जलभराव रहता है या तालाब और पोखरों की पर्याप्त उपलब्धता है, वहां किसान पारंपरिक फसलों के साथ मखाना उत्पादन की ओर रुख कर सकते हैं. किसानों को प्रोत्साहित करने के लिए उद्यान विभाग की मखाना विकास योजना के तहत खेती की लागत पर 50 प्रतिशत तक अनुदान देने की व्यवस्था की गई है.
जलभराव वाले क्षेत्रों में खेती का बेहतर विकल्प
मखाने की खेती सामान्य खेतों के मुकाबले पानी वाले क्षेत्रों में की जाती है. अयोध्या के रुदौली समेत तराई क्षेत्र में वेटलैंड और ताल-पोखरों की मौजूदगी को देखते हुए इसके उत्पादन की संभावनाएं अच्छी मानी जा रही हैं.
ऐसे क्षेत्रों में जहां लगातार जलभराव के कारण पारंपरिक फसलों की खेती चुनौतीपूर्ण होती है, वहां मखाना किसानों के लिए अतिरिक्त आय का माध्यम बन सकता है. इससे किसानों को गेहूं और धान जैसी पारंपरिक फसलों पर पूरी तरह निर्भर रहने की जरूरत भी कम हो सकती है.
खेती की लागत का आधा हिस्सा मिलेगा
सरकार की मखाना विकास योजना किसानों के लिए इस लिहाज से महत्वपूर्ण है कि एक हेक्टेयर तालाब में मखाना उत्पादन की स्वीकृत लागत पर 50 प्रतिशत तक अनुदान उपलब्ध कराया जा रहा है. इससे किसानों पर शुरुआती निवेश का दबाव कम होगा.
सरकार का जोर केवल खेती शुरू कराने पर नहीं है, बल्कि किसानों को उन्नत तकनीक और बेहतर उत्पादन पद्धतियों से जोड़ने पर भी है. किसानों को फसल प्रबंधन और तकनीकी पहलुओं से संबंधित प्रशिक्षण दिए जाने की बात भी कही गई है.
तालाब नहीं है तो भी रास्ता मौजूद
मखाना उत्पादन के इच्छुक ऐसे किसान जिनके पास पहले से तालाब नहीं है, उनके लिए खेत तालाब योजना उपयोगी हो सकती है. इसके तहत खेत में तालाब बनवाने के लिए भूमि संरक्षण विभाग से सहायता का प्रावधान है. उपलब्ध जानकारी के अनुसार तालाब निर्माण के लिए अधिकतम 52,500 रुपये तक अनुदान दिया जा सकता है.
इस तरह किसान तालाब निर्माण और मखाना उत्पादन से जुड़ी अलग-अलग सरकारी योजनाओं का लाभ लेकर अपनी शुरुआती लागत को कम करने की कोशिश कर सकते हैं.
31 मार्च तक आवेदन का मौका
मखाना विकास योजना के लिए आवेदन प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और 31 मार्च तक आवेदन किए जा सकते हैं. इच्छुक किसानों को संबंधित सरकारी पोर्टल पर पंजीकरण कराने की सलाह दी गई है.
हालांकि, आवेदन करने से पहले किसानों को स्थानीय उद्यान और भूमि संरक्षण विभाग से पात्रता, स्वीकृत लागत और जरूरी दस्तावेजों की ताजा जानकारी जरूर हासिल करनी चाहिए.
बाजार में बढ़ रही मखाने की मांग
मखाना अब केवल पारंपरिक खाद्य पदार्थ नहीं रह गया है. इसे पौष्टिक भोजन और हेल्दी स्नैक के तौर पर भी बाजार में तेजी से लोकप्रियता मिल रही है. यही वजह है कि इसकी खेती, प्रोसेसिंग और मार्केटिंग को लेकर सरकारी स्तर पर भी जोर बढ़ा है.
केंद्र सरकार ने मखाना क्षेत्र के समग्र विकास के लिए 476.03 करोड़ रुपये की केंद्रीय क्षेत्र योजना मंजूर की है. इसके तहत उत्पादन, बेहतर बीज, पोस्ट-हार्वेस्ट प्रबंधन, प्रोसेसिंग, वैल्यू एडिशन, ब्रांडिंग और निर्यात को बढ़ावा देने की योजना है.
अयोध्या के किसानों को मिल सकता है फायदा
केंद्र की योजना के तहत उत्तर प्रदेश में भी मखाना उत्पादन को बढ़ावा दिया जा रहा है. वर्ष 2025-26 में राज्य के कई जिलों के किसानों को योजना से लाभ मिला, जिसमें अयोध्या के 200 किसान भी शामिल थे.
इससे संकेत मिलता है कि मखाने की खेती अब केवल बिहार जैसे पारंपरिक उत्पादक क्षेत्रों तक सीमित नहीं है. उत्तर प्रदेश के उपयुक्त जलक्षेत्रों में भी इसे नए कृषि विकल्प के रूप में विकसित किया जा रहा है.
खेती के साथ प्रोसेसिंग पर भी जोर
मखाना उत्पादन से किसानों की आय बढ़ाने के लिए केवल फसल उगाना पर्याप्त नहीं है. इसके बाद सफाई, ग्रेडिंग, प्रोसेसिंग, पैकेजिंग और बेहतर बाजार तक पहुंच भी महत्वपूर्ण है. केंद्र की योजना में इन सभी पहलुओं को शामिल किया गया है.
अगर अयोध्या के किसान सरकारी सहायता के साथ आधुनिक तकनीक और बेहतर बाजार व्यवस्था से जुड़ते हैं, तो मखाना उनके लिए पारंपरिक खेती के साथ अतिरिक्त कमाई का मजबूत जरिया बन सकता है.
किसानों के लिए नई उम्मीद
अयोध्या में मखाना खेती को बढ़ावा देने की पहल जलभराव वाले क्षेत्रों के बेहतर इस्तेमाल की दिशा में भी महत्वपूर्ण है. अनुदान, तालाब निर्माण में सहायता, प्रशिक्षण और बढ़ती बाजार मांग—इन सभी को एक साथ देखा जाए तो मखाना किसानों के लिए नई संभावनाएं पैदा कर सकता है.
अब जरूरत इस बात की है कि इच्छुक किसान योजना की पात्रता और स्थानीय परिस्थितियों की सही जानकारी लेकर आगे बढ़ें, ताकि मखाने की खेती उनके लिए वास्तव में आय बढ़ाने वाला टिकाऊ विकल्प साबित हो सके.
रक्षाबंधन से पहले महिलाओं को बड़ा बाजार, उत्तराखंड में ‘सशक्त बहना उत्सव’ का होगा विस्तार
उत्तराखंड में स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं को अपने उत्पादों की बिक्री के लिए अब पहले से बड़ा बाजार मिलने जा रहा है. मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने ‘मुख्यमंत्री सशक्त बहना उत्सव’ के विस्तार की घोषणा करते हुए कहा कि अगले वर्ष से यह आयोजन रक्षाबंधन से 15 दिन पहले शुरू किया जाएगा और पूरे पखवाड़े तक चलेगा. सरकार का मानना है कि इससे ग्रामीण महिलाओं को अपने उत्पाद बेचने के लिए अधिक समय मिलेगा और उनकी आमदनी बढ़ाने में मदद मिलेगी.
स्वयं सहायता समूहों के स्टॉल का शुभारंभ
मुख्यमंत्री ने सोमवार को सचिवालय में उत्तराखंड राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन से जुड़े स्वयं सहायता समूहों की ओर से लगाए गए स्टॉलों का शुभारंभ किया. उन्होंने महिलाओं द्वारा तैयार की गई राखियों और दूसरे स्थानीय उत्पादों की जानकारी ली.
इस दौरान प्रदेश के अलग-अलग जिलों से वर्चुअल माध्यम से जुड़ी महिलाओं से भी मुख्यमंत्री ने संवाद किया. महिलाओं ने सरकार की पहल की सराहना करते हुए कहा कि बाजार उपलब्ध होने से उनके उत्पादों को नई पहचान मिल रही है और आजीविका के अवसर बढ़ रहे हैं.
तीन साल में 4,480 स्टॉल, 12.50 करोड़ की बिक्री
मुख्यमंत्री ने बताया कि योजना शुरू होने के बाद पिछले तीन वर्षों में प्रदेश के 95 विकासखंडों में 4,480 स्टॉल लगाए जा चुके हैं. इनके माध्यम से लगभग 12.50 करोड़ रुपये के स्थानीय उत्पादों की बिक्री हुई है.
सरकार का मानना है कि यदि ग्रामीण महिलाओं को बेहतर बाजार, उचित मूल्य और उत्पादों की पहचान मिले तो वे न केवल अपने परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत कर सकती हैं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी गति दे सकती हैं.
70 हजार से ज्यादा स्वयं सहायता समूह
उत्तराखंड में महिला आर्थिक सशक्तिकरण के लिए स्वयं सहायता समूहों का नेटवर्क लगातार विस्तार कर रहा है. मुख्यमंत्री के अनुसार, प्रदेश में 70 हजार से अधिक स्वयं सहायता समूह संचालित हैं, जिनसे 5.20 लाख से अधिक ग्रामीण परिवार जुड़े हुए हैं. इन समूहों को मजबूत करने के लिए 8 हजार से ज्यादा ग्राम संगठन और 615 क्लस्टर लेवल फेडरेशन भी काम कर रहे हैं.
‘लखपति दीदी’ बनीं 3 लाख से ज्यादा महिलाएं
सरकार के मुताबिक, राज्य में 3 लाख से अधिक स्वयं सहायता समूहों की महिलाएं ‘लखपति दीदी’ की पहचान हासिल कर चुकी हैं. सरकार अब ‘सशक्त बहना उत्सव’ को आगे बढ़ाकर ‘सशक्त बहना बाजार’ के रूप में विकसित करने की दिशा में काम कर रही है.
इसके तहत महिलाओं के उत्पादों को पर्यटन स्थलों, धार्मिक यात्रा मार्गों, रेलवे स्टेशनों, एयरपोर्ट और होटल-रिसॉर्ट तक पहुंचाने की योजना है.
स्थानीय उत्पादों को मिलेगा डिजिटल बाजार
सरकार महिलाओं के उत्पादों को केवल स्थानीय मेलों तक सीमित नहीं रखना चाहती. इसके लिए ई-कॉमर्स और डिजिटल प्लेटफॉर्म से भी उत्पादों को जोड़ने की तैयारी है.
उत्तराखंड के स्थानीय उत्पादों को ‘हाउस ऑफ हिमालयाज’ ब्रांड के जरिए ‘लोकल टू ग्लोबल’ पहचान दिलाने की कोशिश की जा रही है. महिलाओं को पैकेजिंग, ब्रांडिंग, लेबलिंग, डिजिटल भुगतान और मार्केटिंग का प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है.
49 ग्रोथ सेंटर और 110 बिक्री केंद्र
उत्पादों की बिक्री के लिए प्रदेश में 49 ग्रोथ सेंटर, 17 सरस सेंटर, 33 नैनो पैकेजिंग यूनिट और 8 बेकरी यूनिट स्थापित की गई हैं. इसके अलावा यात्रा मार्गों पर 110 बिक्री केंद्र संचालित किए जा रहे हैं.
मुख्यमंत्री ने अधिकारियों और कर्मचारियों से भी इन स्टॉलों से खरीदारी करने की अपील की और इसे ‘वोकल फॉर लोकल’ की वास्तविक भावना बताया.
महिलाओं के लिए सरकार की अन्य पहल
मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य सरकार महिलाओं के सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकरण के लिए लगातार कदम उठा रही है. सरकारी सेवाओं में महिलाओं को 30 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण देने के साथ सुरक्षा और समान अधिकारों से जुड़े कदम भी उठाए गए हैं.
सरकार का जोर अब महिलाओं को केवल योजनाओं का लाभार्थी बनाने के बजाय उन्हें उद्यमी और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने पर है. ‘सशक्त बहना उत्सव’ को पखवाड़े तक विस्तार देने की घोषणा इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के तौर पर देखी जा रही है.
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