भगवान विष्णु के शालिग्राम स्वरूप की पूजा क्यों मानी जाती है खास? जानें इसका धार्मिक महत्व और नियम
Shaligram puja mahatva: हिंदू धर्म में शालिग्राम को भगवान विष्णु का साक्षात स्वरूप माना जाता है, और इसे घर में स्थापित कर पूजा करना अत्यंत पवित्र और शुभ माना जाता है। यह एक विशेष प्रकार का पत्थर होता है, जो मुख्य रूप से नेपाल की गंडकी नदी में पाया जाता है। मान्यता है कि जिस घर में शालिग्राम की नियमित रूप से पूजा की जाती है, वहां भगवान विष्णु का स्थायी वास होता है और परिवार पर उनकी विशेष कृपा बनी रहती है।
शालिग्राम से जुड़ी पौराणिक कथा
धार्मिक ग्रंथों में एक प्रचलित कथा के अनुसार, तुलसी नामक एक परम विष्णु भक्त स्त्री थीं, जिनके पति जालंधर नामक असुर थे। भगवान विष्णु ने एक विशेष परिस्थिति में तुलसी के पातिव्रत्य धर्म को भंग किया, जिससे क्रोधित होकर तुलसी ने भगवान विष्णु को पत्थर बन जाने का श्राप दे दिया। मान्यता है कि भगवान विष्णु ने इस श्राप को सहर्ष स्वीकार करते हुए स्वयं को शालिग्राम के रूप में प्रकट किया।
इसके बाद भगवान विष्णु ने तुलसी को वरदान दिया कि वे सदैव तुलसी के पौधे के रूप में उनके साथ रहेंगी, और इसी वजह से आज भी शालिग्राम और तुलसी का विवाह कराने की परंपरा निभाई जाती है, जिसे "तुलसी विवाह" कहा जाता है।
शालिग्राम पूजा का धार्मिक महत्व
मान्यता है कि घर में शालिग्राम की पूजा करने से सुख-समृद्धि आती है और परिवार के सभी सदस्यों पर भगवान विष्णु की कृपा बनी रहती है। इसके अलावा यह भी कहा जाता है कि शालिग्राम की पूजा करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है, इसी वजह से इसे हिंदू धर्म में सबसे पवित्र पूजनीय वस्तुओं में गिना जाता है।
शालिग्राम की पूजा करने का सही नियम
धार्मिक परंपराओं के अनुसार, शालिग्राम की पूजा करते समय प्रतिदिन उन्हें स्वच्छ जल से स्नान कराना चाहिए और तुलसी पत्र अर्पित करना अनिवार्य माना जाता है। मान्यता है कि शालिग्राम को कभी भी बिना तुलसी के भोग नहीं लगाना चाहिए, क्योंकि भगवान विष्णु को तुलसी अत्यंत प्रिय है। इसके अलावा शालिग्राम की पूजा में शंख से जल अर्पित करना भी विशेष रूप से शुभ माना जाता है।
किन बातों का रखें विशेष ध्यान
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शालिग्राम को कभी भी अपवित्र हाथों से नहीं छूना चाहिए, और इसे हमेशा स्वच्छ स्थान पर ही रखना चाहिए। यह भी मान्यता है कि जिस घर में शालिग्राम की पूजा होती है, वहां मांस-मदिरा का सेवन पूरी तरह वर्जित माना जाता है, क्योंकि इससे शालिग्राम की पवित्रता प्रभावित होती है।
आज भी कई घरों में होती है शालिग्राम की पूजा
समय के साथ भले ही पूजा-पाठ के तरीकों में कुछ बदलाव आया हो, लेकिन शालिग्राम की पूजा करने की यह परंपरा आज भी अनेक हिंदू परिवारों में श्रद्धापूर्वक निभाई जाती है। खासतौर पर कार्तिक माह में तुलसी विवाह के अवसर पर शालिग्राम की पूजा का विशेष महत्व देखने को मिलता है।
डिस्क्लेमर (Disclaimer): इस लेख में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं, पौराणिक ग्रंथों और लोक-परंपराओं पर आधारित है। Haribhoomi.com इनकी किसी भी तरह की सटीकता या तथ्य की पुष्टि नहीं करता है। इन्हें केवल सामान्य जानकारी के तौर पर प्रस्तुत किया जा रहा है। किसी भी उपाय या धार्मिक कर्मकांड को अपनाने से पहले संबंधित विषय के विद्वान से सलाह अवश्य लें।
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