Explainer: आसिम मुनीर का फिर ईरान दौरा: अमेरिका-ईरान तनाव के बीच पाकिस्तान क्यों बना मध्यस्थ?
Explainer: पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच पाकिस्तान ने एक बार फिर खुद को मध्यस्थ के तौर पर पेश किया है. पाकिस्तान के चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज और सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर 24 अगस्त 2026 को तेहरान पहुंच रहे हैं. ईरान के विदेश मंत्रालय के मुताबिक, मुनीर के साथ एक आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल भी होगा और वह वरिष्ठ ईरानी अधिकारियों से मुलाकात करेंगे. इस दौरे का घोषित उद्देश्य ईरान-पाकिस्तान द्विपक्षीय सहयोग को मजबूत करना और क्षेत्र में शांति एवं सुरक्षा के लिए पाकिस्तान के प्रयासों को आगे बढ़ाना है.
लेकिन सवाल यह है कि आखिर पाकिस्तान के सेना प्रमुख को ही तेहरान भेजने की जरूरत क्यों पड़ी? क्या यह सिर्फ ईरान-पाकिस्तान रिश्तों से जुड़ा दौरा है या इसके पीछे अमेरिका और ईरान के बीच रुकी हुई बातचीत को फिर शुरू कराने की बड़ी कोशिश भी है? और सबसे महत्वपूर्ण सवाल क्या हाल में बने मक्का रक्षा समझौते में ईरान को शामिल करने की कोई संभावना भी इस यात्रा के एजेंडे में है?
क्यों अहम है आसिम मुनीर का तेहरान दौरा?
आसिम मुनीर का यह दौरा ऐसे समय हो रहा है जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ गया है. इस साल फरवरी में अमेरिका और इजरायल के ईरान पर हमलों के बाद संघर्ष शुरू हुआ था. इसके बाद दोनों पक्षों के बीच सैन्य कार्रवाई और जवाबी कार्रवाई का दौर चला. पाकिस्तान ने इस संकट में खुद को बातचीत के रास्ते तलाशने वाले देश के रूप में पेश किया.
पाकिस्तान की कोशिशों का एक अहम पड़ाव अप्रैल में सामने आया, जब इस्लामाबाद ने दोनों पक्षों के बीच युद्धविराम और बातचीत की प्रक्रिया में भूमिका निभाई. बाद में अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत आगे बढ़ाने के लिए एक समझौते की रूपरेखा भी बनी, लेकिन कुछ ही समय बाद दोनों देशों के बीच तनाव फिर बढ़ गया और वार्ता पटरी से उतर गई. ऐसे में मुनीर का तेहरान दौरा पाकिस्तान के उसी मध्यस्थता अभियान की अगली कड़ी माना जा रहा है.
अमेरिका-ईरान विवाद में पाकिस्तान की भूमिका क्या है?
पाकिस्तान के लिए ईरान और अमेरिका दोनों महत्वपूर्ण हैं. एक तरफ ईरान उसका पड़ोसी देश है, जिसके साथ पाकिस्तान की लंबी सीमा जुड़ी है. दूसरी तरफ अमेरिका पाकिस्तान के लिए आर्थिक, रणनीतिक और कूटनीतिक रूप से महत्वपूर्ण देश रहा है.
यही वजह है कि इस्लामाबाद दोनों पक्षों के बीच सीधा टकराव बढ़ने से रोकना चाहता है. पाकिस्तान के लिए यह केवल कूटनीतिक प्रतिष्ठा का मामला नहीं है, बल्कि उसकी अपनी सुरक्षा और अर्थव्यवस्था से भी जुड़ा मुद्दा है.
यदि ईरान और अमेरिका के बीच तनाव और बढ़ता है तो उसका असर पूरे क्षेत्र पर पड़ सकता है. खासतौर पर खाड़ी क्षेत्र, तेल की आपूर्ति और समुद्री व्यापार प्रभावित होने का खतरा रहता है.
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज क्यों बना बड़ा मुद्दा?
अमेरिका-ईरान विवाद में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज यानी होर्मुज जलडमरूमध्य सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में से एक बन गया है. यह समुद्री रास्ता वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण है. संघर्ष के दौरान यहां से तेल और अन्य ऊर्जा उत्पादों की आवाजाही बुरी तरह प्रभावित हुई है. सामान्य परिस्थितियों में दुनिया की लगभग पांचवीं ऊर्जा आपूर्ति इस मार्ग से गुजरती है.
ईरान ने इस रास्ते से गुजरने वाले जहाजों को लेकर कड़ा रुख अपनाया है, जबकि अमेरिका क्षेत्र में नौवहन की स्वतंत्रता को लेकर दबाव बना रहा है.
यही विवाद अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत में बड़ी अड़चन माना जा रहा है. इसलिए मुनीर की बातचीत में इस मुद्दे पर भी चर्चा की संभावना महत्वपूर्ण मानी जा रही है.
मक्का रक्षा समझौता क्या है?
अब आते हैं उस मुद्दे पर जिसने मुनीर के तेहरान दौरे को और ज्यादा दिलचस्प बना दिया है मक्का रक्षा समझौता.
7 अगस्त 2026 को सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की ने एक संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए. इसे क्षेत्रीय सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है. समझौते का मूल विचार यह है कि किसी एक सदस्य पर हमला होने की स्थिति में उसे सभी सदस्य देशों पर हमला माना जाएगा. इसे कई विश्लेषक नाटो के सामूहिक रक्षा सिद्धांत से जोड़कर देख रहे हैं, हालांकि दोनों व्यवस्थाओं की संरचना और संस्थागत व्यवस्था एक जैसी नहीं है. इस समझौते ने पश्चिम एशिया में नए रणनीतिक समीकरणों की चर्चा को जन्म दिया है.
क्या ईरान भी बन सकता है मक्का पैक्ट का हिस्सा?
यही इस समय सबसे बड़ा सवाल है.
24 अगस्त की कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया है कि ईरान को भी मक्का रक्षा समझौते में शामिल होने का निमंत्रण दिया गया है. हालांकि, इस खबर की अभी सभी संबंधित पक्षों की ओर से आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है.
अगर यह प्रस्ताव वास्तव में आगे बढ़ता है तो पश्चिम एशिया की राजनीति में बड़ा बदलाव हो सकता है. क्योंकि सऊदी अरब और ईरान लंबे समय तक क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी रहे हैं. ऐसे में दोनों को एक ही सुरक्षा ढांचे में लाने की कोशिश अपने आप में असाधारण होगी. यही कारण है कि आसिम मुनीर का तेहरान दौरा केवल अमेरिका-ईरान वार्ता तक सीमित नहीं माना जा रहा.
पाकिस्तान के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
पाकिस्तान के लिए सबसे कठिन काम है ईरान, सऊदी अरब और अमेरिका, तीनों के साथ संतुलन बनाए रखना.
सऊदी अरब पाकिस्तान का करीबी रणनीतिक साझेदार है. तुर्की के साथ भी पाकिस्तान के रक्षा संबंध लगातार मजबूत हुए हैं. वहीं ईरान पाकिस्तान का पड़ोसी है. ऐसे में इस्लामाबाद किसी भी एक पक्ष के बहुत करीब जाता है तो दूसरे पक्ष के साथ रिश्तों में मुश्किल पैदा हो सकती है.
मक्का समझौते के बाद यह संतुलन और चुनौतीपूर्ण हो गया है. यदि ईरान को इस व्यवस्था में शामिल करने की कोशिश होती है, तो पाकिस्तान को दोनों देशों के बीच भरोसा बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी पड़ सकती है.
अमेरिका की नई पाबंदियां भी बढ़ा रही हैं दबाव
मुनीर का दौरा ऐसे समय हो रहा है जब अमेरिका ईरान पर और कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाने की तैयारी में है. अमेरिकी अधिकारियों ने प्रस्तावित प्रतिबंधों को बेहद कठोर बताया है. ईरान ने दूसरी तरफ चेतावनी दी है कि वह आर्थिक दबाव को स्वीकार नहीं करेगा और नए प्रतिबंधों का जवाब दिया जा सकता है.
इस स्थिति में पाकिस्तान के लिए मध्यस्थता करना आसान नहीं होगा. उसे एक ऐसा रास्ता तलाशना होगा जिसमें ईरान को बातचीत की मेज पर वापस लाया जा सके और अमेरिका के साथ संवाद भी बना रहे.
पाकिस्तान आखिर चाहता क्या है?
पाकिस्तान की रणनीति को तीन स्तरों पर समझा जा सकता है.
पहला, वह क्षेत्रीय युद्ध को और फैलने से रोकना चाहता है.
दूसरा, वह अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत दोबारा शुरू कराने की कोशिश कर रहा है.
तीसरा, पाकिस्तान खुद को पश्चिम एशिया में एक प्रभावशाली कूटनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित करना चाहता है.
इस पूरी प्रक्रिया में पाकिस्तान की सेना की भूमिका खास है. पाकिस्तान की विदेश नीति में सेना का प्रभाव काफी महत्वपूर्ण माना जाता है. इसलिए आसिम मुनीर का सीधे तेहरान जाना इस बात का संकेत है कि इस्लामाबाद इस मुद्दे को केवल सामान्य राजनयिक स्तर पर नहीं, बल्कि रणनीतिक और सुरक्षा स्तर पर भी देख रहा है.
क्या मुनीर की यात्रा से निकलेगा कोई बड़ा समाधान?
फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि आसिम मुनीर की यात्रा से अमेरिका और ईरान के बीच कोई बड़ा समझौता हो जाएगा. दोनों देशों के बीच कई गंभीर मतभेद हैं प्रतिबंध, सुरक्षा गारंटी, परमाणु मुद्दा और होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे विषय बेहद संवेदनशील हैं. लेकिन पाकिस्तान के लिए यह दौरा अपने प्रभाव को बढ़ाने का महत्वपूर्ण अवसर जरूर है.
यदि मुनीर तेहरान में ईरानी नेतृत्व को बातचीत के लिए तैयार करने में कुछ सफलता हासिल करते हैं और अमेरिका तक कोई भरोसेमंद संदेश पहुंचता है, तो पाकिस्तान की कूटनीतिक भूमिका मजबूत हो सकती है.
आसिम मुनीर का तेहरान दौरा ऐसे समय हो रहा है जब पश्चिम एशिया पहले से ही गंभीर भू-राजनीतिक संकट में है. अमेरिका और ईरान के बीच तनाव, होर्मुज में बाधित व्यापार, नए अमेरिकी प्रतिबंध और मक्का रक्षा समझौते ने पूरे क्षेत्र के समीकरण बदल दिए हैं.
पाकिस्तान इस बदलती तस्वीर में खुद को केवल दर्शक नहीं, बल्कि मध्यस्थ और रणनीतिक खिलाड़ी के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है. मुनीर की ईरान यात्रा इसी रणनीति का अहम हिस्सा है.
सबसे दिलचस्प पहलू यह होगा कि क्या पाकिस्तान अमेरिका-ईरान बातचीत को फिर से पटरी पर ला पाएगा और क्या ईरान को मक्का रक्षा व्यवस्था से जोड़ने की कोई वास्तविक पहल आगे बढ़ेगी. अगर ऐसा होता है तो इसका असर सिर्फ पाकिस्तान और ईरान पर नहीं, बल्कि पूरे पश्चिम एशिया की शक्ति-संतुलन की राजनीति पर पड़ सकता है.
भारत और मोरक्को द्विपक्षीय व्यापार व बाजार पहुंच बढ़ाने और निवेश के नए अवसर विकसित करने पर दे रहे जोर: जितिन प्रसाद
नई दिल्ली, 24 अगस्त (आईएएनएस)। केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग तथा इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री जितिन प्रसाद ने सोमवार को कहा कि भारत और मोरक्को द्विपक्षीय व्यापार को नए क्षेत्रों तक विस्तारित करने, बाजार पहुंच बढ़ाने और निवेश व औद्योगिक सहयोग के नए अवसर विकसित करने की दिशा में मिलकर काम कर रहे हैं।
राज्य मंत्री जितिन प्रसाद, जो 24 से 25 अगस्त तक मोरक्को की आधिकारिक यात्रा पर हैं, मोरक्को के उद्योग एवं व्यापार मंत्री के विदेश व्यापार मामलों के राज्य सचिव उमर हेजीरा के साथ भारत-मोरक्को संयुक्त आयोग (जॉइंट कमीशन) के 7वें सत्र की सह-अध्यक्षता करेंगे। इस बैठक में दोनों देशों के बीच वर्तमान आर्थिक और वाणिज्यिक सहयोग की समीक्षा की जाएगी तथा भविष्य में सहयोग के नए क्षेत्रों की पहचान की जाएगी।
बैठक में व्यापार और बाजार पहुंच, उर्वरक उत्पादन एवं आपूर्ति, निवेश, औद्योगिक सहयोग, सीमा शुल्क, कृषि एवं खाद्य सुरक्षा, दवा और स्वास्थ्य सेवा, ऊर्जा एवं खनन, नवीकरणीय ऊर्जा, डिजिटल परिवर्तन, परिवहन एवं लॉजिस्टिक्स, आयुष, पर्यटन, शिक्षा और कौशल विकास समेत कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर चर्चा होने की उम्मीद है।
यात्रा के दौरान भारत और मोरक्को के बीच खाद्य सुरक्षा के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर होने की संभावना है। यह समझौता मोरक्को के राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कार्यालय (ओएनएसएसए) और भारत के भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) के बीच होगा।
इस समझौते के तहत आयातित खाद्य उत्पादों की गुणवत्ता और सुरक्षा, खाद्य परीक्षण प्रयोगशालाओं, विश्लेषणात्मक विधियों तथा आयात प्रक्रियाओं, गुणवत्ता नियंत्रण, नमूना परीक्षण, पैकेजिंग और लेबलिंग से जुड़े विषयों पर सहयोग बढ़ाया जाएगा। साथ ही दोनों देशों के बीच तकनीकी जानकारी और विशेषज्ञता का आदान-प्रदान भी किया जाएगा।
संयुक्त आयोग की बैठक में 2026-2030 के लिए भारत-मोरक्को सांस्कृतिक आदान-प्रदान कार्यक्रम पर भी हस्ताक्षर होने की संभावना है। इस कार्यक्रम के तहत कलाकारों, सांस्कृतिक विशेषज्ञों और पेशेवरों के आदान-प्रदान को बढ़ावा दिया जाएगा।
इसके अलावा, दोनों देशों के संग्रहालयों, पुस्तकालयों और अभिलेखागार संस्थानों के बीच सहयोग बढ़ाने, विरासत संरक्षण और अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक आयोजनों में सहभागिता को भी प्रोत्साहित किया जाएगा।
भारत और मोरक्को के बीच लंबे समय से मैत्रीपूर्ण संबंध रहे हैं और व्यापारिक सहयोग की संभावनाएं लगातार बढ़ रही हैं। वर्ष 2025 में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय वस्तु व्यापार लगभग 4 अरब डॉलर रहा।
भारत मोरक्को को मुख्य रूप से परिष्कृत पेट्रोलियम उत्पाद, दवाइयां, वाहन, सिंथेटिक वस्त्र, खाद्य उत्पाद और मसालों का निर्यात करता है। वहीं मोरक्को भारत को मुख्य रूप से फॉस्फेट और उर्वरकों की आपूर्ति करता है, जो भारतीय कृषि क्षेत्र के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
मोरक्को यात्रा के दौरान जितिन प्रसाद कई वरिष्ठ मोरक्को नेताओं के साथ द्विपक्षीय बैठकें करेंगे। वह भारत-मोरक्को संयुक्त व्यापार मंच में भी भाग लेंगे और राजधानी रबात में उद्योग जगत के प्रतिनिधियों से मुलाकात करेंगे।
इन बैठकों का उद्देश्य व्यापार, निवेश, संयुक्त उद्यमों और नई कारोबारी साझेदारियों के अवसर तलाशना है। दोनों देश अफ्रीका, यूरोप और एशिया को जोड़ने वाले रणनीतिक व्यापारिक मार्गों का लाभ उठाकर आर्थिक सहयोग को नई ऊंचाई देने की दिशा में काम कर रहे हैं।
--आईएएनएस
डीबीपी
डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.
होम
जॉब
पॉलिटिक्स
बिजनेस
ऑटोमोबाइल
गैजेट
लाइफस्टाइल
फोटो गैलरी
Others 
News Nation






