Explainer: क्या है रीजेनरेटिव एग्रीकल्चर, जानें भारत को क्यों है इसकी जरूरत?
Explainer: भारत दुनिया भर में कृषि के मामले में अगृणी देशों की श्रेणी में आता है. भारत की कृषि लगातार तेजी से आगे बढ़ रही है. बीते कुछ सालों में देश का कृषि क्षेत्र में मजबूत विकास दर्ज किया गया है. हालांकि सबसे बड़ी चुनौती ये है कि इस रफ्तार को बनाए रखने के लिए मिट्टी की सेहत, पानी की उपलब्धता और खेती के सिस्टम की मजबूती बेहद जरूरी है. क्योंकि कृषि की रफ्तार इन्हीं सब चीजों पर निर्भर है.
ऐसे में 'रीजेनरेटिव एग्रीकल्चर' यानी मिट्टी और पर्यावरण को सुधारने वाली खेती की भूमिका अहम हो जाती है. यह सिर्फि खेती की मौजूदा स्थितियों को बनाए रखने पर ही ध्यान नहीं देता, बल्कि मिट्टी की सेहत को बेहतर बनाने, जैव-विविधता को बढ़ाने और जलवायु से जुड़ी चुनौतियों के खिलाफ खेतों को मजबूत करने पर भी जोर देता है.
जानें क्या है रीजेनरेटिव एग्रीकल्चर है?
ऐसे में ये जानना बेहद जरूरी है कि रीजेनरेटिव एग्रीकल्चर खेती क्या है और इसका मतलब क्या है. दरअसल, रीजनेनरेटिव कृषि एक ऐसा समग्र तरीका है जो मिट्टी की सेहत और जैव-विविधता को सबसे ज्यादा महत्व देता है. इसका मूल विचार सरल- बेहतर मिट्टी ज्यादा उत्पादन और मजबूत खेतों को सहारा दे सकती है.
- इस तरीके का मकसद मिट्टी की उपजाऊ क्षमता को फिर से बढ़ाना, पानी को रोके रखने की क्षमता में सुधार करना, जैव-विविधता को बढ़ावा देना और उन प्राकृतिक सिस्टम को मजबूत करना है जिन पर खेती निर्भर करती है.
- सस्टेनेबिलिटी (स्थिरता) के पारंपरिक तरीकों के विपरीत, जिनका मकसद मुख्य रूप से मौजूदा स्थितियों को बनाए रखना होता है, रीजेनरेटिव एग्रीकल्चर समय के साथ जमीन की स्थिति को बेहतर बनाने की कोशिश करता है.
रीजेनरेटिव एग्रीकल्चर का मुख्य सिद्धांत
बता दें कि रीजेनरेटिव एग्रीकल्चर मुख्य रूप से मिट्टी से जड़ी बातों पर ध्यान देता है. जिसमें मिट्टी में कम से कम छेड़छाड़ करना, मिट्टी की ऊपरी परत (कवर) बनाए रखना, बारहमासी फसलों की जीवित जड़ों की सुरक्षा करना, खेती के साथ पशुपालन को जोड़ना, केमिकल का इस्तेमाल कम करना, जैव-विविधता को बढ़ाना, इन सिद्धांतों का मकसद खेती के प्राकृतिक आधार को फिर से बनाना और साथ ही उत्पादकता बनाए रखना है.
भारत में क्यों ही 'रीजेनरेटिव एग्रीकल्चर' की जरूरत?
दरअसल, भारत एक कृषि प्रधान देश है. भारत के कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों में वित्त वर्ष 2016 से 2026 के दौरान 4.45 प्रतिशत की दशक-दर-दशक वृद्धि दर्ज की गई, जो पिछले दशकों की तुलना में सबसे ज्यादा है.
- हालांकि, सघन खेती, रसायनों का भारी इस्तेमाल और अनियमित बारिश मिट्टी की सेहत और खेती की उत्पादकता पर दबाव डाल सकते हैं.
- इसके साथ ही लू, सूखे के दौर और बहुत ज्यादा बारिश से किसानों, खासकर छोटे और सीमांत किसानों के लिए जोखिम भी बढ़ सकते हैं.
- ऐसे में 'रीजेनरेटिव एग्रीकल्चर' खेती के तरीकों को अधिक संसाधन-कुशल और लचीला बनाकर इन चुनौतियों से निपटने की कोशिश करता है.
'रीजेनरेटिव एग्रीकल्चर' के तहत कौन-कौन से तरीके आते हैं?
बता दें कि 'रीजेनरेटिव एग्रीकल्चर' खेती की कोई एक तकनीक नहीं है. इसमें कई तरीकों को एक साथ अपनाया जाता है. माइक्रो-इरिगेशन (सूक्ष्म सिंचाई): ड्रिप और स्प्रिंकलर सिस्टम पौधों की जड़ों के पास पानी पहुंचाते हैं, जिससे पानी की बर्बादी कम होती है और पानी के इस्तेमाल की क्षमता बेहतर होती है.
प्राकृतिक खेती: इसमें खेत में ही तैयार जैविक इनपुट जैसे बीजामृत, जीवामृत, घनजीवामृत, नीमास्त्र और दशपर्णी का इस्तेमाल किया जाता है. यह मल्टी-क्रॉपिंग (एक साथ कई फसलें उगाना), मल्चिंग, कवर क्रॉपिंग, मिट्टी को कम से कम छेड़ना और पशुपालन को शामिल करने को भी बढ़ावा देता है.
मिट्टी की सेहत का प्रबंधन: हरी खाद, कवर क्रॉपिंग और मल्चिंग से मिट्टी में जैविक पदार्थ बढ़ सकते हैं, मिट्टी को कटाव से बचाया जा सकता है, नमी बनाए रखी जा सकती है और पोषक तत्वों के चक्र में मदद मिल सकती है.
एकीकृत कृषि प्रणालियां: फसलों के साथ पशुपालन, मछली पालन, बागवानी, एग्रो-फॉरेस्ट्री (कृषि-वानिकी) और मधुमक्खी पालन को जोड़ा जा सकता है. इस विविधता से फसल खराब होने का जोखिम कम हो सकता है और आजीविका के अतिरिक्त अवसर पैदा हो सकते हैं.
एग्रो-फॉरेस्ट्री (कृषि-वानिकी): फसलों के साथ पेड़ों को लगाने से अतिरिक्त आय हो सकती है और साथ ही मिट्टी की नमी बेहतर हो सकती है, स्थानीय तापमान को नियंत्रित किया जा सकता है और कार्बन को स्टोर किया जा सकता है.
इससे क्या होगा किसानों को फायदा?
बता दें कि इसके फायदे पर्यावरण और आर्थिक, दोनों तरह के हो सकते हैं. बेहतर मिट्टी से मिट्टी की बनावट, उपजाऊपन और पानी सोखने की क्षमता बेहतर हो सकती है. मिट्टी पर बेहतर कवर होने से कटाव कम हो सकता है, जबकि ज्यादा जैव-विविधता से परागण करने वाले जीवों, फायदेमंद कीड़ों और मिट्टी के सूक्ष्मजीवों को मदद मिल सकती है. किसानों के लिए, सिंथेटिक फर्टिलाइजर, कीटनाशकों और सिंचाई पर निर्भरता कम होने से खेती की लागत कम हो सकती है. खेती के ज्यादा मजबूत सिस्टम किसानों को मौसम में बदलाव और बाजार के उतार-चढ़ाव का बेहतर ढंग से सामना करने में भी मदद कर सकते हैं.
रीजेनरेटिव खेती के लिए क्या कदम उठा रही सरकार?
बता दें कि केंद्र सरकार सरकार कई योजनाओं के जरिए रीजेनरेटिव खेती के तरीकों को बढ़ावा दे रही है. इन योजनाओं में प्राकृतिक खेती, जैविक खेती, माइक्रो-इरिगेशन (सूक्ष्म सिंचाई), इंटीग्रेटेड फ़ार्मिंग (एकीकृत खेती), एग्रोफॉरेस्ट्री (कृषि-वानिकी) और मिट्टी की सेहत का प्रबंधन शामिल हैं. 2024 में शुरू किए गए 'नेशनल मिशन ऑन नेचुरल फ़ार्मिंग' के तहत, किसानों को दो साल तक हर साल प्रति एकड़ 4,000 रुपये का आउटपुट-बेस्ड इंसेंटिव मिलता है.
यह फायदा हर किसान के लिए ज्यादा से ज्यादा एक एकड़ जमीन तक के लिए है. इसके साथ ही मार्च 2026 तक, प्राकृतिक खेती के 18,786 क्लस्टर बनाए गए थे, जिनमें 8.80 लाख हेक्टेयर जमीन और 18.19 लाख किसान शामिल थे. इसके साथ ही 'पर ड्रॉप मोर क्रॉप' योजना: ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई को बढ़ावा देती है. मई 2026 तक, इस योजना के तहत लगभग 109 लाख हेक्टेयर जमीन कवर की गई थी और केंद्रीय सहायता के तौर पर 26,325 करोड़ रुपये जारी किए गए थे.
'रेनफेड एरिया डेवलपमेंट प्रोग्राम: ये इंटीग्रेटेड फार्मिंग सिस्टम को बढ़ावा देता है. शुरू होने के बाद से, इसने 9.53 लाख हेक्टेयर जमीन को कवर किया है और 15.73 लाख किसानों को फायदा पहुंचाया है. दिसंबर 2025 तक राज्यों को केंद्रीय सहायता के तौर पर 2,251.98 करोड़ रुपये दिए गए थे. 2015 में शुरू की गई 'सॉइल हेल्थ कार्ड स्कीम' किसानों को प्लॉट-वाइज मिट्टी की जांच की रिपोर्ट और फसल के हिसाब से सुझाव देती है. मार्च 2026 तक, शुरू होने के बाद से 25.89 करोड़ सॉइल हेल्थ कार्ड जारी किए जा चुके थे.
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8th Commission Update: क्या 7वें वेतन आयोग की तरह बदलेगी कर्मचारियों की सैलरी और पेंशन? जयपुर में होगी अहम बैठक
8th Commission Update: केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के लिए आने वाले दिन काफी अहम रहने वाले हैं. देश भर के लाखों कर्मचारी इस समय 8वें वेतन आयोग की हर एक गतिविधि पर नजर बनाए हुए हैं. वेतन आयोग का पैनल अलग-अलग राज्यों का दौरा करके विभिन्न कर्मचारी संगठनों और हितधारकों के साथ लगातार बैठकें कर रहा है. पश्चिम बंगाल, ओडिशा, उत्तर प्रदेश, नई दिल्ली और लद्दाख में चर्चा करने के बाद अब आयोग की टीम राजस्थान की राजधानी जयपुर में दो दिनों की बड़ी बैठक करने जा रही है. इस बैठक में कर्मचारियों की वेतन विसंगतियों, भत्तों और नई मांगों पर विस्तार से बातचीत होने की उम्मीद है.
आयोग के काम और समय सीमा की स्थिति
पूर्व न्यायाधीश रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में गठित 8वें वेतन आयोग को केंद्र सरकार के कर्मचारियों के वेतनमान, भत्तों और पेंशन से जुड़े सभी नियमों की बारीकी से समीक्षा करने की जिम्मेदारी दी गई है. आयोग का मुख्य काम कर्मचारियों की जरूरतों और सरकार के बजट संतुलन को ध्यान में रखते हुए एक संतुलित सिफारिश तैयार करना है. जानकारों का मानना है कि आयोग अपने गठन के बाद सभी पक्षों की दलीलें सुनने और डेटा का विश्लेषण करने में लगभग डेढ़ साल का समय लेगा. इसके बाद आयोग की अंतिम रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंपी जाएगी, जिसके आधार पर कैबिनेट अंतिम फैसला लेगी.
7वें वेतन आयोग के फैसलों से समझने का प्रयास
जब भी कोई नया वेतन आयोग आता है, तो कर्मचारियों के मन में सबसे पहला सवाल यही उठता है कि उनकी इन-हैंड सैलरी में कितनी बढ़ोतरी होगी. इस सवाल का जवाब समझने के लिए 7वें वेतन आयोग के बड़े फैसलों को देखना जरूरी हो जाता है. 7वें वेतन आयोग ने कर्मचारियों के पूरे वेतन ढांचे को एक नया रूप दिया था. उसने पुराने पे बैंड और ग्रेड पे सिस्टम को पूरी तरह खत्म करके एक नया पे मैट्रिक्स लागू किया था. इस व्यवस्था में सभी कर्मचारियों को अलग-अलग पे लेवल में बांट दिया गया था. अब 8वां वेतन आयोग भी इस व्यवस्था में नए सिरे से बदलाव कर सकता है, जिससे कर्मचारियों के प्रमोशन और सैलरी बढ़ने का तरीका बदल सकता है.
फिटमेंट फैक्टर और न्यूनतम वेतन की सबसे बड़ी चर्चा
सैलरी तय करने में सबसे महत्वपूर्ण रोल फिटमेंट फैक्टर का होता है. 7वें वेतन आयोग के दौरान 2.57 का फिटमेंट फैक्टर तय किया गया था. इसी फॉर्मूले के आधार पर तब न्यूनतम मूल वेतन को 7 हजार रुपये से बढ़ाकर सीधे 18 हजार रुपये महीना किया गया था. हालांकि इस फैक्टर में महंगाई भत्ते के असर को भी जोड़ा गया था, इसलिए इसे केवल सीधी बढ़ोतरी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. अब 8वें वेतन आयोग से कर्मचारी यूनियनों की उम्मीदें काफी बढ़ गई हैं. प्रमुख कर्मचारी संगठन मांग कर रहे हैं कि इस बार फिटमेंट फैक्टर को बढ़ाकर 3.5 से 4 गुना तक किया जाए. यदि सरकार न्यूनतम वेतन में अच्छी बढ़ोतरी करती है, तो इसका सकारात्मक असर पे मैट्रिक्स के हर एक लेवल पर देखने को मिलेगा.
भत्तों और सालाना बढ़ोतरी का गणित
वेतन आयोग का मतलब सिर्फ बेसिक पे में इजाफा होना नहीं है, बल्कि भत्तों का पुनर्गठन भी इसका अहम हिस्सा होता है. 7वें वेतन आयोग ने करीब दो सौ भत्तों की गहराई से पड़ताल की थी, जिनमें से कई गैर-जरूरी भत्तों को समाप्त कर दिया गया था और कुछ को आपस में मिला दिया गया था. इसके अलावा मकान किराया भत्ता यानी एचआरए के स्लैब में भी बड़ा बदलाव हुआ था. इस बार भी कर्मचारियों की नजर एचआरए और ट्रांसपोर्ट अलाउंस जैसी सुविधाओं पर टिकी है. इसके साथ ही सालाना 3 प्रतिशत की वेतन वृद्धि की व्यवस्था पर भी आयोग नया फैसला ले सकता है. आयोग चाहे तो इसे 3 प्रतिशत पर बनाए रख सकता है या फिर कर्मचारियों के प्रदर्शन और महंगाई के हिसाब से कोई नया फॉर्मूला पेश कर सकता है.
आने वाली बैठकों पर टिकी हैं निगाहें
जयपुर के बाद आयोग चंडीगढ़, पुडुचेरी और चेन्नई जैसे प्रमुख शहरों में भी कर्मचारी संगठनों के साथ आमने-सामने बैठकर चर्चा करेगा. इन बैठकों में यूनियनें महंगाई, जीवन यापन की लागत और पुरानी पेंशन से जुड़े कई मुद्दों को प्रमुखता से रखेंगी. ऐसे में सरकारी कर्मचारियों को केवल हेडलाइंस पर ध्यान देने के बजाय पूरे वेतन ढांचे के बदलावों को समझना होगा, क्योंकि बेसिक पे, फिटमेंट फैक्टर, भत्ते और सालाना इंक्रीमेंट मिलकर ही उनकी असल सैलरी तय करेंगे.
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