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Explainer: अमेरिका और ईरान के बीच लंबे वक्त से तनाव जारी है. इस बीच एक बार फिर से कूटनीतिक हलचल तेज हो गई है. ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने अमेरिका के साथ हुए MoU का खुलकर समर्थन किया है. उन्होंने इस समझौते को देश की मौजूदा स्थिति से बाहर निकलने का सबसे खास रास्ता बताया है. वहीं, दूसरी ओर ईरान की सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े वरिष्ठ अफसर ने पड़ोसी देशों को जवाबी कार्रवाई की चेतावनी दी है क्योंकि उन्होंने अमेरिका द्वारा ईरान पर लगाए गए जाने वाले प्रतिबंधों का समर्थन किया है.
ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि आखिर अमेरिका और ईरान के बीच इस समझौते में ऐसा क्या हुआ, जिस पर राष्ट्रपति पेजेश्कियान इतना जोर दे रहे हैं? आखिर बातचीत क्यों अटक गई है? होर्मुज की खाड़ी पूरे विवाद में इतना अहम क्यों हैं? आइये आज के एक्सप्लेनर में जानते हैं, इन्हीं सवालों के जवाब…
पेजेश्कियान ने MoU को बताया सबसे बेहतर रास्ता
ईरान की सरकारी समाचार एजेंसी IRNA के अनुसार, राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने रविवार को कहा कि ईरान और अमेरिका के बीच हुआ MoU देश को वर्तमान गतिरोध से बाहर निकालने का सबसे अच्छा विकल्प है. उन्होंने साफ कहा कि इस समझौते में ऐसा कोई भी प्रावधान नहीं है, जिसे ईरान का आत्मसमर्पण या फिर देश की ओर से बड़ी रियायत माना जाए. पेजेश्कियान ने कहा कि ईरान को एक ऐसी स्थिति से निकालने की जरूरत है, जिसमें युद्ध न तो पूरी तरह से खत्म हुआ है और न ही स्थायी शांति स्थापित हुई है. लंबे वक्त तक ऐसी अनिश्चितता रहने से सैन्य तनाव के साथ-साथ अर्थव्यवस्था पर भी दबाव बढ़ता है. उन्होंने साफ किया कि ईरान की नीतियां सर्वोच्च नेता के दिशा-निर्देशों के अनुरूप तय होती है और सरकार उसी रास्ते पर ही आगे भी बढ़ेगी.
आखिर क्या है अमेरिका-ईरान MoU?
अमेरिका और ईरान के बीत 2026 में एक अंतरिम समझौता हुआ था, जिसका उद्देश्य तत्काल सैन्य टकराव को रोकान और आगे एक व्यापक समझौते के लिए बातचीत का रास्ता तैयार करना था. समझौते में 60 दिनों की समयसीमा तय की गई थी. इस अवधि में दोनों देशों को युद्ध खत्म करने और ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़े मुद्दों पर आगे की बातचीत करनी थी. समझौते में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज यानी होर्मुज जलडमरूमध्य में वाणिज्यिक जहाजों की आवाजाही बहाल करने और अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी को हटाने से जुड़े प्रावधान भी शामिल थे.
इसके अलावा समझौते में ईरान को तेल निर्यात दोबारा शुरू करने की अनुमति और भविष्य में बड़े आर्थिक व पुनर्निर्माण पैकेज की संभावना भी रखी गई थी. रिपोर्टों के अनुसार, अंतिम समझौता होने की स्थिति में ईरान के पुनर्निर्माण और आर्थिक विकास के लिए करीब 300 अरब डॉलर तक के प्रोत्साहन की बात भी सामने आई थी.
60 दिन की डेडलाइन खत्म, फिर क्यों नहीं बनी बात?
अमेरिका और ईरान के बीच हुए MoU की 60 दिन की समयसीमा अगस्त में खत्म हो चुकी है. लेकिन इस अवधि में दोनों पक्ष उन प्रमुख मुद्दों पर सहमति नहीं बना सके, जिन पर आगे की शांति प्रक्रिया निर्भर थी. सबसे बड़ा विवाद होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर सामने आया. समझौते में व्यावसायिक जहाजों की आवाजाही बहाल करने की बात थी, लेकिन इसे लागू करने के तरीके और जलडमरूमध्य में नियंत्रण को लेकर दोनों पक्षों के बीच मतभेद बने रहे.
ईरान का कहना है कि अमेरिका को पहले अपनी नाकाबंदी और कुछ प्रतिबंधों को हटाना होगा. वहीं अमेरिका ईरान से होर्मुज को अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक यातायात के लिए खोलने की मांग करता रहा है. इसी खींचतान के कारण 60 दिन की समयसीमा समाप्त होने के बावजूद अंतिम शांति समझौता नहीं हो सका.
होर्मुज इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है. फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ने वाला यह संकरा समुद्री रास्ता वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति के लिए बेहद अहम है. इसलिए होर्मुज में किसी भी तरह की लंबे समय तक रुकावट का असर सिर्फ ईरान या अमेरिका तक सीमित नहीं रहता. इसका प्रभाव अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार, शिपिंग लागत, ऊर्जा कीमतों और दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है. हालिया तनाव के दौरान होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों की आवाजाही में भारी गिरावट आई है. यही वजह है कि अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत में होर्मुज सबसे संवेदनशील मुद्दों में शामिल हो गया है.
ईरान की अर्थव्यवस्था पर कितना असर?
राष्ट्रपति पेजेश्कियान ने आर्थिक संकट को भी बातचीत के पक्ष में एक अहम कारण के तौर पर सामने रखा है. उनका कहना है कि जब देश लगातार युद्ध और नए सैन्य टकराव की आशंका के बीच रहता है तो विदेशी निवेश आकर्षित करना मुश्किल हो जाता है. ईरान पहले से ही अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण गंभीर आर्थिक दबाव का सामना कर रहा था. युद्ध, व्यापार में बाधा, तेल निर्यात में कमी, वित्तीय प्रतिबंध और समुद्री परिवहन पर संकट ने स्थिति को और मुश्किल बनाया है.
हाल की रिपोर्टों में ईरान की अर्थव्यवस्था पर बढ़ते दबाव, तेल निर्यात में गिरावट और वित्तीय संसाधनों पर प्रतिबंधों का उल्लेख किया गया है. ऐसे में तेहरान के सामने सैन्य प्रतिरोध बनाए रखने के साथ-साथ अर्थव्यवस्था को संभालने की चुनौती भी है. पेजेश्कियान का तर्क इसी बिंदु पर केंद्रित है कि युद्ध खत्म हो या कम से कम स्थायी तौर पर सैन्य टकराव का खतरा कम हो, तभी ईरान निवेश और आर्थिक गतिविधियों को दोबारा बढ़ा सकता है.
ईरान के सुरक्षा प्रमुख ने दी जवाबी कार्रवाई की चेतावनी
जहां राष्ट्रपति पेजेश्कियान कूटनीतिक रास्ते पर जोर दे रहे हैं, वहीं ईरान के सुरक्षा तंत्र से सख्त संदेश भी सामने आया है. ईरान के नए शीर्ष सुरक्षा अधिकारी ने पड़ोसी देशों को चेतावनी दी है कि अगर वे अमेरिका की ओर से ईरान पर लगाए जाने वाले नए प्रतिबंधों का समर्थन करते हैं, तो तेहरान जवाबी कार्रवाई कर सकता है. इससे साफ है कि ईरान के भीतर भी युद्ध और बातचीत को लेकर अलग-अलग रणनीतिक दृष्टिकोण मौजूद हैं. सरकार एक तरफ बातचीत के जरिए आर्थिक और सुरक्षा संकट कम करना चाहती है, तो दूसरी तरफ सुरक्षा प्रतिष्ठान अमेरिका और उसके सहयोगियों के खिलाफ दबाव बनाए रखने की नीति पर कायम है.
अमेरिका भी ईरान पर दबाव बढ़ाने की तैयारी में है. अमेरिकी प्रशासन की ओर से नए और कड़े प्रतिबंधों की चेतावनी दी गई है, जिससे आने वाले दिनों में दोनों देशों के बीच तनाव फिर बढ़ने की आशंका बनी हुई है.
क्या फिर शुरू हो सकती है बातचीत?
हालांकि MoU की 60 दिन की समयसीमा खत्म हो चुकी है, लेकिन कूटनीतिक रास्ता पूरी तरह बंद नहीं हुआ है. पाकिस्तान भी दोनों पक्षों के बीच मध्यस्थता की कोशिश कर रहा है. पाकिस्तान के सेना प्रमुख असीम मुनीर के तेहरान दौरे की भी योजना है, जहां क्षेत्रीय सुरक्षा और ईरान-अमेरिका तनाव पर बातचीत होने की उम्मीद है.
ऐसे में आने वाले दिनों में बातचीत दोबारा शुरू होने की संभावना बनी हुई है. लेकिन इसका रास्ता आसान नहीं है. अमेरिका ईरान के परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों और होर्मुज में जहाजों की आवाजाही को लेकर अपनी शर्तों पर जोर दे रहा है. वहीं ईरान अमेरिकी नाकाबंदी हटाने, प्रतिबंधों में राहत और अपनी सुरक्षा चिंताओं के समाधान की मांग कर रहा है.
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