लहर-लहर:हमारी पहचान की कई परतें हैं, लेकिन हिंदुस्तानी होना सबसे ऊपर है
हम जिसे पहचान या आइडेंटिटी कहते हैं, वह दुनिया की सबसे सीधी-सादी चीज लगती है। असल में ये दूर से जितनी सीधी दिखाई देती है, करीब से उतनी ही जटिल हो जाती है। आप की कई पहचानें हैं। आप किसी के पिता हैं, किसी के पति हैं, किसी के भाई हैं, किसी के बेटे हैं, किसी के दोस्त हैं। आप बिजनेस करते हैं तो आप बिजनेसमैन हैं। आपको पोएट्री का शौक है, साहित्य का शौक है। यह एक अलग ही रूप है आपका। जब आप बिजनेस करते हैं तो कोई और आदमी हैं और जब आप पोएट से मिलते हैं, कवियों के साथ बैठते हैं तो आप दूसरे आदमी हैं। तो किसी आदमी की एक आइडेंटिटी नहीं होती। हर आदमी की कई पहचानें हैं और अलग-अलग वक्त पर कोई खास पहचान महत्वपूर्ण हो जाती है। तो ये पहचान एक हीरे की तरह है, जिसकी कई अलग-अलग साइड्स हैं। इधर से देखो तो कुछ और उधर से देखो तो कुछ और। सब पहचानों की भीड़ मिलकर एक आदमी बनती है। पहचानों की इस भीड़ में एक आइडेंटिटी यह भी है कि आप एक खास जिले के रहने वाले हैं। एक खास स्टेट के रहने वाले हैं। भारत के रहने वाले हैं। एशिया के रहने वाले हैं। अगर आपके जिले में बाढ़ आ जाए तो आप अपने जिले के नागरिक की जिम्मेदारी निभाएंगे, लेकिन अगर देश पर किसी तरह की आंच आ जाए तो उस वक्त आपकी पहचान है- इंडियन, हिंदुस्तानी, भारतीय। अलग-अलग वक्तों में पहचान के अलग-अलग कार्ड आगे आते रहते हैं, पर देखने वाली बात यह है कि किस वक्त आपकी कौन-सी पहचान जरूरी है और उसे आप सही निभा रहे हैं या नहीं। हम अक्सर कहते हैं कि भारत कृषि प्रधान देश है, तो हमारी एक पहचान खेती-किसानी की भी है। कोई आदमी आज डॉक्टर है, इंजीनियर है, जज है या आर्मी ऑफिसर है, लेकिन अगर आप उसकी कई पीढ़ियां पीछे जाकर देखें, तो आपको उसकी जड़ों में किसान ही मिलेगा। आठ पीढ़ियां पीछे जाएं या दस पीढ़ियां- कहीं न कहीं किसान ही मिलेगा। सच तो यह है कि खेती-किसानी हमारी साझा विरासत है और यह हमारी हिंदुस्तानी पहचान का भी अहम हिस्सा है। हमारी एक पहचान हमारा तिरंगा भी है जो हमें यह याद दिलाता है कि भारत किसी एक धर्म, भाषा, जाति या समुदाय का नाम नहीं है। यह उन तमाम लोगों का साझा देश है, जिनकी अलग-अलग पहचानें हैं। तो हमारी पहचानें अनेक हो सकती हैं, लेकिन हमारा हिंदुस्तानी होना उन सबको साथ लेकर चलने की पहचान है। कुछ पहचानें हमें विरासत में मिलती हैं तो कुछ हम अपनी मेहनत और पसंद से बनाते हैं। जन्म से मिली पहचानें परिवार, समुदाय, भाषा और परंपरा से जुड़ाव पैदा करती हैं, लेकिन इनके साथ अक्सर एक अनकहा दबाव भी होता है। सिर्फ इसलिए कि कोई व्यक्ति किसी खास परिवार या समुदाय में पैदा हुआ है, उससे उम्मीद की जाती है कि वह उसी धर्म, सामाजिक पहचान और परंपरा को स्वीकार करे। इसमें अपनी पहचान चुनने की गुंजाइश बहुत कम रह जाती है। लेकिन ये पहचान अपने साथ एक खतरा भी लेकर आती है। जहां स्वस्थ पहचान आपको आत्मविश्वास तो देती है, लेकिन घमंड नहीं देती, वहीं बीमार पहचान का मिजाज बिल्कुल अलग होता है। वह यह नहीं कहती- ‘मैं यह हूं’, बल्कि वह कहती है- ‘सिर्फ मैं ही सही हूं’। सुनने में दोनों बातों में फर्क बहुत छोटा लगता है, लेकिन इंसानी समाज के लिए उसका मतलब बहुत बड़ा है। पहली बात इंसान की अपनी पहचान देती है, दूसरी उसे दूसरों से बेहतर होने का भ्रम देती है। और यही भ्रम आगे चलकर असहिष्णुता, नफरत और टकराव की बुनियाद बनता है। (संपादन और समन्वय- अरविंद मण्डलोई)
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