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Low Sperm Count की समस्या में IVF या IUI? जानें बेहतर Success Rate के लिए कौन सा Treatment है किफायती

आईवीएफ और आईयूआई दोनों ही फर्टिलिटी ट्रीटमेंट हैं। लेकिन अक्सर लोग दोनों को एक जैसा प्रोसेस समझ बैठते हैं। वहीं महिलाएं खुद भी दोनों प्रोसेस में से किसी एक को नहीं चुनती हैं। बल्कि डॉक्टर महिला की मेडिकल कंडीशन और उम्र को ध्यान में रखकर IVF और IUI में से किसी एक का चुनाव करते हैं। इन दोनों तरीकों, सफलता के चांसेज, खर्च और इस्तेमाल की स्थिति अलग-अलग होती है।

इसलिए इलाज शुरू करने से पहले यह समझना जरूरी होता है कि दोनों में क्या फर्क है और किस स्थिति में कौन सा ऑप्शन बेहतर माना जाता है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको इस बारे में बताने जा रहे हैं कि कपल्स के लिए कौन सा इलाज बेहतर है।

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जानें IVF और IUI में अंतर

IUI नेचुरल रूप से शरीर के अंदर फर्टिलाइजेशन होता है। जबकि IVF में लैब में शरीर के बाहर फर्टिलाइजेशन होता है।

IUI प्रोसेस में पुरुष के स्पर्म को पतली नली से सीधा महिला के यूट्रेस में डाला जाता है। वहीं IVF में महिला के एग्स को निकाला जाता है और फिर लैब में स्पर्म के साथ मिलाकर भ्रूण बनाया जाता है, इसके बाद में यूट्रेस में ट्रांसफर किया जाता है।

IUI बहुत सरल, कम इनवेसिव, बिना एनेस्थीसिया के 5-10 मिनट के अंदर पूरा होने वाला प्रोसेस है। जबकि IVF में एग्स को निकालने की छोटी सर्जरी, इंजेक्शन और एंब्रियो ट्रांसफर आदि किया जाता है।

IUI प्रोसेस में महिला की कम से कम एक फैलोपियन ट्यूब का खुला होना जरूरी है। जबकि IVF बंद फैलोपियन ट्यूब वाले केस में भी पूरी तरह से कारगर होता है।

IUI प्रोसेस तब होता है जब पुरुष में स्पर्म की हल्की कमी होती है या फिर महिला में बांझपन की समस्या होती है। वहीं गंभीर स्पर्म समस्या, एडवांस एंडोमेट्रियोसिस, PCOS या बार-बार IUI फेल होने पर IVF प्रोसेस कराने की सलाह दी जाती है।

ओव्यूलेशन के समय IUI प्रोसेस सिर्फ 1 दिन में पूरा होता है। जबकि IVF साइकिल में करीब 2 से 5 सप्ताह का समय लगता है।

IUI प्रोसेस क्लिनिकल प्रेग्नेंसी दर 33 फीसदी तक सफल हो सकता है। वहीं IVF क्लिनिकल प्रेग्नेंसी दर 46 फीसदी तक हो सकता है।

IUI प्रोसेस किफायती और कम खर्चीला इलाज होता है। जबकि IVF थोड़ा अधिक खर्चीला हो सकता है।

IUI क्या है और कैसे होता है

नेचुरल प्रेग्नेंसी में स्पर्म वजाइना से होते हुए गर्भाशय में जाता है और फिर फैलोपियन ट्यूब तक जाता है। ओवरी से एग निकलने के बाद फैलोपियन ट्यूब में जाकर स्पर्म में मिलता है और फिर फर्टिलाइज होता है। लेकिन IUI प्रोसेस में पतली नली की सहायता से स्पर्म को सीधे यूट्रेस में पहुंचाया जाता है। इससे स्पर्म फैलोपियन ट्यूब के बेहद करीब पहुंच जाता है।

IUI के जरिए स्पर्म को एग के पास तक पहुंचा दिया जाता है। जिस कारण प्रेग्नेंसी की संभावना बढ़ जाती है। इस प्रोसेस को कुछ मिनटों में ही पूरा किया जाता है। इसमें महिला को एनेस्थीसिया भी नहीं दिया जाता है। जब कपल में बिना किसी वजह इंफर्टिलिटी होती है, स्पर्म काउंट हल्का या स्पर्म की गतिशीलता कम होती है। तो IUI की सलाह दी जाती है। लेकिन सबसे जरूरी यह है कि जब महिला की फैलोपियन ट्यूब खुली होती है और ओवरी सामान्य रूप से काम कर रही हो, तभी यह प्रोसेस सफल होता है।

जानें क्या है IVF प्रोसेस

IVF एक एडवांस्ड टेक्निक है। जिसमें आमतौर पर महिला को कुछ दिन हार्मोन के इंजेक्शन दिए जाते हैं और ओवरी में ज्यादा अंडे बनाए जाते हैं। इस प्रोसेस के बाद एग्स को बाहर निकाला जाता है। लैब में पार्टनर के स्पर्म के साथ फर्टिलाइज किया जाता है। एंब्रियो बनने के बाद इसको वापस महिला के यूट्रेस में ट्रांसफर कर दिया जाता है।

IVF की सलाह कब मिलती है
IVF की सलाह तब ही दी जाती है, जब IUI की संभावना काफी कम होती है।

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भगवान को भोग लगाते समय क्यों जरूरी है तुलसी पत्र? जानें इसका धार्मिक महत्व और नियम

Bhagwan Ko Bhog lagane ka niyam: हिंदू धर्म में भोजन बनाने के बाद सबसे पहले उसका एक हिस्सा भगवान को अर्पित करने की परंपरा "भोग" या "नैवेद्य" कहलाती है। मान्यता है कि बिना भगवान को भोग लगाए घर के सदस्यों को भोजन ग्रहण नहीं करना चाहिए, क्योंकि इसे अन्न के प्रति कृतज्ञता और भगवान के प्रति समर्पण व्यक्त करने का एक पवित्र तरीका माना जाता है।

भोग में तुलसी पत्र डालने का धार्मिक कारण
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, भगवान विष्णु और उनके अवतारों, खासकर भगवान श्रीकृष्ण को अर्पित किए जाने वाले भोग में तुलसी पत्र डालना अनिवार्य माना जाता है। मान्यता है कि तुलसी के बिना भगवान विष्णु किसी भी भोग को स्वीकार नहीं करते, इसी वजह से खीर, हलवा या किसी भी मीठे व्यंजन में एक तुलसी पत्र जरूर डाला जाता है।

कथाओं में यह भी उल्लेख मिलता है कि तुलसी को देवी लक्ष्मी का ही एक स्वरूप माना जाता है, और भगवान विष्णु को तुलसी अत्यंत प्रिय है, इसी वजह से भोग में इसका होना अनिवार्य माना गया है।

भोग लगाने की सही विधि
धार्मिक परंपराओं के अनुसार, भोग हमेशा स्वच्छ मन और शुद्ध वातावरण में तैयार करना चाहिए। मान्यता है कि भोजन बनाते समय भगवान का ध्यान करना और उसे बिना चखे भगवान को अर्पित करना विशेष रूप से आवश्यक माना जाता है। इसके अलावा भोग को हमेशा भगवान की मूर्ति या तस्वीर के सामने, स्वच्छ पात्र में रखकर अर्पित करना चाहिए।

यह भी मान्यता है कि भोग लगाते समय घंटी बजाना और "ॐ प्राणाय स्वाहा" जैसे मंत्रों का उच्चारण करना अत्यंत शुभ माना जाता है, जिससे भोग की पवित्रता और भी बढ़ जाती है।

किन चीजों का भोग नहीं लगाया जाता?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान को कभी भी लहसुन-प्याज से बना भोजन अर्पित नहीं किया जाता, क्योंकि इन्हें तामसिक भोजन की श्रेणी में रखा जाता है। इसके अलावा बासी भोजन का भोग लगाना भी वर्जित माना जाता है, केवल कुछ विशेष प्रसाद जैसे पंचामृत को इसका अपवाद माना जाता है। मान्यता है कि भगवान को हमेशा ताजा और सात्विक भोजन ही अर्पित करना चाहिए।

भोग के बाद प्रसाद बांटने की परंपरा
धार्मिक परंपराओं में यह भी बताया गया है कि भगवान को भोग अर्पित करने के कुछ समय बाद उसी भोजन को प्रसाद के रूप में परिवार और अन्य लोगों में बांटा जाता है। मान्यता है कि भगवान को अर्पित किया गया भोजन प्रसाद बनकर और भी अधिक पवित्र हो जाता है, जिसे ग्रहण करने से जीवन में सुख-समृद्धि आती है।

आज भी हर घर में निभाई जाती है यह परंपरा
समय के साथ भले ही जीवनशैली में कई बदलाव आए हों, लेकिन भगवान को भोग लगाने की यह परंपरा आज भी अधिकतर हिंदू घरों में श्रद्धापूर्वक निभाई जाती है। चाहे रोजाना की रसोई हो या किसी बड़े त्योहार का प्रसाद, भोजन में तुलसी पत्र डालकर भगवान को भोग अर्पित करना आज भी एक अनिवार्य धार्मिक रस्म मानी जाती है।

डिस्क्लेमर (Disclaimer): इस लेख में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं, पौराणिक ग्रंथों और लोक-परंपराओं पर आधारित है। Haribhoomi.com इनकी किसी भी तरह की सटीकता या तथ्य की पुष्टि नहीं करता है। इन्हें केवल सामान्य जानकारी के तौर पर प्रस्तुत किया जा रहा है। किसी भी उपाय या धार्मिक कर्मकांड को अपनाने से पहले संबंधित विषय के विद्वान से सलाह अवश्य लें।

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