75 सरकारी स्कूलों के मीड डे मिल में मिले कीड़े:बच्चों ने खाना खाने से इंकार किया, पूरा खाना फेंका, सब भूखे रहे
बिहार के अरवल जिले के सदर प्रखंड के करीब 75 सरकारी स्कूलों में बच्चों को दिए गए खाने में कीड़े मिलने की शिकायत सामने आई। खाने में कीड़े देखकर बच्चों ने खाना खाने से इंकार कर दिया। कई जगहों पर प्लेटों में रखा खाना बच्चों ने फेंक दिया। यह मामला 18 अगस्त 2026 का है। कीड़े देखकर मचा हडकंप भोजन में कीड़े देखकर बच्चे सहम गए और शिक्षा विभाग में हड़कंप मच गया। स्कूल में खाना परोसने के दौरान कई स्कूलों में सब्जी के अंदर छोटे-छोटे सफेद कीड़े दिखाई दिए। जैसे ही बच्चों और रसोइयों की नजर सब्जी में मौजूद कीड़ों पर पड़ी, स्कूल प्रशासन ने तुरंत खाना परोसना बंद कर दिया। कई बच्चों ने अपनी थाली का खाना फेंक दिया। शिकायत मिलने पर रोकी खाने की सप्लाई मामले की जानकारी मिलते ही शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने जांच शुरू कर दी है। जिला शिक्षा पदाधिकारी असगर हुसैन ने बताया कि मामले की जांच के लिए जिला कार्यक्रम पदाधिकारी, मध्याह्न भोजन को भेजा गया है। अगर अनियमितता पाई जाती है तो संबंधित एजेंसी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई जाएगी। फिलहाल जिन स्कूलों में शिकायत मिली है, वहां भोजन की सप्लाई रोक दी गई है। अरवल जिले में स्कूलों के लिए मिड-डे मील की आपूर्ति 'रॉयल मानव मित्र सेवा समिति' नाम की एजेंसी के जिम्मे थी। इसी एजेंसी की ओर से स्कूलों में चावल और सोयाबीन-आलू की सब्जी पहुंचाई गई थी। खाने में नमक की जगह सर्फ परोसा 18 अगस्त को नालंदा के सरकारी स्कूल में बच्चों को मिड डे मील में अलग से नमक मांगने पर सर्फ (कपड़े धोने वाला डिटर्जेंट पाउडर) परोस दिया गया। इस घटना के बाद 35 बच्चों से ज्यादा को अस्पताल में भर्ती करना पड़ा। यह घटना नूरसराय थाना क्षेत्र के परासी मध्य विद्यालय की है। खाना खाने के बाद बच्चों को पेट दर्द, उल्टी और चक्कर की शिकायत होने लगी। बीमार बच्चों को अस्पताल ले जाया गया। ------------------------------------------------------------------------- ये खबर भी पढ़ें… पटना के गर्दनीबाग में छात्र आंदोलन:BPSC TRE 4.0 की मांग को लेकर शुरू विरोध 13 मांगों तक पहुंचा, अनिश्चितकालीन आमरण अनशन जारी पिछले दिनों दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए छात्र आंदोलन और झारखंड आंदोलन के बाद बिहार में छात्रों का आंदोलन उग्र रूप ले चुका है। बिहार के पटना में प्रतियोगी परीक्षाओं और शिक्षक भर्ती (BPSC TRE 4.0) की मांग को लेकर छात्रों का 'स्टूडेंट जस्टिस सत्याग्रह' आंदोलन गर्दनीबाग धरना स्थल पर हो रहा है। पूरी खबर यहां पढ़ें
जस्टिस करोल बोले- जज भगवान नहीं, हर फैसला सही नहीं:कहा- न्याय के लिए विनम्रता जरूरी, याचिकाकर्ता के पीछे खड़े इंसान को भी देखें
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजय करोल ने शनिवार को अपने विदाई भाषण में कहा कि जज भगवान नहीं होते। उनसे हर फैसला पूरी तरह सही होने की उम्मीद नहीं की जा सकती। जस्टिस करोल ने कहा, “हम जज कोई भगवान नहीं हैं। हम हर फैसला सही नहीं कर सकते। न्याय करने के लिए विनम्रता जरूरी है। जजों को हर मुकदमे में केवल याचिकाकर्ता नहीं, बल्कि उसके पीछे खड़े इंसान को भी देखना चाहिए।" जस्टिस करोल ने कहा कि संविधान जजों से केवल कानून को सही तरीके से लागू करने की उम्मीद नहीं करता। वह कानून को न्यायपूर्ण तरीके से लागू करने की भी मांग करता है। धर्म का मतलब अनुष्ठान नहीं, कर्तव्य बताया जस्टिस करोल ने संवैधानिकता और न्याय के अर्थ पर बात करते हुए कहा कि कानून, उचित प्रक्रिया और संवैधानिक वैधता जैसे विचारों को समझने का सबसे आसान तरीका धर्म है। उन्होंने साफ किया कि यहां धर्म का अर्थ किसी अनुष्ठान से नहीं, बल्कि कर्तव्य से है। उन्होंने कहा कि जज का कर्तव्य न्याय का सम्मान करना और यह सुनिश्चित करना है कि अदालत के सामने खड़ा हर व्यक्ति, चाहे वह कितना भी छोटा या कमजोर क्यों न हो, देखा और सुना जाए। चार दशक की कानूनी यात्रा को याद किया जस्टिस करोल ने अपनी चार दशक लंबी कानूनी यात्रा को याद करते हुए कहा कि अदालत उनके लिए कभी सिर्फ व नहीं रही। कोर्ट रूम ने उन्हें हमेशा सहारा दिया और उनके जीवन में उनसे कहीं बड़ी और महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने बताया कि उन्होंने अदालतों में करीब 40 साल बिताए। शुरुआत में वह वकील के तौर पर अदालत के सामने पेश होते थे और पिछले 19 वर्षों से जज के रूप में जिम्मेदारी निभा रहे थे। उन्होंने कहा कि शीर्ष अदालत की असली अहमियत उस आम नागरिक के भरोसे में है, जो यह उम्मीद लेकर अदालत के दरवाजे तक पहुंचता है कि कोई उसकी बात सुनेगा। हालांकि, उन्होंने उन लोगों को भी याद रखने की जरूरत बताई, जो न्याय को बहुत दूर, महंगा या डराने वाला मानते हैं और इसी वजह से कोर्ट तक पहुंच ही नहीं पाते। खबर अपडेट हो रही है…
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