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SC on Reservation: आरक्षित उम्मीदवार ने ज्यादा अंक पाए तो क्या उसे मिल सकता है बेहतर सरकारी पद? सुप्रीम कोर्ट ने समझाया नियम

हाइलाइट्स 

  • सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षित श्रेणी के ओपन मेरिट उम्मीदवार के बेहतर पद के दावे पर अहम टिप्पणी की।
  • कोर्ट ने कहा कि कम अंक वाले आरक्षित उम्मीदवार की तुलना में अधिक मेरिट वाले उम्मीदवार के दावे पर विचार किया जा सकता है।
  • मामला JPSC की छठी संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा में सेवा आवंटन से जुड़ा है।
  • सुप्रीम कोर्ट ने राज्य और JPSC से पूछा है कि उम्मीदवारों ने कोई आरक्षण संबंधी छूट ली थी या नहीं।
  • मामले की अगली सुनवाई 25 अगस्त 2026 को होगी।

Supreme Court Reservation Decision 2026: सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण और सरकारी सेवाओं में पद आवंटन से जुड़े एक अहम मामले में कहा है कि यदि कोई आरक्षित श्रेणी का उम्मीदवार बिना आरक्षण संबंधी छूट का लाभ लिए मेरिट के आधार पर ओपन कैटेगरी में चुना गया है, तो वह कम अंक पाने वाले आरक्षित श्रेणी के उम्मीदवार की तुलना में बेहतर आरक्षित पद के लिए दावा कर सकता है। कोर्ट ने कहा कि इस संबंध में कानूनी स्थिति पहले से स्पष्ट है और कई फैसलों में इसे दोहराया जा चुका है।

सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण पर क्या कहा?
जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना बी वराले की बेंच ने कहा कि यदि आरक्षित श्रेणी का कोई उम्मीदवार योग्य है और उसे ओपन कैटेगरी में मेरिट के आधार पर जगह मिली है, तो केवल इस आधार पर उसे आरक्षित श्रेणी के तहत उपलब्ध बेहतर पद से वंचित नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने Union of India v. Ramesh Ram (2010) के संविधान पीठ के फैसले समेत पुराने निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि कानूनी स्थिति स्पष्ट है।

आसान भाषा में समझें
मान लीजिए किसी भर्ती में SC, ST, OBC या अन्य आरक्षित श्रेणी का उम्मीदवार अपने अंकों के आधार पर ओपन कैटेगरी की मेरिट में चयनित हो जाता है। वहीं उसी आरक्षित श्रेणी का दूसरा उम्मीदवार उससे कम अंक प्राप्त करता है, लेकिन उसे आरक्षित कोटे में बेहतर पद मिल जाता है।

ऐसी स्थिति में अधिक अंक पाने वाले और ओपन मेरिट में चयनित आरक्षित उम्मीदवार के बेहतर आरक्षित पद के दावे पर विचार किया जा सकता है।

हालांकि, इसका एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि उम्मीदवार ने चयन के लिए आरक्षण से जुड़ी कोई छूट या रियायत ली थी या नहीं। इसी सवाल पर सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार और JPSC से स्पष्टीकरण मांगा है।

किस मामले में आया सुप्रीम कोर्ट का यह बयान?
यह मामला झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) की छठी संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा से जुड़ा है। विवाद इस बात को लेकर था कि आरक्षित श्रेणी के कुछ उम्मीदवारों को अधिक अंक होने के बावजूद झारखंड एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस नहीं मिली, जबकि उनसे कम अंक वाले आरक्षित उम्मीदवारों को यह सेवा आवंटित की गई थी।

चार याचिकाकर्ताओं में चंदन, संजय कुमार महतो, गौतम कुमार और कुमार अविनाश शामिल थे। इन सभी का चयन हुआ था, लेकिन उन्हें झारखंड एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस नहीं मिली।

किस उम्मीदवार को कितने अंक मिले?
मामले में शामिल उम्मीदवारों का विवरण इस प्रकार है:

उम्मीदवार     श्रेणी     अंक (1150 में से)     आवंटित सेवा
चंदन     SC     611     झारखंड इंफॉर्मेशन सर्विस
संजय कुमार महतो     EBC-I   621     झारखंड फाइनेंस सर्विस
गौतम कुमार     EBC     619     झारखंड फाइनेंस सर्विस
कुमार अविनाश     SC     606     झारखंड प्लानिंग सर्विस

इन चारों में से किसी को भी झारखंड एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस आवंटित नहीं हुई थी। वहीं, झारखंड एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस में ओपन कैटेगरी से अंतिम चयनित उम्मीदवार के 631 अंक थे।

अन्य सेवाओं की कट-ऑफ इस प्रकार बताई गई:

  • पुलिस सर्विस: 679
  • फाइनेंस सर्विस: 614
  • एजुकेशन सर्विस: 614
  • कोऑपरेटिव सर्विस: 613
  • सोशल सिक्योरिटी सर्विस: 613
  • इंफॉर्मेशन सर्विस: 611
  • प्लानिंग सर्विस: 600

विवाद की जड़ क्या थी?
विवाद भर्ती विज्ञापन के क्लॉज 8 से जुड़ा था। यह प्रावधान झारखंड सरकार की आरक्षण नीति पर आधारित था।
इसके अनुसार, यदि आरक्षित श्रेणी का उम्मीदवार ओपन कैटेगरी के उम्मीदवार के बराबर अंक हासिल करता है और उसने आरक्षित श्रेणी के तहत चयन के लिए किसी तरह की छूट का लाभ नहीं लिया है, तो उसे ओपन कैटेगरी के उम्मीदवार के रूप में माना जा सकता है।

याचिकाकर्ताओं का कहना था कि उन्हें ओपन कैटेगरी में रखने का परिणाम उनके लिए नुकसानदेह रहा। उनके अनुसार, कम अंक वाले कुछ आरक्षित उम्मीदवारों को झारखंड एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस मिल गई, जबकि अधिक अंक होने के बावजूद उन्हें दूसरी सेवाएं दी गईं।

हाई कोर्ट ने क्या फैसला दिया था?
झारखंड हाई कोर्ट ने पहले सिंगल जज के फैसले को बरकरार रखा था। सिंगल जज ने राज्य सरकार और JPSC को याचिकाकर्ताओं को झारखंड एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस देने का निर्देश देने से इनकार किया था।

हाई कोर्ट के सामने यह भी रिकॉर्ड में था कि याचिकाकर्ताओं को संबंधित सेवाओं के लिए ओपन कैटेगरी में अंतिम चयनित उम्मीदवारों के बराबर अंक मिले थे और उनके पास जरूरी शैक्षणिक योग्यता भी थी।

सुप्रीम कोर्ट ने छूट के मुद्दे पर मांगा जवाब
सुनवाई के दौरान राज्य और JPSC की ओर से यह तर्क दिया गया कि याचिकाकर्ताओं ने चयन प्रक्रिया में किसी न किसी तरह की छूट का लाभ लिया था।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उसके सामने इस दावे को साबित करने वाला पर्याप्त रिकॉर्ड मौजूद नहीं है।

इसलिए कोर्ट ने राज्य सरकार और JPSC को छह सप्ताह के भीतर हलफनामा दाखिल करने को कहा है, जिसमें यह स्पष्ट करना होगा कि याचिकाकर्ताओं ने चयन के दौरान किसी आरक्षण संबंधी छूट या रियायत का लाभ लिया था या नहीं।

सुप्रीम कोर्ट के सामने एक और अहम सवाल
बेंच ने इससे जुड़ा एक महत्वपूर्ण सवाल भी उठाया है। अगर आरक्षित श्रेणी का कोई उम्मीदवार मेरिट के आधार पर ओपन कैटेगरी में चला जाता है और बाद में उसे उसकी पसंद के आरक्षित पद पर भेज दिया जाता है, तो उस स्थिति में ओपन कैटेगरी में उसके स्थान पर आने वाले उम्मीदवार का क्या होगा?

सुप्रीम कोर्ट ने इस पहलू पर भी विचार करने की जरूरत बताई है। मामले की अगली सुनवाई 25 अगस्त 2026 को निर्धारित की गई है।

Supreme Court Reservation Decision: इसका मतलब क्या है?
इस मामले को केवल इस रूप में नहीं समझना चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षित वर्ग के हर उम्मीदवार को बेहतर आरक्षित पद देने का नया नियम बना दिया है।

कोर्ट की टिप्पणी मेरिट, ओपन कैटेगरी में चयन और आरक्षण संबंधी छूट के इस्तेमाल से जुड़े विशेष तथ्यों के संदर्भ में है। फिलहाल राज्य और JPSC को यह स्पष्ट करना है कि संबंधित उम्मीदवारों ने चयन के दौरान कोई छूट ली थी या नहीं।

इसलिए इस मामले में अंतिम प्रभाव 25 अगस्त की अगली सुनवाई और आगे आने वाले आदेश के बाद ज्यादा स्पष्ट होगा।

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