SC on NEET Protest: नीट प्रदर्शनों में पुलिसिया ज्यादती की होगी उच्चस्तरीय जांच; SC गठित करेगा 3 सदस्यीय हाई पावर्ड कमेटी
नीट पेपर लीक विवाद और प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर दिल्ली समेत देश के विभिन्न हिस्सों में हुए छात्र आंदोलनों पर पुलिसिया कार्रवाई के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। अदालत में छात्रों की ओर से पुलिस द्वारा अत्यधिक बल प्रयोग, पैलेट गन और लाठीचार्ज के आरोप लगाए गए थे, जबकि सरकार और पुलिस की ओर से कानून-व्यवस्था की स्थिति और सुरक्षाकर्मियों के घायल होने की बात रखी गई।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद शीर्ष अदालत ने पूरे मामले की स्वतंत्र और तटस्थ जांच के लिए एक उच्चस्तरीय समिति बनाने का निर्णय लिया है।
पूर्व जज और रिटायर्ड डीजीपी होंगे कमेटी के सदस्य
सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय विशेष पीठ ने बताया कि इस प्रस्तावित कमेटी में न्यायपालिका और पुलिस प्रशासन के प्रतिष्ठित पूर्व अधिकारियों को शामिल किया जाएगा। पीठ ने कहा कि समिति में सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व न्यायाधीश, हाईकोर्ट के एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश और पुलिस महानिदेशक रैंक से सेवानिवृत्त एक वरिष्ठ अधिकारी शामिल होंगे।
इसके लिए उन अधिकारियों की सहमति ली जा रही है जिनका संबंधित राज्यों या विवाद से कोई सीधा संबंध न रहा हो, ताकि जांच पूरी तरह पारदर्शी और निष्पक्ष बनी रहे।
लाठीचार्ज, यौन उत्पीड़न और हिंसा के हर पहलू की होगी पड़ताल
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह कमेटी प्रदर्शनों के दौरान उपजे सभी विवादों की विस्तृत पड़ताल करेगी। इसमें शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर पुलिसिया बल प्रयोग, महिला प्रदर्शनकारियों द्वारा लगाए गए छेड़छाड़ व दुर्व्यवहार के आरोप, इंटरनेट पर उत्पीड़न और ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों को लगी चोटों जैसे सभी मुद्दों की समीक्षा की जाएगी।
सीजेआई ने टिप्पणी करते हुए कहा कि जो भी दोषी होगा, उसके कृत्य को उचित नहीं ठहराया जा सकता और पूरे मामले को उसके तार्किक अंत तक पहुंचाया जाएगा।
पीड़ितों को सीधे मिलेगा सुनवाई का मौका, अंतरिम रिपोर्ट भी दे सकेगी कमेटी
अदालत ने कहा कि इस उच्चाधिकार प्राप्त समिति को सभी आवश्यक प्रशासनिक व बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराई जाएंगी ताकि कोई भी पीड़ित छात्र या नागरिक सीधे कमेटी के सामने अपनी बात रख सके। पीठ ने यह भी छूट दी है कि समिति को अपनी अंतिम रिपोर्ट का इंतजार करने की जरूरत नहीं होगी, वह जरूरी मामलों में समय-समय पर अंतरिम रिपोर्ट भी अदालत को सौंप सकती है।
इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सर्विलांस, फेशियल रिकॉग्निशन तकनीक और अनुच्छेद 21 के तहत निजता के अधिकार जैसे संवैधानिक मुद्दों पर अदालत स्वयं विचार करती रहेगी।
SC on Death Penalty: देश में फांसी के जरिए ही दी जाएगी मौत की सजा; जहरीले इंजेक्शन की मांग वाली याचिका SC से खारिज
भारत में मृत्युदंड की प्रक्रिया को बदलने और फांसी के बजाय कम तकलीफदेह तरीकों को अपनाने की कानूनी बहस पर सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने वकील ऋषि मल्होत्रा द्वारा दायर उस याचिका पर सुनवाई करते हुए यह निर्णय दिया, जिसमें फांसी को अमानवीय बताते हुए वैज्ञानिक व आधुनिक तरीकों से सजा पर अमल करने की गुहार लगाई गई थी।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वर्तमान में फांसी की सजा के वैधानिक और संवैधानिक आधार को चुनौती देने का कोई ठोस आधार नहीं बनता है।
याचिका में फांसी को बताया गया था क्रूर और अमानवीय
याचिकाकर्ता ऋषि मल्होत्रा की ओर से दलील दी गई थी कि सीआरपीसी की धारा 354(5) के तहत फांसी की सजा अमानवीय, दर्दनाक और क्रूर है। याचिका में तर्क दिया गया कि फांसी के फंदे पर लटकने के बाद मौत की पुष्टि होने में लगभग 40 मिनट तक का समय लग जाता है, जबकि जहरीला इंजेक्शन देने, गोली मारने, बिजली का झटका देने या गैस चैंबर जैसे आधुनिक तरीकों से यह प्रक्रिया महज 5 मिनट में पूरी हो जाती है।
याचिका में संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत 'सम्मान के साथ मरने के अधिकार' को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता देने और संयुक्त राष्ट्र के उस प्रस्ताव का हवाला दिया गया, जिसमें मृत्युदंड के दौरान कम से कम मानवीय पीड़ा सुनिश्चित करने की बात कही गई है।
बड़ी बेंच को भेजने की मांग खारिज, भविष्य के लिए खुला रखा रास्ता
सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर 'दीना बनाम भारत संघ' समेत अपने पुराने तीन फैसलों को वृहद पीठ (बड़ी बेंच) को भेजने से साफ इनकार कर दिया। हालांकि अदालत ने अपने फैसले में यह स्पष्ट किया कि इस याचिका को खारिज करने का अर्थ यह नहीं है कि भविष्य में संवैधानिक समीक्षा के रास्ते पूरी तरह बंद हो गए हैं।
बेंच ने कहा कि यदि आगे चलकर कोई ठोस वैज्ञानिक, मेडिकल या अनुभव-आधारित साक्ष्य सामने आते हैं, जिनसे यह साबित हो कि पहले के फैसलों का तथ्यात्मक आधार बदल चुका है, तो भविष्य में इसकी संवैधानिक जांच की जा सकती है।
केंद्र सरकार विकल्प तलाशने और समिति बनाने के लिए स्वतंत्र
कोर्टने कहा कि केंद्र सरकार चाहे तो मृत्युदंड के वैकल्पिक तरीकों की व्यापक समीक्षा के लिए विशेषज्ञों की एक उच्चस्तरीय समिति गठित करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है। इससे पहले की सुनवाइयों के दौरान अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने बताया था कि सरकार इस विषय पर विचार के लिए समिति बना रही है।
सुनवाई के दौरान दोषियों को फांसी या जहरीले इंजेक्शन में से विकल्प चुनने की संभावना पर भी चर्चा हुई थी, जिसे केंद्र ने नीतिगत और व्यावहारिक रूप से अव्यवहारिक बताया था। सुप्रीम कोर्ट ने 22 जनवरी को इस मामले में अपनी सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया था, जिसे अब सुना दिया गया है।
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