महाराष्ट्र खेती की उत्पादकता बढ़ाने के लिए एआई और 'डिजिटल ट्विन लर्निंग' पर आधारित प्रोजेक्ट लागू करेगा
मुंबई, 21 अगस्त (आईएएनएस)। खेती में आधुनिक तकनीक को शामिल करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने शुक्रवार को कृषि विभाग को पूरे राज्य में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और डिजिटल ट्विन लर्निंग पर एक पायलट प्रोजेक्ट लागू करने का निर्देश दिया।
इस पहल का मकसद सैटेलाइट टेक्नोलॉजी, ड्रोन, आईओटी सेंसर और डेटा एनालिटिक्स जैसे एडवांस्ड टूल्स का इस्तेमाल करके फसल की पैदावार बढ़ाना है। इसके शुरुआती चरण में, ट्रायल के लिए 10,000 किसानों को चुना जाएगा।
यह फैसला यहां आयोजित एआई और डिजिटल ट्विन लर्निंग प्रोजेक्ट पर एक प्रेजेंटेशन के दौरान लिया गया। इस चरण में जिन मुख्य फसलों पर ध्यान दिया जाएगा, उनमें कपास, सोयाबीन, अरहर (तुअर), गन्ना, संतरा, हल्दी, प्याज और मक्का शामिल हैं।
बैठक में बोलते हुए, सीएम फडणवीस ने कहा कि बारामती के एग्रीकल्चरल डेवलपमेंट ट्रस्ट ने जलवायु परिवर्तन, पानी की कमी, मिट्टी की घटती उपजाऊ क्षमता और बढ़ती उत्पादन लागत जैसी समस्याओं से निपटने के लिए यह पहल शुरू की है।
उन्होंने फसल की बढ़त, पानी की जरूरत, मिट्टी में नमी, मौसम की स्थिति और कीटों के हमले से जुड़ा अलग-अलग स्रोतों से डेटा इकट्ठा करके एक यूनिफाइड डिजिटल सिस्टम बनाने पर जोर दिया।
मुख्यमंत्री ने कहा कि मशीन लर्निंग के जरिए इस डेटा का विश्लेषण करके राज्य हर किसान को फसल से जुड़ी खास सलाह दे सकेगा, जिससे इनपुट लागत कम होगी और खेती से होने वाली कुल आय बढ़ेगी।
राज्य के कृषि मंत्री दत्तात्रेय भरणे ने बताया कि एआई-आधारित खेती राज्य सरकार की प्राथमिकता है और उन्हें भरोसा है कि यह प्रोजेक्ट महाराष्ट्र के कृषि क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव लाएगा।
सकल मीडिया ग्रुप के चेयरमैन प्रताप पवार ने राज्य सरकार के समर्थन की सराहना की और कहा कि इस तरह की असरदार विकास पहलों को बड़े पैमाने पर लागू करने के लिए राज्य का समर्थन जरूरी है।
एग्रीकल्चरल डेवलपमेंट ट्रस्ट के सीईओ नीलेश नलावडे ने पायलट प्रोजेक्ट के नतीजे पेश किए। गन्ने की खेती पर शुरुआती ट्रायल में काफी अच्छे नतीजे मिले।
उन्होंने बताया कि औसत उत्पादन 65.45 टन प्रति एकड़ से बढ़कर 73.12 टन प्रति एकड़ हो गया, यानी प्रति एकड़ औसतन 17.66 टन की बढ़ोतरी हुई।
उन्होंने कहा, एआई-आधारित सिंचाई मैनेजमेंट से औसतन 42 प्रतिशत पानी की बचत हुई, जिससे हर दिन प्रति हेक्टेयर लगभग 90,000 लीटर पानी बचाया जा सका। एआई के जरिए ड्रोन से ली गई तस्वीरों का विश्लेषण करने से फसल की बीमारियों का जल्दी पता चल जाता है और सिंचाई व छिड़काव से जुड़ी जरूरी जानकारी सीधे किसानों के मोबाइल फोन पर भेजी जा सकती है।
सरकारी बयान के मुताबिक, शुरुआती ट्रायल से 10,000 से ज्यादा किसानों को अच्छे नतीजे मिले हैं, इसलिए राज्य सरकार इस मॉडल को पूरे राज्य में लागू करने से पहले क्षेत्र और फसल के हिसाब से इसके प्रदर्शन का मूल्यांकन करने की योजना बना रही है।
--आईएएनएस
एससीएच/डीएससी
डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.
दिल्ली में कार्गो वॉल्यूम हुआ दोगुना, नो री-स्क्रीनिंग से एयर कार्गो ट्रांसशिपमेंट में बड़ा बदलाव
भारत को दुनिया के प्रमुख लॉजिस्टिक्स और ट्रांसशिपमेंट हब के रूप में विकसित करने की दिशा में केंद्र सरकार की नई एयर कार्गो नीति के शुरुआती परिणाम उत्साहजनक सामने आए हैं. नागरिक उड्डयन सुरक्षा ब्यूरो (BCAS) की ओर से शुरू किए गए ‘नो री-स्क्रीनिंग’ एयर कार्गो ट्रांसशिपमेंट के 90 दिवसीय पायलट प्रोजेक्ट ने दिल्ली एयरपोर्ट पर कार्गो परिवहन की गति और क्षमता में बड़ा सुधार दिखाया है.
इस व्यवस्था का उद्देश्य घरेलू शहरों से आने वाले अंतरराष्ट्रीय कार्गो को देश के किसी बड़े एयरपोर्ट पर ट्रांजिट के दौरान दोबारा खोलकर जांचने की जरूरत को खत्म करना है. फिलहाल इसका परीक्षण चेन्नई-दिल्ली-फ्रैंकफर्ट रूट पर किया जा रहा है. 20 जून से शुरू हुए इस पायलट प्रोजेक्ट को फिलहाल एयर इंडिया संचालित कर रही है.
कार्गो वॉल्यूम हुआ दोगुने से ज्यादा
पायलट प्रोजेक्ट के शुरुआती आंकड़ों के मुताबिक, चेन्नई-दिल्ली-फ्रैंकफर्ट मार्ग पर रोजाना कार्गो वॉल्यूम 2.2 टन से बढ़कर 4.5 टन तक पहुंच गया है. यानी इस मार्ग पर एयर कार्गो की आवाजाही दोगुने से भी ज्यादा हो गई है. इसके साथ ही ट्रांजिट टाइम में भी भारी कमी आई है. पहले दिल्ली एयरपोर्ट पर कनेक्टिंग फ्लाइट के लिए कार्गो को करीब 36 से 48 घंटे तक रोके रखना पड़ता था. नई व्यवस्था के बाद यह समय घटकर महज 5 से 8 घंटे रह गया है. इससे ट्रांजिट टाइम में करीब 80 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है.
सीलबंद कंटेनर में सीधे अंतरराष्ट्रीय उड़ान
नई व्यवस्था के तहत यदि कार्गो सुरक्षित और सीलबंद यूनिट लोड डिवाइस (ULD) यानी एयरलाइन कंटेनर में आता है, तो दिल्ली एयरपोर्ट पर उसे खोलकर प्रत्येक पैकेट की दोबारा जांच करने की जरूरत नहीं होगी. निर्धारित सुरक्षा और सीलिंग प्रोटोकॉल का पालन होने पर कार्गो को सीधे अंतरराष्ट्रीय उड़ान में ट्रांसफर किया जा सकता है. पहले घरेलू शहरों से विदेश भेजे जाने वाले माल को दिल्ली जैसे एयरपोर्ट पर कनेक्टिंग फ्लाइट में शिफ्ट करने से पहले दोबारा खोलकर जांचना पड़ता था. इस प्रक्रिया में समय अधिक लगता था और माल के खराब होने, नुकसान या चोरी का जोखिम भी रहता था.
इसी वजह से कई भारतीय निर्यातक अपना माल दुबई और दोहा जैसे अंतरराष्ट्रीय ट्रांसशिपमेंट हब के जरिए भेजना पसंद करते थे. नई व्यवस्था से भारत के अपने एयरपोर्ट्स को वैश्विक कार्गो नेटवर्क में अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने की उम्मीद है.
अन्य शहरों तक बढ़ेगा सिस्टम
शुरुआती सफलता के बाद अब इस व्यवस्था का विस्तार अहमदाबाद, बेंगलुरु, हैदराबाद और मुंबई से आने वाले कार्गो तक किया जा रहा है. इन शहरों से दिल्ली के रास्ते कार्गो को कोपेनहेगन, फ्रैंकफर्ट और लंदन हीथ्रो जैसे अंतरराष्ट्रीय गंतव्यों तक भेजने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा रहा है.
दिल्ली एयरपोर्ट बनेगा बड़ा ट्रांसशिपमेंट हब
विमानन क्षेत्र के जानकारों के अनुसार, नई व्यवस्था भारत की लॉजिस्टिक्स क्षमता को मजबूत कर सकती है. दिल्ली एयरपोर्ट के पास 95 से अधिक अंतरराष्ट्रीय कार्गो कॉरिडोर के जरिए सालाना करीब 20 लाख मीट्रिक टन अतिरिक्त ट्रांसशिपमेंट संभालने की क्षमता बताई जा रही है. इससे निर्यातकों को समय और लागत दोनों में फायदा मिल सकता है. साथ ही भारत को विदेशी ट्रांसशिपमेंट केंद्रों पर निर्भरता कम करने में मदद मिलेगी. सरकार इस नीति को चरणबद्ध तरीके से लागू करने की योजना पर काम कर रही है. इसके तहत घरेलू से अंतरराष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय से घरेलू और अंतरराष्ट्रीय से अंतरराष्ट्रीय कार्गो ट्रांसशिपमेंट को शामिल किया जाना है.
सुरक्षा व्यवस्था सबसे बड़ी चुनौती
हालांकि शुरुआती परिणाम काफी सकारात्मक हैं, लेकिन देशभर में इस व्यवस्था को लागू करना आसान नहीं होगा. अलग-अलग एयरपोर्ट्स पर आवश्यक इंफ्रास्ट्रक्चर, सीलबंद कंटेनर की निगरानी, ट्रैकिंग सिस्टम और सुरक्षा प्रोटोकॉल को मजबूत बनाए रखना जरूरी होगा. सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि कार्गो ट्रांजिट में तेजी के साथ सुरक्षा मानकों से कोई समझौता न हो. यदि देश के अन्य प्रमुख एयरपोर्ट्स पर भी यही मॉडल सफल रहता है, तो भारत वैश्विक एयर कार्गो और ट्रांसशिपमेंट नेटवर्क में अपनी स्थिति मजबूत कर सकता है.
कुल मिलाकर, ‘नो री-स्क्रीनिंग’ व्यवस्था भारत के एयर कार्गो क्षेत्र में एक बड़ा बदलाव साबित हो सकती है. इससे न केवल माल की आवाजाही तेज होगी, बल्कि भारतीय निर्यातकों के लिए विदेशी ट्रांसशिपमेंट हब पर निर्भरता घटाने और भारत को एक प्रमुख वैश्विक लॉजिस्टिक्स हब बनाने की दिशा में भी मदद मिलेगी.
होम
जॉब
पॉलिटिक्स
बिजनेस
ऑटोमोबाइल
गैजेट
लाइफस्टाइल
फोटो गैलरी
Others
News Nation






