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त्रिसा-गायत्री ने वर्ल्ड नंबर-4 चीनी जोड़ी को हराया:सेमीफाइनल में पहुंचीं, भारत का वर्ल्ड चैंपियनशिप में पहला मेडल पक्का

भारत की त्रिसा जॉली और गायत्री गोपीचंद ने शुक्रवार को इतिहास रच दिया। भारतीय जोड़ी ने क्वार्टर फाइनल में वर्ल्ड नंबर-4 चीनी जोड़ी जिया यी फान और झांग शु शियान को हराया। त्रिसा और गायत्री ने यह मुकाबला 16-21, 21-15, 21-13 से जीता। इसके साथ ही भारत का विमेंस डबल्स में कम से कम ब्रॉन्ज मेडल पक्का हो गया। इस कैटेगरी में भारत का 15 साल बाद पहला मेडल पक्का हुआ है। इससे पहले 2011 में ज्वाला गुट्टा और अश्विनी पोनप्पा ने ब्रॉन्ज जीता था। त्रिसा-गायत्री वर्ल्ड चैंपियनशिप में मेडल जीतने वाली सिर्फ दूसरी भारतीय विमेंस डबल्स जोड़ी बन गई हैं। राउंड ऑफ-16 में जापानी जोड़ा को हराया त्रिसा-गायत्री की जोड़ी ने राउंड ऑफ 16 में जापान की 7वीं सीड रिन इवानागा और की नाकानिशी को सीधे गेम में 21-16, 21-12 से हराया था। सात्विक-चिराग का मुकाबला आज सात्विकसाईराज रंकीरेड्डी और चिराग शेट्टी की भारतीय जोड़ी मेंस डबल्स के क्वार्टर फाइनल में आज उतरेगी। भारतीय जोड़ी ने राउंड ऑफ 16 में मलेशिया के जुनैदी अरिफ और रॉय किंग याप को 21-23, 21-19, 21-17 से हराया था। भारत लगातार 11 संस्करणों में कम से कम एक मेडल जीता बैडमिंटन इन दिनों लगातार अच्छे नतीजे दे रहा है। 2010 से भारत बैडमिंटन में तीन ओलिंपिक और 14 वर्ल्ड चैंपियनशिप मेडल जीत चुका है। साइना, श्रीकांत और सात्विक-चिराग की जोड़ी के रूप में भारत तीन कैटेगरी में वर्ल्ड नंबर-1 बन चुका है और सिंधु वर्ल्ड चैंपियन रह चुकी हैं। संयोग से ये सभी सफलताएं 2009 में वर्ल्ड चैंपियनशिप की मेजबानी मिलने के बाद शुरू हुईं। इससे पहले वर्ल्ड चैंपियनशिप में एकमात्र मेडल 1983 में प्रकाश पादुकोण (ब्रॉन्ज) ने जीता था। भारत ने 2011 से वर्ल्ड चैंपियनशिप के लगातार 11 संस्करणों में कम से कम एक मेडल जीता है। भारत ने अब तक 15 मेडल जीते भारत ने अब तक 15 मेडल जीते हैं। त्रिसा-गायत्री की जोड़ी के सेमीफाइनल में पहुंचने के साथ 16 हो गए हैं। इनमें एक गोल्ड, 4 सिल्वर और 10 ब्रॉन्ज शामिल हैं। इस टूर्नामेंट में भारत को पहला मेडल प्रकाश पादुकोण ने 1983 ने दिलाया था। जबकि, एकलौता गोल्ड पीवी सिंधु ने दिलाया है।

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SC on Judicial Service Rules: अब 3 साल नहीं, सिर्फ 1 साल की वकालत करके भी बन सकेंगे जज; सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

मई 2025 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा सिविल जज भर्ती के लिए 3 साल की वकालत अनिवार्य किए जाने के फैसले के बाद से देशभर के विधि छात्रों और युवा अधिवक्ताओं में असमंजस और चिंता की स्थिति बनी हुई थी। इसे लेकर दायर पुनर्विचार याचिकाओं पर विस्तृत सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की विशेष पीठ ने यह माना कि अचानक 3 साल का कड़ा नियम थोपने से युवा प्रतिभाएं न्यायपालिका से दूर हो रही थीं।

अदालत ने अनुभव की जरूरत को बनाए रखते हुए व्यावहारिक संतुलन साधने के लिए नियमों में यह महत्वपूर्ण ढील दी है।

तीन साल की प्रैक्टिस की शर्त घटकर हुई एक साल
प्रधान न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने पुनर्विचार याचिकाओं पर फैसला सुनाया। पीठ ने स्पष्ट किया कि यद्यपि न्यायिक सेवा में आने वाले उम्मीदवारों के पास बार का व्यावहारिक अनुभव होना जरूरी है, लेकिन 3 वर्ष की लंबी अवधि से युवा वकीलों पर अनावश्यक कठिनाई पड़ रही थी। इसलिए इस अनिवार्य अनुभव को घटाकर 1 वर्ष कर दिया गया है।

हालांकि, पीठ में शामिल जस्टिस के. विनोद चंद्रन ने असहमति जताते हुए पूर्व के 3 साल के नियम को ही बनाए रखने का पक्ष लिया।

31 मार्च 2027 तक फ्रेशर्स को भी आवेदन की छूट
फैसले के अनुसार, 20 मई 2025 से 31 मार्च 2027 के बीच विज्ञापित होने वाली सभी न्यायिक परीक्षाओं के लिए विशेष छूट दी गई है। इस अवधि के दौरान आवेदन करने वाले सभी लॉ ग्रेजुएट्स को बिना किसी पूर्व वकालत अनुभव के भी सिविल जज परीक्षा में बैठने की अनुमति होगी। ऐसे चयनित अभ्यर्थियों को 'ट्रेनी ज्यूडिशियल ऑफिसर' के रूप में नियुक्त किया जाएगा और उन्हें एक साल की प्रैक्टिस के समतुल्य माना जाएगा।

चयन के बाद 1 साल की ट्रेनिंग और 1 साल की क्लर्कशिप अनिवार्य
 सुप्रीम कोर्ट ने यह व्यवस्था दी है कि परीक्षा पास करने के बाद चयनित उम्मीदवारों को सीधे कोर्ट में पदभार नहीं दिया जाएगा। उन्हें राज्य न्यायिक अकादमी में 1 वर्ष का गहन प्रशिक्षण लेना होगा। इसके बाद 1 वर्ष की स्ट्रक्चर्ड लॉ क्लर्कशिप करनी होगी, जिसमें 6 महीने डिस्ट्रिक्ट जज या हायर ज्यूडिशियल सर्विस ऑफिसर के तहत और बाकी 6 महीने संबंधित हाईकोर्ट के वर्तमान जज के अधीन काम करना अनिवार्य होगा।

1 अप्रैल 2027 से लागू होगा 1 साल की वकालत का अनिवार्य नियम
 सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि 1 अप्रैल 2027 या उसके बाद जारी होने वाली सभी नई भर्ती अधिसूचनाओं के लिए उम्मीदवारों के पास बार में कम से कम 1 वर्ष की सक्रिय वकालत का सत्यापित प्रमाण पत्र होना अनिवार्य होगा। सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों के उच्च न्यायालयों को निर्देश दिया है कि वे अगले तीन महीनों के भीतर अपने संबंधित न्यायिक सेवा नियमों में संशोधन कर इस नई व्यवस्था को औपचारिक रूप से लागू करें।

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  Sports

Dhananjaya de Silva का खुलासा, Sri Lanka को टेस्ट क्रिकेट में खली 140 Kmph वाले तेज गेंदबाजों की कमी

श्रीलंका की टीम भारत के खिलाफ दूसरे टेस्ट में उतरने की तैयारी कर रही है और इसी बीच कप्तान धनंजय डी सिल्वा ने टीम की तेज गेंदबाजी को लेकर एक अहम कमी की ओर ध्यान दिलाया है। उनका मानना है कि श्रीलंका को ऐसे तेज गेंदबाजों की जरूरत है जो लगातार 140 किलोमीटर प्रति घंटे से ज्यादा की रफ्तार से गेंद डाल सकें। मौजूदा समय में टीम के पास इस स्तर की गति वाला केवल एक गेंदबाज है।

धनंजय डी सिल्वा ने कहा कि वह चाहते हैं कि श्रीलंका के पास कम से कम दो या तीन ऐसे तेज गेंदबाज हों, जिनके पास 140 किलोमीटर प्रति घंटे से अधिक की गति हो। उन्होंने माना कि मौजूदा संसाधनों को देखते हुए असिता फर्नांडो और लाहिरू कुमारा ही टीम के लिए सबसे उपयुक्त जोड़ी हैं।

असिता फर्नांडो पिछले कुछ वर्षों में श्रीलंका के सबसे भरोसेमंद तेज गेंदबाजों में शामिल रहे हैं। वह करीब 130 किलोमीटर प्रति घंटे की गति के साथ अपनी सटीक गेंदबाजी और निरंतरता के लिए पहचाने जाते हैं। वहीं, लाहिरू कुमारा के पास ज्यादा गति है, लेकिन उनका करियर चोटों से प्रभावित रहा है। 36 टेस्ट मैचों में कुमारा ने 106 विकेट लिए हैं और उनका गेंदबाजी औसत 36.38 रहा है।

पहले टेस्ट में भी कुमारा का प्रदर्शन प्रभावी नहीं रहा था। गाले में उन्होंने 104 रन देकर दो विकेट हासिल किए थे। इसके बावजूद धनंजय का कहना है कि उपलब्ध विकल्पों में कुमारा ही असिता के साथ सबसे बेहतर तालमेल बनाते हैं।

गौरतलब है कि श्रीलंका के पास दुश्मंथा चमीरा, दिलशान मदुशंका और मतीशा पथिराना जैसे तेज गेंदबाज भी हैं। हालांकि, चमीरा ने अपना पिछला टेस्ट 2021 में खेला था। चोटों के इतिहास और सीमित ओवरों की क्रिकेट में उनकी अहमियत को देखते हुए श्रीलंका ने उन्हें मुख्य रूप से छोटे प्रारूपों के लिए संभालकर रखा है। मदुशंका गाले में टेस्ट टीम का हिस्सा थे, लेकिन घरेलू प्रतियोगिता में खेलने के लिए उन्हें टीम से बाहर किया गया था।

धनंजय ने यह भी कहा कि श्रीलंका के तेज गेंदबाजों में आत्मविश्वास की कमी दिखाई देती है। उन्होंने आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि पिछले 15 वर्षों में श्रीलंका की धरती पर केवल नुवान प्रदीप ने पांच विकेट लेने का कारनामा किया है। उन्होंने 2017 में भारत के खिलाफ छह विकेट लिए थे। इसके मुकाबले विदेशी तेज गेंदबाजों ने श्रीलंका में 14 बार पारी में पांच या उससे अधिक विकेट लिए हैं।

बता दें कि धनंजय की कप्तानी में श्रीलंका ने घरेलू मुकाबलों में भी दो तेज गेंदबाजों के साथ उतरने की नीति अपनाई है। उनका मानना है कि अगर श्रीलंकाई तेज गेंदबाज घरेलू परिस्थितियों में विकेट लेना सीख जाते हैं तो विदेशों में भी उनका प्रदर्शन बेहतर हो सकता है। उनका कहना है कि टीम को तेज गेंदबाजी के विकल्प बढ़ाने पर जल्द काम करना होगा और आने वाले समय में ऐसे गेंदबाज तैयार करने होंगे।
Sun, 23 Aug 2026 21:41:00 +0530

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