भारत के साथ पिछले सैन्य टकराव और ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान की सैन्य तैयारियों पर लगातार नजर रखी जा रही है। इसी बीच चीन और तुर्किये के भारी सैन्य परिवहन विमानों की पाकिस्तान में करीब 60 घंटे तक असामान्य आवाजाही ने नई चिंता पैदा कर दी है। सवाल यह है कि आखिर ये विमान पाकिस्तान में क्या लेकर पहुंचे? क्या चीन और तुर्किये पाकिस्तान के हथियारों और सैन्य संसाधनों को फिर से मजबूत करने में जुट गए हैं? अगर ऐसा है, तो भारत के लिए इसके सामरिक और रणनीतिक मायने बेहद गंभीर हो सकते हैं।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, सुरक्षा सूत्रों ने लगभग 60 घंटे के दौरान चीन और तुर्किये के भारी सैन्य परिवहन विमानों की पाकिस्तान में लगातार आवाजाही को असामान्य बताया है। चीनी सैन्य परिवहन विमान रावलपिंडी के पास स्थित नूर खान एयरबेस और कराची के मसरूर एयरबेस पर उतरते देखे गए। रिपोर्ट में तुर्किये के एक सैन्य परिवहन विमान TUAF526 का भी उल्लेख है। सूत्रों का दावा है कि इन विमानों के जरिए ड्रोन और अन्य सैन्य साजो-सामान पाकिस्तान पहुंचाया गया। हालांकि विमानों में मौजूद वास्तविक कार्गो की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है। लेकिन जिस पैमाने, एकाग्रता और समयबद्ध तरीके से भारी सैन्य परिवहन विमानों की आवाजाही हुई, उसने इसे सामान्य सैन्य गतिविधि मानने की गुंजाइश कम कर दी है। यह किसी समन्वित लॉजिस्टिक ऑपरेशन का संकेत हो सकता है।
पाकिस्तान के पीछे खड़े हैं चीन और तुर्किये?
भारत के लिए इस घटनाक्रम का महत्व इसलिए और बढ़ जाता है क्योंकि पाकिस्तान की सैन्य मशीन पहले से ही चीन पर भारी निर्भर है। लड़ाकू विमान हों, एयर डिफेंस सिस्टम हों या मानव रहित युद्ध प्रणाली हो, इस्लामाबाद की रक्षा क्षमता में चीन की भूमिका लगातार बढ़ी है। खासतौर पर भारत-पाकिस्तान के पिछले सैन्य संघर्ष के बाद यह साझेदारी और खुलकर सामने आई। चीन ने स्वयं स्वीकार किया था कि उसके विमानन उद्योग से जुड़े कर्मियों ने पाकिस्तान को तकनीकी सहायता दी थी। हम आपको याद दिला दें कि भारतीय सेना के उप प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल राहुल आर सिंह ने पिछले साल एक सेमिनार में साफ कहा था कि मई 7 से 10 के बीच हुए संघर्ष के दौरान पाकिस्तान को चीन और तुर्किये दोनों का समर्थन मिला था। उन्होंने कहा था कि भारत को एक सीमा पर नहीं, बल्कि वास्तव में “दो, बल्कि तीन विरोधियों” की चुनौती का सामना करना पड़ा था। सामने पाकिस्तान था और पीछे से चीन हर संभव मदद दे रहा था। उन्होंने पाकिस्तान को मिलने वाले लगभग 81 प्रतिशत सैन्य उपकरणों के चीनी मूल का होने की ओर भी इशारा किया था।
भारतीय आकलन के मुताबिक पाकिस्तान ने पिछले साल सैन्य संघर्ष के दौरान चीन निर्मित J-10 लड़ाकू विमान, PL-15 एयर-टू-एयर मिसाइल और HQ-9 एयर डिफेंस सिस्टम जैसे प्लेटफॉर्म इस्तेमाल किए। राहुल सिंह ने यह भी चेतावनी दी थी कि वास्तविक संघर्ष चीन के लिए अपने हथियारों की क्षमता को परखने का अवसर बन सकता है यानी भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध जैसी स्थिति चीन के लिए एक तरह की “लाइव लैब” भी बन सकती है।
ड्रोन से KAAN तक: तुर्किये-पाकिस्तान की बढ़ती सैन्य धुरी
उधर, तुर्किये अब केवल पाकिस्तान का राजनीतिक समर्थक नहीं, बल्कि तेजी से उसका प्रमुख रक्षा साझेदार बनता जा रहा है। दोनों देशों के बीच ड्रोन, नौसैनिक प्लेटफॉर्म, एयरोस्पेस टेक्नोलॉजी और उभरती सैन्य प्रणालियों पर सहयोग बढ़ रहा है। पिछले वर्ष मई में पाकिस्तान के एयर चीफ ने तुर्किये में उच्चस्तरीय बैठकों के दौरान रक्षा सहयोग, एयरोस्पेस इनोवेशन, मानव रहित प्रणालियों और नई तकनीकों पर चर्चा की थी। इसके बाद दोनों देशों ने लड़ाकू विमान विकास में भी सहयोग बढ़ाने के संकेत दिए। तुर्किये ने इसी महीने कहा था कि उसके KAAN पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान कार्यक्रम में लगभग 200 पाकिस्तानी इंजीनियर और अधिकारी पहले से जुड़े हुए हैं। पाकिस्तान को औपचारिक रूप से इस परियोजना में शामिल करने पर भी चर्चा शुरू होने की बात कही गई है।
यानी एक तरफ पाकिस्तान चीन से तैयार सैन्य प्लेटफॉर्म और तकनीक हासिल कर रहा है, दूसरी तरफ तुर्किये के साथ भविष्य के फाइटर जेट और उन्नत एयरोस्पेस कार्यक्रमों में अपनी जगह बना रहा है। ऐसे में तुर्की सैन्य परिवहन विमानों की यह नई गतिविधि महज एक अलग-थलग घटना नहीं, बल्कि पाकिस्तान की तेजी से बनती बहुस्तरीय रक्षा आपूर्ति श्रृंखला का हिस्सा हो सकती है।
ऑपरेशन सिंदूर के बाद ड्रोन युद्ध की नई तैयारी?
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान द्वारा तुर्किये निर्मित ड्रोन के इस्तेमाल ने भारत के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत दिया था। भारतीय आकलन के अनुसार पाकिस्तान ने Baykar Yiha III कामिकाजे ड्रोन और Asisguard Songar जैसे तुर्की मूल के सिस्टम का इस्तेमाल किया। देखा जाये तो यदि अब चीन और तुर्किये से पाकिस्तान की ओर कथित रूप से ड्रोन और अन्य सैन्य सामग्री की नई खेप पहुंच रही है, तो इसके रणनीतिक निहितार्थ बेहद गंभीर हैं। आधुनिक युद्ध में ड्रोन केवल निगरानी का साधन नहीं रह गए हैं। वे सस्ते लेकिन घातक हमले, झुंड आधारित आक्रमण, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, सीमा पार निगरानी और संवेदनशील सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने की क्षमता रखते हैं।
भारत के लिए चुनौती यह है कि पाकिस्तान की संभावित पुनःपूर्ति केवल पारंपरिक हथियारों तक सीमित नहीं हो सकती। चीन की तकनीक और तुर्किये के ड्रोन अनुभव का संयोजन पाकिस्तान को कम लागत वाले लेकिन बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किए जा सकने वाले मानव रहित हथियारों की दिशा में तेजी से आगे बढ़ा सकता है।
मक्का समझौता और नया क्षेत्रीय समीकरण
देखा जाये तो इस पूरी गतिविधि का समय भी बेहद महत्वपूर्ण है। 7 अगस्त को पाकिस्तान, तुर्किये और सऊदी अरब ने मक्का में संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए। समझौते के अनुसार तीनों देशों में से किसी एक पर सशस्त्र हमला तीनों के खिलाफ हमला माना जाएगा। आधिकारिक तौर पर इसे रक्षात्मक समझौता बताया गया है और कहा गया है कि यह किसी विशेष देश के खिलाफ नहीं है। लेकिन रणनीति केवल दस्तावेजों में लिखे शब्दों से नहीं समझी जाती। पाकिस्तान और तुर्किये पहले ही सऊदी समर्थित समुद्री सुरक्षा सहयोग के प्रति समर्थन जता चुके हैं, जिसका उद्देश्य समुद्री मार्गों और ऊर्जा आपूर्ति लाइनों की सुरक्षा है। ऐसे में चीन से सैन्य प्लेटफॉर्म, तुर्किये से ड्रोन और एयरोस्पेस सहयोग, तथा सऊदी अरब के साथ गहराता सुरक्षा ढांचा, ये सभी अलग-अलग घटनाएं नहीं, बल्कि पाकिस्तान के आसपास बन रहे एक बड़े रणनीतिक नेटवर्क की ओर इशारा करते हैं।
पाकिस्तान सिर्फ खरीदार नहीं, चीन का ‘शोकेस’ भी
दूसरी ओर, इस पूरे समीकरण का एक और महत्वपूर्ण पहलू है। पाकिस्तान केवल चीन से हथियार खरीदने वाला ग्राहक नहीं रह गया है। वह चीन के रक्षा उद्योग का साझेदार और संभावित प्रदर्शन मंच भी बन रहा है। दोनों देश संयुक्त रूप से JF-17 लड़ाकू विमान बनाते हैं और पाकिस्तान पहले से HQ-9 तथा विभिन्न चीनी मानव रहित प्रणालियों का उपयोग कर रहा है। वास्तविक संघर्ष में इन हथियारों का इस्तेमाल चीन के लिए तकनीकी परीक्षण और अंतरराष्ट्रीय रक्षा बाजार के लिहाज से भी महत्वपूर्ण हो सकता है। इसलिए पाकिस्तान की सैन्य क्षमता में निवेश को केवल भारत-पाकिस्तान संबंधों के संकुचित दायरे में देखना भूल होगी। इसके पीछे चीन की रक्षा-औद्योगिक महत्वाकांक्षाएं और दक्षिण एशिया में उसकी दीर्घकालिक रणनीतिक उपस्थिति भी जुड़ी हुई है।
भारत के लिए चेतावनी साफ है
उधर, करीब 60 घंटे के भीतर भारी सैन्य परिवहन विमानों की असामान्य गतिविधि, नूर खान और मसरूर जैसे महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों पर चीनी विमानों की लैंडिंग, तुर्किये के परिवहन विमान की मौजूदगी, ड्रोन और रक्षा सामग्री पहुंचने के दावे, इन सबकी स्वतंत्र पुष्टि भले अभी बाकी हो, लेकिन इन्हें नजरअंदाज करना रणनीतिक भूल होगी। असल चुनौती केवल यह नहीं है कि पाकिस्तान को कितने ड्रोन या कौन से हथियार मिले। चुनौती यह है कि भारत के सामने एक ऐसा विरोधी खड़ा है, जिसकी सैन्य क्षमता को चीन तकनीकी और औद्योगिक समर्थन दे सकता है, तुर्किये ड्रोन और एयरोस्पेस सहयोग से मजबूत कर सकता है और व्यापक क्षेत्रीय सुरक्षा समझौते पाकिस्तान को नई कूटनीतिक तथा सामरिक गहराई दे सकते हैं।
ऑपरेशन सिंदूर ने भारत को यह दिखा दिया कि भविष्य का युद्ध केवल टैंक, लड़ाकू विमान और मिसाइलों से तय नहीं होगा। अगली लड़ाई अंतरिक्ष से मिलने वाली जानकारी, ड्रोन स्वार्म, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, एयर डिफेंस नेटवर्क, लंबी दूरी की मिसाइलों और रियल-टाइम सैन्य डेटा की होगी। और यही कारण है कि चीन और तुर्किये से पाकिस्तान की ओर कथित सैन्य एयरलिफ्ट को केवल “कुछ विमानों की आवाजाही” मानकर खारिज नहीं किया जा सकता। यदि इन उड़ानों के पीछे वास्तव में समन्वित सैन्य पुनःपूर्ति अभियान है, तो संदेश स्पष्ट है कि पाकिस्तान अपनी सैन्य क्षमता को फिर से भरने में जुटा है, और उसके पीछे खड़े सहयोगियों का नेटवर्क पहले से कहीं ज्यादा सक्रिय दिखाई दे रहा है। बहरहाल, भारत के लिए यह समय सिर्फ निगरानी का नहीं, बल्कि तैयारियों को और तेज करने का है।
-नीरज कुमार दुबे
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लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी आज एक प्रदर्शनकारी छात्र साहिल लोचव को साथ लेकर पुलिस अधिकारियों के पास पहुंचे और आरोप लगाया कि जंतर-मंतर पर 20 जुलाई के छात्र आंदोलन के दौरान कथित पेलेट गन कार्रवाई में घायल हुए छात्र की शिकायत पर एफआईआर दर्ज नहीं की जा रही है। पुलिस अधिकारियों से मुलाकात के बाद जब राहुल गांधी संतुष्ट नहीं हुए तो उन्होंने वहीं धरना शुरू कर दिया और संदेश साफ था, “एफआईआर नहीं, तो धरना जारी रहेगा।”
यहीं से सवाल उठता है कि राहुल गांधी आखिर किस लड़ाई को लड़ रहे हैं? एक पीड़ित छात्र को न्याय दिलाने की कानूनी लड़ाई, पुलिस कार्रवाई की जवाबदेही तय कराने की लड़ाई, या फिर छात्र राजनीति के उभरते मैदान में अपनी राजनीतिक मौजूदगी दर्ज कराने की लड़ाई लड़ रहे हैं? यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि राहुल गांधी कोई सामान्य प्रदर्शनकारी नहीं हैं। वह देश की लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं। उनके पास संसद का मंच है, सरकार को जवाबदेह बनाने की संवैधानिक हैसियत है और पूरे विपक्ष की राजनीतिक आवाज बनने का अवसर भी। फिर कभी प्रधानमंत्री के घर के बाहर तो कभी थाने पहुंचकर धरने पर बैठ जाना क्या उस पद की गरिमा और जिम्मेदारी के अनुरूप राजनीति है?
धरना देना लोकतंत्र में गलत नहीं है। सरकार और पुलिस के खिलाफ विरोध करना भी विपक्ष का अधिकार है। लेकिन जब देश का नेता प्रतिपक्ष पुलिस स्टेशन की सीढ़ियों पर बैठकर कहे कि जब तक एफआईआर दर्ज नहीं होगी, वह नहीं हटेगा, तब सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या राजनीतिक दबाव ही अब राहुल गांधी की प्राथमिक रणनीति बन गया है?
यहां मामला और दिलचस्प इसलिए भी है क्योंकि राहुल गांधी जिस घटना को लेकर धरने पर बैठे, वह घटना अब केवल एक छात्र की शिकायत या पुलिस थाने की कार्रवाई तक सीमित नहीं रह गई है। दिल्ली के जंतर-मंतर पर 20 जुलाई को हुए छात्र प्रदर्शन और उसके बाद पुलिस कार्रवाई का मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। शीर्ष अदालत ने हाल में पुलिस की कथित ज्यादती और बल प्रयोग के आरोपों की जांच के लिए एक हाई-पावर्ड समिति गठित करने का फैसला किया है। साथ ही पुलिस अधिकारियों ने राहुल गांधी को यह भी बताया है कि 20 जुलाई की घटना से जुड़े कई मामले दर्ज हैं और उनकी जांच क्राइम ब्रांच तथा स्पेशल सेल को सौंपी गई है।
यानी सवाल यह नहीं है कि साहिल लोचव की शिकायत पर अलग से कार्रवाई होनी चाहिए या नहीं। यदि किसी संज्ञेय अपराध की शिकायत है और कानून के अनुसार एफआईआर बनती है, तो कार्रवाई अवश्य होनी चाहिए। पीड़ित को न्याय मिलना ही चाहिए। लेकिन सवाल राहुल गांधी की राजनीतिक शैली का है। सवाल उठता है कि क्या लोकसभा में विपक्ष के नेता को यह जानकारी नहीं थी कि मामला सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान में है? क्या उन्हें नहीं पता था कि घटना की जांच पहले से विभिन्न स्तरों पर चल रही है? और यदि उन्हें यह सब पता था, तो फिर पुलिस स्टेशन के बाहर धरने का राजनीतिक उद्देश्य क्या था?
यहीं से इस पूरी कहानी की जड़ तक जाना जरूरी है। सवाल उठता है कि जंतर-मंतर पर आखिर हुआ क्या था? दरअसल, 20 जुलाई को दिल्ली में बड़ी संख्या में छात्र परीक्षा व्यवस्था, कथित पेपर लीक और शिक्षा सुधारों की मांग को लेकर सड़कों पर उतरे थे। आंदोलन का आयोजन कॉकरोच जनता पार्टी यानी CJP के नेतृत्व में हुआ था और प्रदर्शनकारियों की मांगों में परीक्षा प्रणाली में सुधार तथा शिक्षा से जुड़े सवाल प्रमुख थे।
जंतर-मंतर से संसद की ओर बढ़ रहे प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच तनाव पैदा हुआ। आरोप लगे कि पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर अत्यधिक बल प्रयोग किया, लाठीचार्ज किया और पेलेट गन का इस्तेमाल हुआ। कई वीडियो और तस्वीरों के बाद पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठे। राहुल गांधी ने भी इस मुद्दे को जोरदार ढंग से उठाया और बाद में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को सीधे निशाने पर लिया। लेकिन दिल्ली पुलिस का पक्ष बिल्कुल अलग रहा। पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखते हुए कहा कि प्रदर्शन अवैध था और पुलिस ने स्थिति को नियंत्रित करने के लिए अधिकतम संयम बरता। पुलिस का दावा है कि बल का इस्तेमाल हालात बिगड़ने और हिंसा या अव्यवस्था की स्थिति पैदा होने के बाद किया गया। घटना के दौरान पुलिसकर्मियों के घायल होने की बात भी सामने आई थी।
यही वजह है कि इस मामले को केवल एकतरफा राजनीतिक नारे में समेटना आसान नहीं है। यदि छात्रों पर अनावश्यक या अनुपातहीन बल प्रयोग हुआ है तो दोषियों की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। लेकिन यदि प्रदर्शन के दौरान हिंसा हुई और पुलिसकर्मी भी घायल हुए, तो जांच में उस पक्ष को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। शायद इसी जटिलता के कारण सुप्रीम कोर्ट की जांच समिति का महत्व बढ़ जाता है।
इसलिए सवाल उठता है कि ऐसे में राहुल गांधी का धरना क्यों हो रहा है? सवाल उठता है कि क्या यह न्याय के लिए दबाव है, या फिर राजनीतिक दृश्य रचने की कोशिश है? दरअसल, राहुल गांधी की राजनीति में पिछले कुछ समय से एक पैटर्न दिखाई देता है। मुद्दा उठाइए, सरकार पर सीधा हमला कीजिए और फिर सड़क पर उतरकर उस मुद्दे को राजनीतिक प्रतीक में बदल दीजिए। यह रणनीति विपक्षी राजनीति में असरदार हो सकती है, लेकिन नेता प्रतिपक्ष के पद पर बैठे व्यक्ति से सवाल भी बड़ा होता है। सवाल उठता है कि क्या हर मामले में धरना ही अंतिम राजनीतिक हथियार होना चाहिए?
कभी प्रधानमंत्री के घर के बाहर धरने की राजनीति और अब पुलिस थाने पहुंचकर एफआईआर की मांग पर बैठ जाना...राहुल गांधी की यह छापामार शैली उन्हें सुर्खियां तो दिलाती है, लेकिन क्या इससे उनकी संस्थागत भूमिका कमजोर नहीं पड़ती? संसद में सरकार से जवाब मांगना, दस्तावेजों के आधार पर आरोप लगाना, संसदीय जांच की मांग करना और न्यायिक प्रक्रिया को मजबूत करना, ये भी नेता प्रतिपक्ष के उतने ही महत्वपूर्ण हथियार हैं।
इसके अलावा, एक सवाल यह भी उठता है कि क्या यह छात्रों की राजनीति में राहुल गांधी की अपनी जगह बनाने की कोशिश है? देखा जाये तो इस पूरे घटनाक्रम का राजनीतिक संदर्भ भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कॉकरोच जनता पार्टी विभिन्न राज्यों में स्कूलों की स्थिति, शिक्षा व्यवस्था और छात्रों की समस्याओं को लेकर अभियान चलाकर लगातार सुर्खियां बटोर रही है। जंतर-मंतर का आंदोलन भी इसी व्यापक छात्र असंतोष का हिस्सा बनकर सामने आया था। ऐसे में राहुल गांधी भी शायद यह संदेश देना चाहते हैं कि छात्रों की आवाज उठाने वाला सबसे बड़ा राष्ट्रीय चेहरा वही हैं।
साहिल लोचव के साथ पुलिस स्टेशन पहुंचना, उनकी चोटों का मुद्दा उठाना और एफआईआर के लिए धरने पर बैठना, यह सब एक मजबूत राजनीतिक दृश्य भी है। सवाल यह है कि क्या राहुल गांधी को लगने लगा है कि छात्र राजनीति का यह मैदान उनके हाथ से निकल सकता है? क्या कॉकरोच जनता पार्टी के शिक्षा और स्कूलों से जुड़े अभियान ने राहुल गांधी को यह एहसास कराया है कि केवल संसद में भाषण देना काफी नहीं, बल्कि छात्रों के बीच जाकर अपनी मौजूदगी दर्ज करानी होगी? या फिर यह राहुल गांधी की उस पुरानी राजनीतिक शैली का विस्तार है, जिसमें वह सत्ता के खिलाफ खुद को सीधे संघर्षरत व्यक्ति के रूप में पेश करना चाहते हैं?
देखा जाये तो राहुल गांधी को छात्रों के साथ खड़े होने का पूरा अधिकार है। पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाना भी उनका कर्तव्य है। पेलेट गन के कथित इस्तेमाल की निष्पक्ष जांच और दोषियों पर कार्रवाई की मांग भी पूरी तरह वैध राजनीतिक मुद्दा है। लेकिन नेता प्रतिपक्ष की राजनीति केवल धरने की राजनीति नहीं हो सकती। जब सुप्रीम कोर्ट जांच की प्रक्रिया शुरू कर चुका हो, जब पुलिस के अनुसार संबंधित मामलों की जांच क्राइम ब्रांच और स्पेशल सेल कर रही हो, तब राहुल गांधी को यह भी बताना चाहिए कि उनका धरना जांच को किस तरह आगे बढ़ाएगा। अगर अलग शिकायत पर एफआईआर जरूरी है, तो उसे कानूनी प्रक्रिया के तहत दर्ज कराया जाना चाहिए और उस प्रक्रिया की निगरानी की मांग की जानी चाहिए। लेकिन हर बार कैमरों के सामने धरना देकर राजनीतिक दबाव बनाना एक गंभीर सवाल छोड़ जाता है कि क्या राहुल गांधी व्यवस्था से लड़ रहे हैं, या व्यवस्था से लड़ने का दृश्य तैयार कर रहे हैं?
राहुल गांधी को समझना होगा कि छात्रों की आवाज बनने के लिए केवल पुलिस थाने की सीढ़ियों पर बैठना काफी नहीं। छात्रों को बेहतर परीक्षा व्यवस्था, मजबूत स्कूल, जवाबदेह संस्थाएं और ठोस शिक्षा नीति चाहिए। राहुल गांधी चाहें तो वह जो सुधार करना चाहते हैं वह कांग्रेस शासित राज्यों में शुरू करवा सकते हैं। राहुल गांधी को समझना होगा कि धरना तस्वीर बनाता है, लेकिन राजनीति की असली परीक्षा तस्वीर के बाद शुरू होती है।
- नीरज कुमार दुबे
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