संसद मार्च में बर्बरता- सुप्रीम कोर्ट में आज फिर सुनवाई:पुलिस पर हमला करे वाला कौन, इसकी जांच के लिए SIT बनाने पर फैसला संभव
सुप्रीम कोर्ट सोमवार को उन याचिकाओं पर सुनवाई करने वाला है, जिनमें 20 जुलाई के संसद मार्च के दौरान पुलिस पर बर्बरता का आरोप लगाया गया है। केस CJI सूर्यकांत की बेंच में लिस्ट किया गया है। गौरतलब है कि परीक्षाओं में गड़बड़ी और NEET पेपर लीक के खिलाफ कॉकरोच जनता पार्टी का विरोध प्रदर्शन 36 दिन तक चला था। 25 जुलाई को धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद यह प्रदर्शन खत्म कर दिया गया था। कोर्ट का फोकस 2 मुद्दों पर… पिछली सुनवाई में कहा था- क्रिमिनल रिकॉर्ड वाले छोड़े न जाएं 28 जुलाई को हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कोई भी सख्त कार्रवाई करने से रोक दिया था। कोर्ट ने यह भी कहा था कि 18 साल से कम उम्र वाले लोगों का कोई क्रिमिनल रिकॉर्ड नहीं हो तो उन्हें रिहा कर दिया जाए। अदालत ने महाराष्ट्र, बिहार, असम, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल और केरलम सरकार को नोटिस जारी किए थे और उनके एडवोकेट जनरल से अगली सुनवाई की तारीख पर ऑनलाइन पेश होने को कहा था। जिन राज्यों में विरोध प्रदर्शन हुए थे, अदालत ने वहां सीसीटीवी फुटेज, ड्रोन रिकॉर्डिंग, बॉडी-कैमरा फुटेज, वायरलेस कम्युनिकेशन रिकॉर्ड, PCR लॉग और विरोध प्रदर्शन से जुड़े अन्य डिजिटल सबूतों को सुरक्षित रखने के लिए निर्देश जारी किए थे। पढ़ें पूरी खबर… 20 जुलाई को संसद मार्च में हुआ था लाठीचार्ज 20 जुलाई को दिल्ली में 'कॉकरोच जनता पार्टी' ने संसद मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों और सुरक्षाकर्मियों के बीच झड़पें हुईं। सुरक्षाकर्मियों ने संसद की ओर बढ़ने की कोशिश कर रही भीड़ को तितर-बितर करने के लिए लाठीचार्ज किया और आंसू गैस के गोले छोड़े। प्रदर्शनकारी NEET पेपर लीक मामले को लेकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रहे थे। 25 जुलाई को प्रधान के इस्तीफे और जान गंवाने वाले छात्रों के परिवारों को मुआवजा देने की मांग मान लेने के साथ ही आंदोलन खत्म हो गया था। 20 जुलाई के संसद मार्च की 2 तस्वीरें… 'फेशियल रिकग्निशन' के इस्तेमाल के खिलाफ भी सुप्रीम कोर्ट में याचिका राज्यसभा के एक सांसद ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। इसमें प्रदर्शन के दौरान दिल्ली पुलिस के फेशियल रिकग्निशन टेक्नोलॉजी (FRT) और बायोमेट्रिक निगरानी के दूसरे तरीकों के इस्तेमाल को चुनौती दी गई है। कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) के केरलम से राज्यसभा सदस्य एए रहीम ने मांग की है कि शांतिपूर्ण सार्वजनिक सभाओं में बिना किसी भेदभाव के बायोमैट्रिक निगरानी का इस्तेमाल असंवैधानिक घोषित किया जाए। पहले भी 3 बार सुप्रीम कोर्ट पहुंची कॉकरोच जनता पार्टी से जुड़ी याचिका 1. पहली बार- 24 मई, मांग थी- CJP बनाने वालों की गतिविधियों की जांच CBI करे याचिकाकर्ता के वकील एनके गोस्वामी का दावा था कि CJP, ज्यूडीशियरी की इमेज खराब कर रही है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर तुरंत सुनवाई से इनकार कर दिया। CJI सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की बेंच ने कहा, ‘इसे इतनी भावुकता से मत लें।’ इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट में कार्यवाही के दौरान दिए गए मौखिक अदालती बयानों के कमर्शियलाइजेशन किए जाने के खिलाफ भी कार्रवाई की मांग की गई। इस पर CJI ने जवाब दिया था- “अभी ऐसी कोई गंभीर आपात स्थिति नहीं है। देखते हैं क्या होता है।” पढ़ें पूरी खबर… 2. दूसरी बार- 22 जुलाई, मांग थी- कॉकरोच पार्टी के समर्थकों पर लाठीचार्ज की जांच हो एक वकील ने CJI की अगुआई वाली 3 जजों की बेंच के सामने जनहित याचिका लगाई थी। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता वकील ने कहा- छात्र महत्वपूर्ण मुद्दे उठा रहे हैं। लेकिन उन पर पुलिस की बर्बरता के वीडियो भी हैं। यदि संभव हो तो मामले की सुनवाई जल्द की जाए। इस पर CJI सूर्यकांत ने कहा था, 'हमें वीडियो में दिलचस्पी नहीं है, हमारे पास देखने का समय नहीं है।' जब वकील ने छात्रों के साथ मारपीट के वीडियो देखने का दूसरी बार अनुरोध किया तो CJI ने कहा, ‘हमारा और अपना समय बर्बाद मत कीजिए।’ पढ़ें पूरी खबर… 3. तीसरी बार- 24 जुलाई, मांग थी- पुलिस पर कंट्रोल जरूरी, कोर्ट हमारे बीच आ रहा है इस बार मामला सीनियर एडवोकेट गोपाल शंकरनारायणन ने उठाया। उन्होंने कोर्ट में बताया प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस की हिंसा से जुड़ी 2 याचिकाएं दायर की गई हैं। इनमें कई राज्य पक्षकार के तौर पर शामिल हैं। इनका जिक्र पहले इसलिए नहीं किया गया क्योंकि वे डायरी नंबर का इंतजार कर रहे थे। इन दलीलों के बाद CJI ने कहा, "इसे लिस्टिंग में आने दें, हम इस पर सुनवाई करेंगे।" इससे पहले एक दूसरे मामले की सुनवाई के दौरान CJI ने कहा था- मैंने CJP के प्रदर्शन के दौरान हुए लाठीचार्ज से जुड़ी किसी भी याचिका की सुनवाई से इनकार नहीं किया। सच ये है कि कोई रिट याचिका दाखिल ही नहीं की गई थी। मीडिया ने भी गलत खबरें चलाईं। पढ़ें पूरी खबर…
प्रशांत किशोर जीतें या हारें, 3 बड़े बदलाव तय!:क्या सम्राट चौधरी की कुर्सी हिलेगी, तेजस्वी-निशांत की राजनीति बिगड़ेगी?, जानिए 3 पॉइंट में
जन सुराज के सूत्रधार प्रशांत किशोर अपना पहला चुनाव भाजपा के गढ़ बांकीपुर में जीतेंगे या हारेंगे, इसका फैसला आज दोपहर तक हो जाएगा। प्रशांत जीते, बुरी तरह हारे या कड़ी टक्कर देकर हारे तो आगे क्या होगा…समझेंगे; बूझे की नाही में…। प्रशांत जीते तो पूरी तरह बदल जाएगी बिहार की राजनीति 1. 'जातिवादी मॉडल' का अंत और 'गवर्नेंस' पर तेज होगी चर्चा बिहार की राजनीति दशकों से जाति आधारित समीकरणों (यादव, कुर्मी, राजपूत, भूमिहार, मुस्लिम, EBC, दलित आदि) पर टिकी है। प्रशांत किशोर लगातार जाति से ऊपर और 'विकास-गवर्नेंस' की बात करते रहे हैं। 2. भाजपा कमजोर होगी, JDU-RJD का संभलना मुश्किल बांकीपुर भाजपा का पारंपरिक किला रहा है। भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन का परिवार 1995 से यहां से जीतता रहा है। प्रशांत किशोर चुनाव प्रचार के दौरान खुद कह चुके हैं- 'यहां हमारी जीत तब ही होगी, जब दशकों से भाजपा को वोट दे रहा एक बड़ा तबका हमारी तरफ शिफ्ट होगा।' इसका मतलब कि अगर यहां भाजपा हारी तो साफ है कि उसका शहरी, मिडिल क्लास और अपर कास्ट का मजबूत आधार हिल गया है। विकल्प नहीं होने और लालू राज के लौटने के डर से भाजपा को वोट दे रहे लोगों को राज्यभर में विकल्प मिल जाएगा। इसका सीधा असर भाजपा के कोर वोटरों पर पड़ेगा। भाजपा का अभी भी सबसे मजबूत आधार वोट बैंक जनरल कास्ट है, जो कांग्रेस से खिसक कर उसके पास पहुंचा है। अगर यह वोट बैंक भाजपा से खिसका तो बिहार में उसकी स्थिति कांग्रेस वाली हो सकती है। प्रशांत किशोर खुद कह चुके हैं- 'यह उपचुनाव सिर्फ एक सीट का चुनाव नहीं है, सम्राट चौधरी के खिलाफ भी जनमत टेस्ट है। क्योंकि नीतीश कुमार के नाम पर वोट लेकर भाजपा ने अपना आदमी सेट किया है। यहां अगर भाजपा हारी तो इसकी गूंज दिल्ली तक सुनाई देगी।' 2 अगस्त को प्रशांत किशोर ने भी दोहराया- ‘चुनाव सम्राट चौधरी के नाम पर जनमत संग्रह है। अगर भाजपा हारती है तो इसकी नैतिक जिम्मेदारी सम्राट चौधरी को लेनी होगी। उनको इस्तीफा देना चाहिए। अगर नहीं देंगे इस्तीफा दो भाजपा अपने ले लेगी।’ मने अगर प्रशांत किशोर चुनाव जीते तो वह सीधे तौर पर राज्यभर में लोगों के बीच जाकर यह बात दोहराएंगे और कहेंगे कि सम्राट चौधरी ज्यादा दिनों तक मुख्यमंत्री नहीं रहेंगे। इससे भाजपा के अंदरखाने शक्ति संतुलन बिगड़ जाएगा। कुल मिलाकर तीनों पार्टियों भाजपा, JDU और RJD को अपनी रणनीति बदलनी होगी। नए सिरे से समीकरण बनाने होंगे। 3. गठबंधन का स्वरूप बदलेगा बीते 35 सालों में बिहार में कोई पार्टी अपने दम पर सरकार नहीं बना पाई है। उसे सत्ता की कुर्सी पाने के लिए दूसरे दलों से गठबंधन करना ही पड़ा है। फिलहाल राज्य में दो गठबंधन है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) और महागठबंधन। NDA में 5 पार्टियां हैं-BJP, JDU, LJP(R), HAM, RLM। महागठबंधन में 7 पार्टियां हैं-RJD, कांग्रेस, माले, CPI, CPI(M), IIP, VIP। 4. वोट-कटवा से आगे बढ़कर 'गेम-चेंजर' की छवि 2025 बिहार विधानसभा चुनाव में जन सुराज को वोट-कटवा कहा गया। पार्टी 238 सीटों पर लड़ी, एक भी नहीं जीत पाई। 237 सीटों पर तो जमानत जब्त हो गई। हालांकि, एक सीट की जीत से गेम-चेंजर बनना आसान है, लेकिन उसे बनाए रखना मुश्किल। अगर अगले चुनावों में प्रदर्शन नहीं दिखाया तो यह छवि फिर से फीकी पड़ सकती है। PK कड़ी टक्कर देकर हारे तो 2 चीजें होनी तय 1. भाजपा का मनोबल टूटेगा अगर प्रशांत किशोर कड़ी टक्कर देकर हारते हैं (यानी भाजपा की जीत मुश्किल से होती है या वोट शेयर में भारी गिरावट आती है), तो पार्टी के अंदर और बाहर दोनों जगह मनोबल प्रभावित होगा। हालांकि, मनोबल पूरी तरह नहीं टूटेगा क्योंकि जीत तो हासिल हो जाएगी। लेकिन आसान जीत की धारणा खत्म हो जाएगी। जैसे- बांकीपुर को लेकर कहा था- कुत्ता, बिल्ली को भी टिकट देंगे तो जनता जीता देगी। इस तरह का आत्मविश्वास टूट जाएगा। 2. RJD-कांग्रेस को फौरी राहत, लेकिन टेंशन बढ़ेगी अगर प्रशांत किशोर हार जाते हैं तो महागठबंधन को तत्काल राहत मिलेगी कि तीसरी ताकत अभी पूरी तरह नहीं उभरी है। लेकिन कड़ी टक्कर का मतलब यह भी होगा कि उनका अपना वोट बैंक प्रभावित हो रहा है। हालांकि, यह राहत अस्थायी होगी। PK की मौजूदगी उन्हें लगातार सतर्क रखेगी और अपने एजेंडे रोजगार, पलायन, युवाओं के मुद्दे को और तेज करने के लिए मजबूर करेगी। प्रशांत किशोर अगर बुरी तरह हारे तब… 1. पुराने ढर्रे की राजनीति जारी रहेगी बिहार की राजनीति लंबे समय से जाति-आधारित समीकरण, परिवारवाद, गठबंधन की जुगत और स्थापित दलों BJP-JDU बनाम RJD-कांग्रेस के इर्द-गिर्द घूमती रही है। PK लगातार नया मॉडल (गवर्नेंस, मेरिट, जाति से ऊपर) की बात करते रहे हैं। 2. नए विकल्प तलाशने वालों को झटका 2025 के चुनाव और उसके बाद प्रशांत किशोर की यात्राओं ने कई युवा, शहरी, मिडिल क्लास और नाराज वोटरों में तीसरा विकल्प की उम्मीद जगाई थी। बांकीपुर में खुद मैदान में उतरकर उन्होंने इस उम्मीद को और मजबूत किया था। 3. जन सुराज कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटेगा जन सुराज अभी नई पार्टी है। 2025 में शून्य सीट के बाद कार्यकर्ताओं का मनोबल पहले से ही चुनौती में था। प्रशांत किशोर की खुद की उम्मीदवारी ने उन्हें नई ऊर्जा दी थी। हालांकि, अगर प्रशांत किशोर सक्रिय रहें और मुद्दों पर दबाव बनाए रखें तो कुछ समर्पित कार्यकर्ता टिके रह सकते हैं। लेकिन व्यापक मनोबल टूटना लगभग तय है। एक्सपर्ट पैनलः पॉलिटिकल एनालिस्ट संजय सिंह, प्रियदर्शी रंजन, केके लाल, सत्यभूषण सिंह।
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