Guru Purnima 2026: ईश्वर से भी ऊंचा होता है गुरु का स्थान... भगवान श्रीराम, श्रीकृष्ण, हनुमान और राक्षस रावण के गुरु कौन थे?
Guru Purnima 2026: गुरु पूर्णिमा का पर्व हर सास आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को मनाई जाती है. इस साल यह दिन आज यानी 29 जुलाई 2026 को मनाई जा रही है. यह दिन गुरुओं के प्रति आभार और सम्मान व्यक्त करने का दिन होता है. इस दिन पर सभी को अपने गुरुजनों की पूजा करनी चाहिए और उनसे आशीर्वाद लेना चाहिए. सनातन संस्कृति में शिष्य और गुरु के संबंध को बहुत खास बताया है. गुरुजनों का स्थान भगवान से भी ऊपर होता है. ऐसे में चलिए इस आर्टिकल में हम आपको बताते हैं कि आखिर भगवान के गुरु कौन-कौन थे? उन्होंने किससे शिक्षा प्राप्त की थी.
भगवान से भी बड़े होते हैं गुरु, क्यों?
गुरु को भगवान से भी बड़ा माना जाता है. कहते हैं कि व्यक्ति के जीवन की सही अर्थ उन्हें माता-पिता या ईश्वर नहीं बल्कि एक गुरु ही सिखा सकता है. गुरु ही मनुष्य को सही राह दिखाता है और सफलता के लिए उसे प्रेरित करता है. प्रसिद्ध संत कबीर दास जी ने एकबार कहा था- गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाय, बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय. इस दोहे का अर्थ है गुरु और भगवान दोनों सामने खड़े हों, तो पहले गुरु को प्रणाम करना चाहिए. गुरु ही है जो गोविंद यानी भगवान मिलाने का रास्ता प्रश्सत करवाता है.
भगवान श्रीकृष्ण के गुरु कौन थे?
पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान कृष्ण के गुरु महर्षि सांदीपनि थे. वे उज्जैन स्थित अपने आश्रम अवंतिका में रहते थे. उन्होंने वहीं, भगवान कृष्ण, बलराम और सुदामा को शिक्षा दी थी. श्रीकृष्ण ने महर्षि सांदीपनि से. 64 दिनों में चौंसठ कलाएं और 16 विद्याएं सीखी थीं. उन्हें वहां चारों वेद, उपनिषद, धनुर्विद्या, अस्त्र-शस्त्र संचालन और राजनीति के बारे में शिक्षा दी गई थी. शिक्षा पूरी करने के बाद कृष्ण भगवान ने गुरुजी की इच्छा के अनुसार उनके मृत/खोए हुए पुत्र को समुद्र से पुनः जीवित करके वापस लौटाया था.
दरअसल, महर्षि सांदिपनि के पुत्र को समुद्र के राक्षस शंखासुर ने निगल लिया था. उसके बाद श्रीकृष्ण समुद्र के भीतर गए. उन्होंने राक्षस का वध किया. लेकिन पेट में बच्चा नहीं मिला और उसके पेट से दिव्य शंख प्राप्त हुआ था. इस शंख को पाञ्चजन्य शंख कहा जाता है. इसे लेकर श्री कृष्ण और बलराम यमराज की नगरी (यमलोक) पहुंचे, यहां उन्होंने इस शंख से आवाज की जिससे यमराज प्रकट हुए. इसके बाद कृष्ण ने गुरु के पुत्र की आत्मा को पुन: शरीर देकर उन्हें सौंपा. श्री कृष्ण और बलराम ने जीवित गुरुपुत्र को ले जाकर महर्षि सांदीपनि और गुरु माता को सौंप दिया. कुछ ग्रंथों में लिखा गया है कि श्रीकृष्ण को आध्यात्मिक ज्ञान ऋषि घोर अंगिरस से मिला था.
मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के गुरु कौन थे?
त्रेतायुग के भगवान श्रीराम के गुरु मुख्य रूप से दो थे- महर्षि वशिष्ठ और महर्षि विश्वमित्र. महर्षि वशिष्ठ अयोध्या के कुलगुरु और राजपुरोहित थे. उन्होंने श्रीराम-लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न को प्रारंभिक शिक्षा दी थी. वहां उन्हें वेदों, उपनिषदों, राजनीति और आध्यात्मिक ज्ञान की शिक्षा मिली थी. वहीं, किशोरावस्था में भगवान राम और लक्ष्मण को महर्षि विश्वमित्र ने भी शिक्षा दी थी. वे उन्हें अपने साथ वन में ले गए थे ताकि वे राक्षसों के आतंक से लोगों की रक्षा कर सके. उन्होंने उन्हें ैताड़का वध और यज्ञ रक्षा के लिए प्रेरित किया था. विश्वमित्र ने श्रीराम को दिव्य अस्त्र-शस्त्र और धनुर्विद्या का विशेष ज्ञान दिया था.
हनुमान जी के गुरु कौन थे?
पवनपुत्र हनुमान जी के गुरु स्वयं भगवान सूर्यदेव थे. हनुमान जी ने सूर्यदेव को ही अपना प्रथम गुरु माना थआ और समस्त विद्याओं का ज्ञान उन्हीं से प्राप्त किया था. हनुमान जी ने सूर्य भगवान से चारों वेद, छह दर्शन, नौ व्याकरण और सभी शास्त्र सीखे थे. हनुमान जी की शिक्षा ग्रहण करने का तरीका भी अलग होता है. हनुमान जी सूर्यदेव के सामने रथ पर सवार होकर आकाश में उल्टी दिशा में चलते हुए अत्यंत तीव्रता से ज्ञान प्राप्त करते थे. सूर्यदेव ने गुरु दक्षिणा के रूप में हनुमान जी से मांगा था कि वे सदैव सुग्रीव की सहायता और रक्षा करेंगे, जो सूर्यदेव के ही अंश थे.
देवताओं के गुरु कौन थे?
गुरु बृहस्पति जिन्हें देवगुरु भी कहते हैं. वे सभी देवताओं के आधिकारिक गुरु माने जाते हैं. उन्होंने देवताओं को नीति और ज्ञान प्रदान किया था. देवगुरु बृहस्पति ने देवताओं की रक्षा, उनके उत्थान और दानवों पर विजय प्राप्त करने के लिए समय-समय पर कई महत्वपूर्ण कार्य और रणनीतियां बनाई थी. एक कथा के अनुसार, असुरों के गुरु शुक्राचार्य ने मृत संजीवनी विद्या सीखी थी, जिससे वे युद्ध में मरे हुए राक्षसों को वापस जीवित कर देते थे. इसका समाधान ढूंढने के लिए देवगुरु बृहस्पति ने अपने पुत्र कच को चालाकी और धैर्य के साथ शुक्राचार्य का शिष्य बनने भेजा. कच वहां से मृतसंजीवनी विद्या सीखकर आया, जिससे देवताओं को लाभ हुआ. देवताओं और दानवों के युद्ध के दौरान जब देवता रास्ता भटकते या संकट में होते, तो बृहस्पति ही उन्हें सही रणनीति बताया करते थे. एकबार देवराज इंद्र को अहंकार हो गया था, जिसकी वजह से उन्होंने देवगुरु का अपमान कर दिया था. इसके बाद वे वहां से तुरंत गायब हो गए थे. इसके बाद सभी देवों की बुद्धि भ्रष्ट होने लगी थी. जब देवराज इंद्र को आभास हुआ तो उन्होंने पश्चाताप किया तो बृहस्पति जी ने वापस लौटकर देवताओं को दोबारा संगठित किया.
असुरों के गुरु कौन थे?
असुरों-दानवों के गुरु शुक्राचार्य थे जिनका मूल नाम उशना बताया जाता है. वह महर्षि भृगु के पुत्र थे. उन्होंने भगवान शिव की कठोर तपस्या की थी और मृत असुरों को फिर से जीवित करने वाली मृतसंजीवनी विद्या प्राप्त की थी. शुक्राचार्य ने असुर साम्राज्य की पुनर्स्थापना की थी. देवताओं द्वारा बार-बार हराए जाने और स्वर्ग से निकाले जाने के बाद, उन्होंने असुरों को संगठित किया और उन्हें खोया हुआ वैभव वापस दिलाया था. उन्होंने राजा बलि का मार्गदर्शन किया था, जिससे बलि ने तीनों लोकों पर विजय हासिल की थी. इन्होंने असुरों को युद्ध कला, कूटनीति और राजनीति की शिक्षा दी, जिसे 'शुक्रनीति' के नाम से जाना जाता है.
क्या रावण का भी कोई गुरु था?
हां, रावण भी त्रेतायुग के राक्षस राजा थे. उनके गुरु स्वयं उनके पिता ऋषि विश्वा थे. रावण के पिता एक महान ज्ञानी थे. रावण ने शुरुआती वेद, शास्त्र और दर्शन की शिक्षा अपने पिता और दादा ऋषि पुलस्त्य से प्राप्त की थी. इसके बाद उन्होंने असुरों के गुरु शुक्राचार्य से उच्च विद्या, राजनीति, अस्त्र-शस्त्र चलाना और मृतसंजीवनी विद्या सीखी थी. रावण ने भगवान शिव को भी अपना आराध्य गुरु माना था और उनसे संगीत, तंत्र और युद्ध कला सीखी थी.
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