Explainer: इंडोनेशिया में क्यों कांप रही धरती? 7.7 के भूकंप से मची तबाही, जानिए जमीन के नीचे क्या चल रहा है
Indonesia Earthquakes: इंडोनेशिया में हाल ही में हुए विनाशकारी भूकंपों ने एक बार फिर पूरी दुनिया का ध्यान इस क्षेत्र की खतरनाक भूगर्भीय स्थिति की ओर आकर्षित किया है. महज चौबीस घंटे के भीतर में तीन बड़े भूकंपों और उसके बाद आए दो सौ से ज्यादा आफ्टरशॉक्स ने न केवल धरती को थर्रा दिया, बल्कि बड़े पैमाने पर जान-माल का नुकसान भी पहुंचाया था. फ्लोरेस द्वीप के पास आया 7.7 तीव्रता का शक्तिशाली भूकंप और उसके तुरंत बाद उत्तरी सुमात्रा में आया 6.9 तीव्रता का झटका इस बात का प्रमाण है कि यह क्षेत्र कितना संवेदनशील है. इस आपदा में अब तक दर्जनों लोगों की जान जा चुकी है और सैकड़ों परिवार बेघर हो चुके हैं. इस तरह की प्राकृतिक आपदाएं अक्सर यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि आखिर जमीन के नीचे ऐसा क्या चल रहा है जो इतनी बड़ी तबाही का कारण बनता है.
जमीन के नीचे छिपा है तबाही का कारण
इस पूरी तबाही का वास्तविक कारण जमीन के ऊपर नहीं बल्कि धरती की सतह से कई किलोमीटर गहराई में छिपा हुआ है. इंडोनेशिया एक ऐसे भौगोलिक क्षेत्र में बसा है जहां दुनिया की कई विशाल टेक्टोनिक प्लेटें आपस में टकराती हैं, एक-दूसरे के नीचे धंसती हैं और लगातार अपनी स्थिति बदलती रहती हैं. यही कारण है कि इस पूरे भूभाग में भूकंप और ज्वालामुखी जैसी गतिविधियां हमेशा सक्रिय रहती हैं. जब इन प्लेटों के बीच की यह आपसी हलचल चरम सीमा पर पहुंच जाती है, तो धरती का सीना चीरकर ऐसी आपदाएं बाहर आती हैं जो इंसान के वश में नहीं होतीं.
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टेक्टोनिक प्लेटों का यह जटिल जाल और ऑस्ट्रेलियन प्लेट की भूमिका इस क्षेत्र के लिए सबसे बड़ी चुनौती है. इंडोनेशिया मुख्य रूप से ऑस्ट्रेलियाई प्लेट, सुंडा प्लेट, प्रशांत प्लेट और फिलीपीन सी प्लेट के मिलने वाले बिंदु पर स्थित है. इनमें भी पूर्वी इंडोनेशिया का हिस्सा भूगर्भीय हलचल के लिहाज से सबसे ज्यादा संवेदनशील माना जाता है. यहां ऑस्ट्रेलियाई प्लेट लगातार उत्तर दिशा की ओर बढ़ रही है और कई स्थानों पर सुंडा प्लेट के ठीक नीचे धंसती जा रही है. विज्ञान की भाषा में इस प्रक्रिया को सबडक्शन कहा जाता है, जो अपने आप में भूकंपों का सबसे बड़ा कारखाना है.
जानें सतह पर क्यों महसूस होते है विनाशकारी झटके
सबडक्शन की इस लंबी और धीमी प्रक्रिया के दौरान दोनों प्लेटें हमेशा सुचारू रूप से एक-दूसरे के ऊपर से नहीं फिसलतीं. कई बार ऐसा होता है कि अत्यधिक घर्षण के कारण इन प्लेटों का संपर्क क्षेत्र आपस में बुरी तरह लॉक हो जाता है. प्लेटों की आगे बढ़ने की गति रुकती नहीं है, लेकिन उनके आपस में फंसे रहने के कारण उनके भीतर भारी तनाव और ऊर्जा का संचय होने लगता है. यह अदृश्य तनाव वर्षों, दशकों और कभी-कभी सदियों तक लगातार बढ़ता रहता है. जब चट्टानें इस आंतरिक दबाव को झेलने की अपनी आखिरी सीमा पार कर लेती हैं, तो वह लॉक अचानक टूट जाता है. इसी टूटने के क्षण में सदियों से जमा हुई अपार ऊर्जा भूकंपीय तरंगों के रूप में चारों तरफ फैल जाती है और हमें सतह पर विनाशकारी झटके महसूस होते हैं.
7.7 तीव्रता का भूकंप क्यों था खतरनाक
फ्लोरेस द्वीप के पास आया 7.7 तीव्रता का भूकंप इसलिए भी अत्यधिक खतरनाक साबित हुआ क्योंकि इसका उद्गम केंद्र समुद्र तल के नीचे बहुत अधिक गहराई पर नहीं था.विज्ञान के अनुसार, जब कोई भूकंप जमीन या समुद्र के नीचे कम गहराई पर आता है, तो उसकी ऊर्जा को सतह तक पहुंचने के लिए बहुत कम दूरी तय करनी पड़ती है. यही कारण है कि ऐसे उथले भूकंप जमीन पर बहुत तीव्र कंपन पैदा करते हैं और उनके द्वारा मचाई जाने वाली तबाही का दायरा बहुत बड़ा होता है. इसके अलावा, जब समुद्र के नीचे इस तरह का उथला और शक्तिशाली भूकंप आता है, तो वह समुद्र तल को ऊपर या नीचे की ओर धकेल देता है, जिससे पानी में अचानक भारी हलचल पैदा होती है और सुनामी का खतरा कई गुना बढ़ जाता है. यही वजह थी कि इस झटके के तुरंत बाद प्रशासन को सुनामी की चेतावनी जारी करनी पड़ी ताकि तटीय इलाकों के लोगों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया जा सके.
भूकंप के बाद आफ्टरशॉक्स का सिलसिला होता है शुरू
मुख्य भूकंप के थम जाने के बाद भी खतरे का टल जाना मुमकिन नहीं होता क्योंकि इसके बाद आने वाले छोटे और मध्यम झटके यानी आफ्टरशॉक्स का सिलसिला शुरू हो जाता है. जब एक बार बड़ा भूकंप आ जाता है, तो फॉल्ट लाइन के आस-पास का पूरा भूगर्भीय संतुलन पूरी तरह बिगड़ जाता है. उस क्षेत्र की टूटी-फूटी चट्टानें नए दबाव और नई स्थिति के अनुसार खुद को ढालने की कोशिश करती हैं, और इसी समायोजन की प्रक्रिया में लगातार झटके आते रहते हैं. ये आफ्टरशॉक्स कुछ घंटों से लेकर कई दिनों, हफ्तों और कई बार महीनों तक स्थानीय लोगों को डराते रहते हैं.
1992 में भी आया था भयानक भूकंप
यह पहला मौका नहीं है जब फ्लोरेस और उसके आस-पास के इस क्षेत्र ने इस तरह की विभीषिका का सामना किया हो. इतिहास इस बात गवाह है कि वर्ष 1992 में भी इसी व्यापक क्षेत्र में 7.5 तीव्रता का एक भयानक भूकंप आया था जिसने अपने पीछे तबाही का एक अंतहीन सिलसिला और एक विनाशकारी सुनामी छोड़ी थी. उस समय भी भारी संख्या में लोगों की जान गई थी और पूरा क्षेत्र खंडहर में तब्दील हो गया था. इससे यह स्पष्ट होता है कि इस क्षेत्र में रहने वाले लोगों के लिए यह खतरा कोई नया या अचानक सामने आया अजूबा नहीं है, बल्कि यह उनकी भौगोलिक वास्तविकता का एक कड़वा हिस्सा है.
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इंडोनेशिया की इस लगातार होती भूगर्भीय हलचल को पूरी तरह समझने के लिए पैसिफिक रिंग ऑफ फायर को समझना भी उतना ही आवश्यक है. यह प्रशांत महासागर के चारों तरफ फैला हुआ एक विशाल घोड़े की नाल के आकार का क्षेत्र है, जहां दुनिया की सबसे बड़ी टेक्टोनिक प्लेटों की सीमाएं आपस में मिलती हैं. दुनिया के अधिकांश बड़े भूकंप और अधिकांश सक्रिय ज्वालामुखी इसी घेरे के भीतर पाए जाते हैं. इंडोनेशिया इसी रिंग ऑफ फायर का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और सक्रिय हिस्सा है, जिसके कारण यहां की धरती कभी भी पूरी तरह शांत नहीं रहती.
जानें कब तक आते रहेंगे भयानक भूंकप
हाल ही में पंद्रह अगस्त के आसपास आए ये भूकंप केवल छिटपुट या स्थानीय घटनाएं नहीं हैं, बल्कि वे इस बात की लगातार याद दिलाते हैं कि इंडोनेशिया की धरती के नीचे भूगर्भीय प्लेटों की यह मूक लड़ाई बिना रुके जारी है. जब तक ये टेक्टोनिक प्लेटें एक-दूसरे की तरफ बढ़ती रहेंगी, टकराती रहेंगी और एक-दूसरे के नीचे धंसती रहेंगी, तब तक इस क्षेत्र में शक्तिशाली भूकंप आने की संभावना हमेशा बनी रहेगी. विज्ञान और तकनीक आज इतनी तरक्की कर चुके हैं कि वे भूकंप के सटीक समय की भविष्यवाणी तो नहीं कर सकते, लेकिन बेहतर निगरानी प्रणालियों, उन्नत सेंसरों, भूकंपरोधी यानी मजबूत निर्माण शैली, समय पर मिलने वाली सुनामी चेतावनियों और आम जनता की पुख्ता तैयारी के माध्यम से इसके विनाशकारी प्रभावों को काफी हद तक कम जरूर किया जा सकता है. मानव जाति प्रकृति की इन विशाल शक्तियों को रोक तो नहीं सकती, लेकिन समझदारी और मुस्तैदी से अपनी सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम जरूर कर सकती है.
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Baby Sweating at Night: बच्चे को रात में पसीना आना अक्सर गर्मी, भारी कपड़ों या बिस्तर की वजह से हो सकता है, लेकिन ठंडे कमरे में भी लगातार बहुत ज्यादा पसीना आए तो दूसरे लक्षणों पर ध्यान दें. खर्राटे, सांस रुकना, बुखार या कमजोरी जैसे संकेत हों तो बाल रोग विशेषज्ञ से सलाह लेना समझदारी है.
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