Explainer: ट्रंप और किम की फिर होगी मुलाकात? समझिए क्यों पिघल रही अमेरिका-नॉर्थ कोरिया की 'बर्फ'
Donald Trump Kim Jong: अंतरराष्ट्रीय राजनीति के रंगमंच पर अमेरिका और उत्तर कोरिया के रिश्ते हमेशा से ही अप्रत्याशित और नाटकीय रहे हैं. एक बार फिर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उत्तर कोरिया के शीर्ष नेता किम जोंग उन के बीच संभावित मुलाकात को लेकर कूटनीतिक गलियारों में सुगबुगाहट तेज हो गई है. एशिया-प्रशांत आर्थिक सहयोग (APEC) सम्मेलन के आसपास इस शिखर वार्ता के कयास लगाए जा रहे हैं. ट्रंप अपनी व्यक्तिगत कूटनीति और खुद को एक कुशल समझौतेबाज के रूप में स्थापित करने के लिए प्योंगयांग के साथ संवाद की मेज पर लौटने की तैयारी कर रहे हैं. हालांकि, इस बार की परिस्थितियां पिछली वार्ताओं की तुलना में पूरी तरह भिन्न हैं, और प्योंगयांग का रुख पहले से कहीं अधिक आक्रामक और स्वतंत्र दिखाई दे रहा है.
कोरियाई प्रायद्वीप में सुरक्षा संकट
इस कूटनीतिक पहल के बीच कोरियाई प्रायद्वीप में सुरक्षा समीकरणों में भारी फेरबदल देखा जा रहा है. अमेरिकी नेतृत्व द्वारा दक्षिण कोरिया के साथ होने वाले पारंपरिक संयुक्त सैन्य अभ्यासों को सीमित करने और उनके भारी वित्तीय खर्चों पर सवाल उठाने से वाशिंगटन के अपने पुराने सहयोगी के साथ रिश्तों में असहजता पैदा हुई है. इस तरह के कदमों से सियोल में यह संदेश गया है कि अमेरिका अपनी तात्कालिक राजनीतिक प्राथमिकताओं के लिए दीर्घकालिक सुरक्षा साझेदारियों की अनदेखी कर रहा है. उत्तर कोरिया के खिलाफ दशकों से तैयार साझा प्रतिरोध तंत्र में इस प्रकार का लचीलापन क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को गहराई से प्रभावित कर रहा है.
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2018 में हुई थी पहली बैठक
वर्तमान वार्ता के प्रयासों को समझने के लिए पूर्व के घटनाक्रमों पर नजर डालना जरूरी है. वर्ष 2018 में सिंगापुर में हुई पहली ऐतिहासिक बैठक ने उम्मीद जगाई थी कि दोनों देश परमाणु निरस्त्रीकरण की दिशा में कोई ठोस रास्ता निकाल सकते हैं. इसके बाद वर्ष 2019 में वियतनाम के हनोई में आयोजित दूसरा शिखर सम्मेलन पूरी तरह बेनतीजा रहा, क्योंकि आर्थिक प्रतिबंधों को हटाने और परमाणु कार्यक्रमों को रोकने के मुद्दे पर दोनों पक्ष किसी सहमति पर नहीं पहुंच सके. उसी वर्ष दोनों नेताओं की कोरियाई सीमा पर डिमिलिटराइज्ड जोन में हुई प्रतीकात्मक मुलाकात सुर्खियों में जरूर रही, लेकिन ठोस नीतिगत स्तर पर कोई स्थायी बदलाव लाने में विफल रही. इन ऐतिहासिक अनुभवों ने प्योंगयांग को अमेरिकी प्रस्तावों को लेकर अत्यधिक सतर्क बना दिया है.
2019 के बाद किम ने हथियार बनाने में दिया ध्यान
वर्ष 2019 के बाद से उत्तर कोरिया की रक्षा नीति में आमूलचूल बदलाव आया है. उस दौर में जहां किम जोंग उन आर्थिक पाबंदियों से राहत पाने के लिए कूटनीतिक समझौते की तलाश में थे, वहीं बीते वर्षों में उन्होंने अपना पूरा ध्यान सैन्य आत्मनिर्भरता और संहारक हथियारों के विकास पर केंद्रित किया. वर्तमान में उत्तर कोरिया ने ऐसी अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइलों और परमाणु वॉरहेड्स की श्रृंखला विकसित कर ली है, जो सीधे अमेरिकी मुख्य भूमि तक मार करने की क्षमता रखती हैं. इस ठोस परमाणु प्रतिरोधक क्षमता के निर्माण के बाद अब उत्तर कोरियाई नेतृत्व को किसी भी रक्षात्मक समझौते के लिए अमेरिका के सामने झुकने या रियायतें मांगने की कोई रणनीतिक आवश्यकता महसूस नहीं होती.
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वैश्विक भू-राजनीति में आए बदलावों, विशेषकर रूस और यूक्रेन के टकराव ने उत्तर कोरिया को एक अभूतपूर्व अवसर प्रदान किया. प्योंगयांग ने मॉस्को को व्यापक स्तर पर गोला-बारूद, पारंपरिक हथियार और सैन्य सहायता उपलब्ध कराकर एक मजबूत रणनीतिक साझेदारी स्थापित की. इस सहयोग से उत्तर कोरियाई सेना को आधुनिक युद्धक्षेत्र में सैन्य उपकरणों के इस्तेमाल का व्यावहारिक अनुभव मिला, जिसकी कमी वह लंबे समय से महसूस कर रही थी. इसके बदले में रूस से उन्नत उपग्रह प्रणालियां, अंतरिक्ष तकनीक और मिसाइल इंजीनियरिंग हासिल कर उत्तर कोरिया ने अपनी तकनीकी क्षमताओं को कई गुना बढ़ा लिया है. इस नए ध्रुवीकरण ने किम जोंग उन के आत्मविश्वास को वैश्विक स्तर पर मजबूती दी है.
एक समय ऐसा था जब उत्तर कोरिया के लगातार मिसाइल परीक्षणों के चलते बीजिंग और प्योंगयांग के बीच कूटनीतिक दूरियां बढ़ गई थीं. परंतु वर्तमान अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में जब अमेरिका और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा तीव्र हो चुकी है, चीन ने उत्तर कोरिया के साथ अपने संबंधों को फिर से प्रगाढ़ कर लिया है. इसके साथ ही, सख्त अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के बावजूद उत्तर कोरिया ने वैकल्पिक व्यापारिक मार्गों, रणनीतिक साझेदारियों और डिजिटल माध्यमों के जरिए अपनी अर्थव्यवस्था को स्थिर रखने के रास्ते खोज लिए हैं. आर्थिक रूप से बाहरी दबाव को झेलने की इस क्षमता ने प्योंगयांग को अमेरिकी आर्थिक रियायतों के प्रलोभन से पूरी तरह मुक्त कर दिया है.
दिखावे की कूटनीति के प्रति प्योंगयांग की सतर्कता
उत्तर कोरिया का नेतृत्व भली-भांति समझता है कि वाशिंगटन की कूटनीतिक घोषणाओं और उसकी वास्तविक प्रशासनिक नीतियों में अक्सर बड़ा अंतर होता है. सार्वजनिक मंचों पर सैन्य अभ्यास सीमित करने जैसे बयानों के बावजूद जमीनी स्तर पर अमेरिकी विदेश और रक्षा नीतियां अपने निर्धारित एजेंडे पर ही चलती हैं. पिछले समझौतों से एकतरफा हटने और बयानों के बार-बार बदलने के अनुभवों ने किम जोंग उन को यह सिखाया है कि केवल हेडलाइंस बटोरने वाली वार्ताओं से कोई वास्तविक सुरक्षा गारंटी नहीं मिलती. इसलिए उत्तर कोरिया किसी भी ऐसी बातचीत में शामिल होने से बच रहा है, जिसमें केवल दिखावटी कूटनीति हो और ठोस रणनीतिक लाभ न हों.
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समकालीन विश्व व्यवस्था में उत्तर कोरिया की रणनीति अन्य देशों के लिए एक गंभीर रणनीतिक अध्ययन का विषय बन गई है. वर्ष 2003 में परमाणु अप्रसार संधि से अलग होने के बाद प्योंगयांग ने तमाम अंतरराष्ट्रीय दबावों और प्रतिबंधों को झेलते हुए अपनी संप्रभुता की ढाल के रूप में परमाणु हथियारों को प्राथमिकता दी. इसके विपरीत, जिन देशों ने अंतरराष्ट्रीय समझौतों पर निर्भर रहकर अपने रक्षा कार्यक्रमों को सीमित किया, उन्हें गंभीर सैन्य और राजनीतिक अस्थिरता का सामना करना पड़ा. इस तुलनात्मक यथार्थ ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में केवल वास्तविक सैन्य शक्ति ही संप्रभुता की अंतिम गारंटी होती है.
किम के पास अधुनिक परमाणु हथियार
वर्तमान समय में किम जोंग उन किसी कमजोर या समझौते के लिए बेताब नेता की स्थिति में नहीं हैं. एक ओर जहां उनके पास अमेरिका तक मार करने वाले आधुनिक परमाणु हथियार हैं, वहीं दूसरी ओर रूस और चीन जैसी महाशक्तियों का कूटनीतिक और तकनीकी समर्थन भी उनके साथ है. डोनाल्ड ट्रंप यदि अपनी पुरानी शैली में बातचीत की मेज पर लौटने का प्रयास करते हैं, तो उन्हें यह समझना होगा कि प्योंगयांग अब बिना किसी ठोस, बराबरी के और अपरिवर्तनीय रणनीतिक समझौते के किसी भी दिखावटी वार्ता का हिस्सा बनने को तैयार नहीं है. शक्ति के इस नए संतुलन ने कोरियाई प्रायद्वीप के भविष्य को और अधिक जटिल बना दिया है.
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वैश्विक तनाव और ऊंचे बॉन्ड यील्ड के दबाव में टूटा सोने-चांदी का भाव, सिल्वर करीब 2 प्रतिशत फिसला
मुंबई, 19 अगस्त (आईएएनएस)। वैश्विक बाजारों से मिले कमजोर संकेतों के बीच बुधवार को घरेलू सर्राफा और वायदा बाजार में सोने-चांदी की कीमतों में तेज गिरावट दर्ज की गई। बढ़ते अमेरिकी बॉन्ड यील्ड, कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और वैश्विक स्तर पर सुरक्षित निवेश की बदलती धारणा के कारण कीमती धातुओं पर दबाव बना हुआ है, जिसका असर मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (एमसीएक्स) पर भी साफ दिखाई दिया, जहां सोना 1.54 लाख रुपए प्रति 10 ग्राम से नीचे फिसल गया, जबकि चांदी 2.30 लाख रुपए प्रति किलोग्राम के स्तर से नीचे आ गई।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में हाजिर सोना 4,350 डॉलर प्रति औंस के नीचे कारोबार करता नजर आया, जबकि हाजिर चांदी करीब 62.8 डॉलर प्रति औंस के आसपास संघर्ष करती रही। वैश्विक बाजारों में आई इस कमजोरी का सीधा असर भारतीय बाजार पर पड़ा, जिससे निवेशकों में बिकवाली का दबाव बढ़ गया।
घरेलू वायदा बाजार में सबसे ज्यादा दबाव चांदी पर देखने को मिला। एमसीएक्स पर सितंबर डिलीवरी वाली चांदी का भाव पिछले कारोबारी सत्र के बंद स्तर 2,32,419 रुपए प्रति किलोग्राम से टूटकर 2,27,931 रुपए प्रति किलोग्राम के दिन के निचले स्तर तक आ गया। इस दौरान चांदी में 4,488 रुपए यानी 1.93 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। हालांकि खबर लिखे जाने तक यह चांदी 1.61 प्रतिशत यानी 3,734 रुपए की गिरावट के साथ 2,28,685 रुपए प्रति किलोग्राम पर कारोबार करती नजर आई।
बाजार विश्लेषकों का कहना है कि व्यापक कमोडिटी कमजोरी और मुनाफावसूली के कारण चांदी में अधिक दबाव देखने को मिला।
इस बीच, सोने की कीमतों में भी कमजोरी बनी रही। एमसीएक्स पर अक्टूबर डिलीवरी वाला गोल्ड फ्यूचर्स 1.54 लाख रुपए प्रति 10 ग्राम के स्तर से नीचे फिसल गया, और दिन के कारोबार में यह अपने पिछले बंद 1,54,262 रुपए से 0.55 प्रतिशत यानी 858 रुपए फिसलकर 1,53,404 रुपए प्रति 10 ग्राम के दिन के निचले स्तर पर पहुंच गया।
वहीं खबर लिखे जाने तक सोना 0.38 प्रतिशत यानी 581 रुपए की गिरावट के साथ 1,53,681 रुपए प्रति 10 ग्राम पर कारोबार करता नजर आया। अंतरराष्ट्रीय बाजार में हाजिर सोने की कीमतों में नरमी और मजबूत डॉलर इंडेक्स ने भी सोने की चाल को प्रभावित किया।
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि निकट अवधि में सोना और चांदी दोनों की दिशा अमेरिकी आर्थिक आंकड़ों, फेडरल रिजर्व की ब्याज दर नीति और मध्य पूर्व की भू-राजनीतिक स्थिति पर निर्भर करेगी। यदि बॉन्ड यील्ड और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी बनी रहती है, तो कीमती धातुओं पर दबाव जारी रह सकता है। हालांकि किसी भी नए वैश्विक तनाव या ब्याज दर कटौती की उम्मीद मजबूत होने की स्थिति में सोना और चांदी दोबारा सुरक्षित निवेश विकल्प के रूप में आकर्षण का केंद्र बन सकते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिका में ट्रेजरी यील्ड में लगातार बढ़ोतरी कीमती धातुओं के लिए प्रमुख नकारात्मक कारक बनी हुई है। 30 वर्षीय अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड करीब 19 वर्षों के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई है, जबकि अन्य सरकारी बॉन्ड यील्ड भी कई दशकों के रिकॉर्ड स्तर पर कारोबार कर रहे हैं। ऊंचे बॉन्ड यील्ड निवेशकों को सुरक्षित और निश्चित रिटर्न वाले विकल्पों की ओर आकर्षित करते हैं, जिससे सोने और चांदी जैसी बिना ब्याज वाली संपत्तियों की मांग प्रभावित होती है।
वहीं, कच्चे तेल की कीमतों में जारी तेजी ने भी बाजार की चिंता बढ़ा दी है। अमेरिकी डब्ल्यूटीआई क्रूड और ब्रेंट क्रूड की कीमतें क्रमशः लगभग 85.5 डॉलर और 91.5 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी हुई हैं। कच्चे तेल की ऊंची कीमतों से वैश्विक महंगाई बढ़ने की आशंका पैदा होती है, जिससे ब्याज दरों के लंबे समय तक ऊंचे बने रहने की संभावना मजबूत होती है। इसका दबाव भी कीमती धातुओं पर दिखाई दे रहा है।
मध्य पूर्व में जारी तनाव भी बाजार की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम होने के कोई स्पष्ट संकेत नहीं मिले हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य में सुरक्षा स्थिति को लेकर चिंताएं बनी हुई हैं और समुद्री जहाजों पर हमलों की घटनाओं ने ऊर्जा आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता बढ़ा दी है। इसी वजह से निवेशक अब अमेरिकी फेडरल रिजर्व की जुलाई बैठक के मिनट्स और जैक्सन होल संगोष्ठी में फेड चेयरमैन के संभावित संकेतों का इंतजार कर रहे हैं, जिससे आगे की मौद्रिक नीति की दिशा स्पष्ट हो सके।
--आईएएनएस
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