EPFO: खुशखबरी! ईपीएफओ ने सब्सक्राइबर्स के अकाउंट में इंटरेस्ट का पैसा ट्रांसफर किया, अपना पीएफ बैलेंस ऐसे चेक करें
EPFO: ईपीएफ के कई सब्सक्राइबर्स को इंटरेस्ट अमाउंट क्रेडिट होने के एसएमएस आए हैं। उनमें बताया गया है कि FY26 के इंटरेस्ट का पैसा उनके अकाउंट में ट्रांसफर कर दिया गया है। हालांकि, इस बात की संभावना है कि इंटरेस्ट ट्रांसफर अलर्ट मिलने के बावजूद आपके ईपीएफ में तुरंत रिवाइज्ड बैलेंस नहीं दिखे
द इंडिया स्टोरी मूवी रिव्यू:बड़ा मुद्दा भी नहीं बचा पाया फिल्म को, कमजोर लेखन और बेजान कोर्टरूम ड्रामा ने किया पूरा खेल खराब
सिनेमा की सबसे बड़ी ताकत यही होती है कि वह मनोरंजन के साथ समाज के जरूरी सवाल भी उठा सके। द इंडिया स्टोरी भी कीटनाशकों, मिलावटी भोजन और बढ़ते कैंसर जैसे बेहद गंभीर विषय को पर्दे पर लाती है। विषय ऐसा है जो हर परिवार से जुड़ा है और जिस पर मजबूत फिल्म बन सकती थी। लेकिन अफसोस, यहां इरादे बड़े हैं और फिल्म बेहद छोटी साबित होती है। कमजोर पटकथा, बिखरा स्क्रीनप्ले, फीका कोर्टरूम ड्रामा और जरूरत से ज्यादा मेलोड्रामा मिलकर इस फिल्म को एक औसत अनुभव बना देते हैं। इस फिल्म की लेंथ 2 घंटा 20 मिनट है। दैनिक भास्कर ने इस फिल्म को 5 में से 2 स्टार रेटिंग दी है। कैसी है फिल्म की कहानी? कहानी पूर्व सैन्य अधिकारी मेजर योगेश पाटिल (श्रेयस तलपड़े) की है, जिसकी छोटी बेटी परी (त्रिशा शारदा) कैंसर की वजह से दुनिया छोड़ देती है। जांच के दौरान योगेश को पता चलता है कि उसकी बेटी की बीमारी के पीछे फलों, सब्जियों, दूध और दूसरे खाद्य पदार्थों में मौजूद जहरीले कीटनाशक हैं। इसके बाद वह सरकार, कीटनाशक कंपनियों और जरूरत से ज्यादा रसायनों का इस्तेमाल करने वाले किसानों को अदालत में कटघरे में खड़ा कर देता है। इस कानूनी लड़ाई में उसका साथ देती हैं वकील अर्चना (काजल अग्रवाल)। अदालत में सुनवाई शुरू होती है और यहीं से फिल्म को उड़ान भरनी चाहिए थी। लेकिन पूरी बहस इतनी कमजोर लिखी गई है कि मामला कभी रोमांचक बन ही नहीं पाता। विपक्ष के वकील (मनीष वाधवा) को भी सिर्फ औपचारिक मौजूदगी तक सीमित कर दिया गया है। न कोई जोरदार जिरह होती है, न चौंकाने वाले सबूत सामने आते हैं और न ही ऐसा कोई दृश्य जो दर्शकों से तालियां बटोर सके। आखिर तक फिल्म सिर्फ एक ही बात दोहराती रहती है। स्टारकास्ट की एक्टिंग कैसी है? श्रेयस तलपड़े पूरी ईमानदारी से अपना किरदार निभाते हैं। बेटी को खोने वाले पिता का दर्द उनके चेहरे पर साफ दिखता है, लेकिन कमजोर लेखन उनके अभिनय को ऊंचाई तक नहीं पहुंचने देता। काजल अग्रवाल का अभिनय ठीक है, लेकिन अदालत में उनका किरदार प्रभाव नहीं छोड़ता। इतने बड़े केस की वकील होने के बावजूद उनके हिस्से कोई ऐसा दृश्य नहीं आता जो याद रह जाए। बाल कलाकार त्रिशा शारदा फिल्म की सबसे मजबूत कड़ी हैं। बीमारी से जूझती बच्ची के रूप में वह दिल छू जाती हैं। मुरली शर्मा अपनी छोटी भूमिका में असर छोड़ते हैं, जबकि मनीष वाधवा जैसे सशक्त अभिनेता का पूरा इस्तेमाल ही नहीं किया गया। निर्देशन और तकनीकी पक्ष निर्देशक चेतन डीके का उद्देश्य अच्छा है, लेकिन फिल्म बनाने का तरीका बेहद साधारण है। स्क्रीनप्ले बिखरा हुआ है और कई दृश्य कहानी को आगे बढ़ाने के बजाय सिर्फ जानकारी देने का काम करते हैं। सबसे बड़ी कमी कोर्टरूम ड्रामा में दिखाई देती है। जहां तेज बहस, मजबूत तर्क और कानूनी दांवपेंच होने चाहिए थे, वहां सब कुछ बेहद आसान और सपाट नजर आता है। सरकार, मीडिया और बड़ी कंपनियों जैसे अहम पहलुओं को भी सतही तरीके से दिखाया गया है। पहला हिस्सा डॉक्यूमेंट्री जैसा महसूस होता है, जबकि दूसरा हिस्सा जरूरत से ज्यादा भावुक हो जाता है। संपादन भी ढीला है और फिल्म कई जगह अपनी रफ्तार खो देती है। कैमरा वर्क और प्रोडक्शन डिजाइन सामान्य हैं। तकनीकी रूप से फिल्म में ऐसा कुछ नहीं है जो बड़े पर्दे का अनुभव खास बना सके। कैसा है फिल्म का म्यूजिक? संगीत पूरी तरह निराश करता है। कोई भी गीत याद नहीं रहता और पृष्ठभूमि संगीत भी फिल्म की भावनाओं को ज्यादा ऊंचाई नहीं दे पाता। फाइनल वर्डिक्ट: देखें या नहीं? द इंडिया स्टोरी इस बात का उदाहरण है कि सिर्फ अच्छा विषय किसी फिल्म को अच्छा नहीं बना सकता। जब पटकथा कमजोर हो, कोर्टरूम ड्रामा बेजान हो और निर्देशन में धार न हो, तो सबसे जरूरी मुद्दा भी अपना असर खो देता है। अगर आपका मकसद सिर्फ कीटनाशकों के नुकसान के बारे में जानना है तो फिल्म एक जानकारी जरूर देती है। लेकिन एक प्रभावशाली कोर्टरूम ड्रामा और मजबूत सिनेमाई अनुभव की उम्मीद लेकर जाएंगे तो यह फिल्म निराश ही करेगी।

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