यूपी रोडवेज का सफर होगा हाईटेक, योगी सरकार खरीदेगी 250 नई एसी इलेक्ट्रिक बसें
उत्तर प्रदेश में सार्वजनिक परिवहन को आधुनिक बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है. राज्य सरकार ने उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम (UPSRTC) के बेड़े में 250 नई एसी इलेक्ट्रिक बसें शामिल करने की मंजूरी दे दी है. इस परियोजना पर लगभग 425.50 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे. नई बसों के शामिल होने से यात्रियों को आरामदायक, सुरक्षित और पर्यावरण के अनुकूल यात्रा का अनुभव मिलेगा.
सरकार का उद्देश्य एक ओर सार्वजनिक परिवहन की गुणवत्ता बढ़ाना है, वहीं दूसरी ओर प्रदूषण कम करने और हरित परिवहन को बढ़ावा देना भी है.
कितनी और कैसी होंगी नई इलेक्ट्रिक बसें?
योजना के तहत दो अलग-अलग श्रेणियों की आधुनिक एसी इलेक्ट्रिक बसें खरीदी जाएंगी.
- 100 एसी इलेक्ट्रिक बसें - 12 मीटर लंबी और 50 सीट क्षमता वाली
- 150 एसी इलेक्ट्रिक बसें - 12 मीटर लंबी और 42 सीट क्षमता वाली
इन सभी बसों में यात्रियों की सुविधा और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए आधुनिक तकनीक और बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी.
425 करोड़ रुपये से अधिक होगी लागत
नई बसों की खरीद पर कुल 425.50 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है. इसमें...
- 400 करोड़ रुपये राज्य सरकार उपलब्ध कराएगी
- 25.50 करोड़ रुपये उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम अपने संसाधनों से खर्च करेगा
सरकार का मानना है कि यह निवेश लंबे समय में ईंधन लागत कम करने और पर्यावरण संरक्षण में भी मददगार साबित होगा.
प्रदेश के उद्योगों को भी मिलेगा बढ़ावा
नई इलेक्ट्रिक बसों की खरीद में उत्तर प्रदेश के निर्माताओं को प्राथमिकता देने का प्रावधान किया गया है. इससे राज्य के औद्योगिक क्षेत्र को बढ़ावा मिलने के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी बढ़ सकते हैं.
सरकार का यह कदम 'मेक इन यूपी' और स्थानीय विनिर्माण को प्रोत्साहित करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
प्रदूषण नियंत्रण के लक्ष्य को मिलेगी मजबूती
परिवहन विभाग के अनुसार, यह फैसला राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) में वायु प्रदूषण नियंत्रण से जुड़े दिशा-निर्देशों के अनुरूप भी है.
एक नवंबर 2026 से दिल्ली में केवल सीएनजी, इलेक्ट्रिक और बीएस-6 मानक वाले वाहनों को प्रवेश की अनुमति देने का प्रावधान लागू होना है. ऐसे में इलेक्ट्रिक बसों का बेड़ा बढ़ने से उत्तर प्रदेश से दिल्ली जाने वाले यात्रियों के लिए भी सुविधा बढ़ेगी.
धार्मिक और पर्यटन स्थलों तक होगी बेहतर कनेक्टिविटी
नई इलेक्ट्रिक बसों का संचालन प्रदेश के प्रमुख धार्मिक और पर्यटन स्थलों तक भी किया जाएगा. इससे अयोध्या, वाराणसी, प्रयागराज, मथुरा, वृंदावन, चित्रकूट और अन्य प्रमुख पर्यटन स्थलों की यात्रा अधिक आरामदायक और सुविधाजनक बनने की उम्मीद है. साथ ही लंबी दूरी की यात्रा में यात्रियों को आधुनिक परिवहन का लाभ मिलेगा.
पहले से चल रही हैं सैकड़ों इलेक्ट्रिक बसें
उत्तर प्रदेश में इलेक्ट्रिक बसों का विस्तार पहले से जारी है. वर्तमान में प्रदेश के विभिन्न शहरों में 743 से अधिक इलेक्ट्रिक बसें संचालित हो रही हैं. इनका उपयोग मुख्य रूप से शहरी परिवहन सेवाओं में किया जा रहा है.
हाल ही में लखनऊ और गौतमबुद्ध नगर (नोएडा) के प्रमुख मार्गों पर भी 45 नई इलेक्ट्रिक बसों को सेवा में शामिल किया गया है.
यूपी रोडवेज का बेड़ा लगातार हो रहा मजबूत
उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम के पास वर्तमान में लगभग 13 हजार से अधिक डीजल और सीएनजी बसें संचालित हैं. अब इलेक्ट्रिक बसों की संख्या बढ़ने से रोडवेज का बेड़ा और अधिक आधुनिक तथा पर्यावरण के अनुकूल बन सकेगा.
सरकार का लक्ष्य आने वाले वर्षों में चरणबद्ध तरीके से पारंपरिक ईंधन वाली बसों के साथ इलेक्ट्रिक बसों की हिस्सेदारी बढ़ाना है.
250 नई एसी इलेक्ट्रिक बसों की खरीद का फैसला उत्तर प्रदेश की सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को नई दिशा देने वाला कदम माना जा रहा है. इससे यात्रियों को आरामदायक और सुरक्षित सफर मिलेगा, वहीं प्रदूषण कम करने और हरित ऊर्जा को बढ़ावा देने में भी मदद मिलेगी. आधुनिक तकनीक से लैस इन बसों के संचालन से रोडवेज सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार होने के साथ प्रदेश के धार्मिक, पर्यटन और व्यावसायिक मार्गों पर यात्रा पहले से अधिक सुविधाजनक होने की उम्मीद है.
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Caliber Mining IPO: 411 करोड़ का ऑपरेटिंग कैश, फिर भी 1,631 करोड़ का कर्ज, क्या इस IPO में है दम?
Caliber Mining IPO: कैलिबर माइनिंग एंड लॉजिस्टिक्स ने FY26 में ₹411 करोड़ का ऑपरेटिंग कैश कमाया, जो कंपनी के इतिहास का सबसे अच्छा साल था. फिर उसी साल कंपनी पर ₹366 करोड़ का और कर्ज चढ़ गया. अप्रैल 2026 के आखिर तक उसका कर्ज बढ़कर ₹1,631 करोड़ हो गया, जबकि उसके पास कैश सिर्फ ₹7 करोड़ था. और अब यही कंपनी पब्लिक इंवेस्टर्स से ₹450 करोड़ जुटाना चाहती है, अपनी कमाई के 17 गुना वैल्यूएशन पर. असल में, कंपनी के कामकाज का बिजनेस मजबूत है. कैलिबर, कोल इंडिया के लिए कोयले की माइनिंग और ट्रांसपोर्ट का काम करती है. कोल इंडिया हर साल अपने प्रोडक्शन का ज्यादा हिस्सा आउटसोर्स कर रही है. पिछले 2 सालों में रेवेन्यू सालाना लगभग 33% की दर से बढ़ा है, और ऑर्डर बुक FY26 के अनुमानित रेवेन्यू से लगभग 6 गुना है. IPO इन्वेस्टर्स के लिए असली सवाल यह है कि क्या यह ऑपरेशनल मजबूती उस बैलेंस शीट की कमजोरियों को छिपा सकती है, जो विस्तार के हर चरण से पहले उधार पर निर्भर रहती है.
कैलिबर कंपनी करती क्या है?
कैलिबर खदान मालिकों को कोयले और दूसरे खनिजों को निकालने और उनके ट्रांसपोर्टेशन के लिए एंड-टू-एंड सर्विस देती है. कंपनी की अपनी कोई खदान नहीं है. बल्कि कोल इंडिया जैसे खदान मालिक बड़े पैमाने पर काम करने के लिए इसे कॉन्ट्रैक्टर के तौर पर हायर करते हैं. इसकी कुल कमाई का 86% हिस्सा कोयला खनन सर्विस से आता है. कैलिबर के एक्सकेवेटर और बुलडोजर सबसे पहले ओवरबर्डन यानी कोयले की परत के ऊपर मौजूद मिट्टी और चट्टान को हटाते हैं और फिर नीचे से कोयला निकलाते हैं. लॉजिस्टिक्स से करीब 12 प्रतिशत रेवेन्यू आता है जिसमें अपने ट्रकों से कोयले और आयरन ओर की लोडिंग, अनलोडिंग और रोड ट्रांसपोर्ट शामिल है. बाकी हिस्सा कोयले की ट्रेडिंग और रेलवे रेक्स पर लोडिंग से आता है. मूल रूप से यह एक अर्थ-मूविंग बिजनेस है जिसे टन के हिसाब से भुगतान मिलता है.
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खुद की फ्लीट से कंपनी को क्या फायदा मिलता है?
अपनी फ्लीट होने से लागत कम रहती है. वैसे तो कोई भी पैसे लगाकर एक्सकेवेटर खरीद सकता है, लेकिन असली फायदा लंबे समय तक कम लागत में सैकड़ों मशीनें चलाने में है. कैलिबर के पास 1,811 माइनिंग गाड़ियां, एक्सकेवेटर और ट्रक हैं, जिनमें से केवल 100 लीज पर हैं जिससे बाहरी ट्रांसपोर्टरों पर निर्भरता खत्म हो जाती है. कंपनी 1 सेंट्रल मेंटेनेंस वर्कशॉप के साथ-साथ 7 माइन साइट्स पर खास वर्कशॉप भी चलाती है. ज्यादातर काम 40 किलोमीटर के दायरे में ही होता है, जिससे जरूरत पड़ने पर साइट्स के बीच मशीनों और मैकेनिक्स को आसानी से इधर-उधर भेजा जा सकता है. इसी का नतीजा है कि FY26 का ऑपरेटिंग कैश फ्लो नेट प्रॉफिट का 2.5 गुना रहा.
कोल इंडिया के आउटसोर्सिंग से कैलिबर को कितना फायदा मिल सकता है?
कोल इंडिया हर साल अपने कामकाज को आउटसोर्स कर रही है. वित्त वर्ष 2026 में कंपनी की 85% से ज्यादा कमाई उसकी 2 सब्सिडियरी कंपनियों से हुई, और अच्छे सालों में पुराने ग्राहकों का योगदान कुल कमाई का लगभग 98% रहा. अनुमान है कि आउटसोर्स की गई माइनिंग का काम वित्त वर्ष 2025 के 63% से बढ़कर वित्त वर्ष 2030 तक लगभग 70% हो जाएगा. 1.5 अरब टन के प्रोडक्शन टारगेट को पूरा करने के लिए, कंपनी वित्त वर्ष 2033 तक 56 खदानें खोलने या उनका विस्तार करने की योजना बना रही है. कैलिबर महाराष्ट्र में आयरन-ओर लॉजिस्टिक्स के क्षेत्र में भी कदम रख रही है और ओडिशा व झारखंड में प्रोजेक्ट्स के लिए बोली लगा रही है.
9,551 करोड़ की ऑर्डर बुक कितनी भरोसेमंद है?
ऑर्डर बुक की बात करें तो 15 मई 2026 तक यह 9,551 करोड़ रुपये पर थी, जो सिर्फ 6 हफ्ते पहले के 5,668 करोड़ रुपये से काफी ज्यादा है. ये पक्के अवॉर्डेड कॉन्ट्रैक्ट हैं, सिर्फ टेंडर में हिस्सेदारी नहीं. हालांकि ऐसे बड़े प्रोजेक्ट्स में देरी, बदलाव या रद्द होने का जोखिम भी रहता है. फिर भी कोल इंडिया जो मांग बता रही है, वह कैलिबर की ऑर्डर बुक में साफ दिख रही है.
हर बार टेंडर में जीतना क्या इतना आसान है?
रेवेन्यू का एक बड़ा हिस्सा कॉर्पोरेट कंपनियों के टेंडर जीतने से आता है. ये कॉन्ट्रैक्ट आम तौर पर 2 से 3 साल के होते हैं. कभी-कभी 5 साल तक के भी हो सकते हैं, और ये अपने-आप रिन्यू नहीं होते. कॉन्ट्रैक्ट खत्म होने के बाद, खदानों को अपने पास बनाए रखने के लिए कंपनी को फिर से टेंडर प्रोसेस में हिस्सा लेना पड़ता है. अक्सर 'L-1' (सबसे कम बोली लगाने वाली) बिडर के तौर पर मुकाबला करना पड़ता है. इस साल ₹2,229 करोड़ के 2 कॉन्ट्रैक्ट खत्म हो रहे हैं. अगर इनमें से एक भी कॉन्ट्रैक्ट नहीं मिल पाया, तो रेवेन्यू को भारी नुकसान होगा. FY26 में ₹1,000 करोड़ से ज्यादा के ऑपरेशन का हिस्सा कोयला माइनिंग से होने वाली कुल कमाई का 76% था, यानी आधा टॉपलाइन मुट्ठीभर री-टेंडर पर टिकी है.
कैपेक्स की भूख कब तक कैश को निगलती रहेगी?
कंपनी की कैपिटल एक्सपेंडिचर (Capex) की जरूरतें उसके इंटरनल कैश जेनरेशन से ज्यादा थीं. FY26 में ₹411 करोड़ के ऑपरेटिंग कैश फ्लो के मुकाबले, इक्विपमेंट का बिल ₹692 करोड़ था. नतीजतन, ₹281 करोड़ की कमी हुई, जिसे कर्ज लेकर पूरा करना पड़ा. इसके परिणामस्वरूप, कंपनी का कर्ज FY26 में ₹754 करोड़ से बढ़कर ₹1,120 करोड़ हो गया और आखिर में ₹1,631 करोड़ तक पहुंच गया. किसी भी कंपनी के लिए रेवेन्यू आने से पहले ही फ्लीट तैयार करना जरूरी होता है. इसलिए विस्तार की रफ्तार हमेशा इंटरनल कैश जेनरेशन से ज्यादा होती है.
ब्याज का बोझ कंपनी की कमाई पर कितना असर डाल रहा है?
ऑपरेटिंग प्रॉफिट का ज्यादातर हिस्सा मुख्य बिजनेस से आता है. FY26 में, EBIT ₹292 करोड़ और फाइनेंस कॉस्ट ₹81 करोड़ थी. इसका मतलब है कि इंटरेस्ट कवर 3.6 गुना था, और ब्याज का खर्च ऑपरेटिंग प्रॉफिट का लगभग 28% था. ऑपरेटिंग प्रॉफिट में बढ़ोतरी के बावजूद इन्वेस्ट की गई कैपिटल पर रिटर्न 33.5% से घटकर 28.8% हो गया, क्योंकि कर्ज की वजह से कैपिटल बेस काफी बढ़ गया था.
IPO का पैसा ग्रोथ में लगेगा या कर्ज चुकाने में जाएगा?
आईपीओ का पैसा ग्रोथ से ज्यादा कर्ज चुकाने में जाएगा. फ्रेश इश्यू के 400 करोड़ रुपये में से 208 करोड़ कर्ज चुकाने में, 167 करोड़ FY27 में 85 नई मशीनें खरीदने में और बाकी जनरल कॉर्पोरेट उद्देश्यों में जाएंगे. मशीनरी का आंकड़ा वेंडर कोट्स पर आधारित है, साइन्ड ऑर्डर्स पर नहीं. और 208 करोड़ की अदायगी के बाद भी अप्रैल के 1,631 करोड़ रुपये के उधार में से करीब 1,423 करोड़ रुपये बचेंगे, जो FY26 के साल के अंत के स्तर से करीब 27% ज्यादा है. कंपनी खुद साफ कहती है कि हर नए कॉन्ट्रैक्ट के साथ दोबारा फ्लीट विस्तार की जरूरत पड़ेगी.
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डिस्क्लेमर: यह आर्टिकल सिर्फ जानकारी के लिए दी गई है और इसे निवेश की सलाह नहीं माना जाना चाहिए. किसी भी निवेश फैसले से पहले कृपया अपने फाइनेंशियल एडवाइजर से सलाह लें.
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