Iran-US War: जॉर्डन में अमेरिकी सैनिकों पर हमला, 2 की मौत, बौखलाए ट्रंप ने ईरान को तबाह करने के दिए आदेश; कई शहरों में भीषण बमबारी से हड़कंप
जॉर्डन में ईरानी सेना के हमले में दो अमेरिकी सैनिकों की मौत के बाद हालात बेहद तनावपूर्ण हो गए हैं। राष्ट्रपति ट्रंप के आदेश के बाद अमेरिकी सेना ने ईरान के कई शहरों पर भीषण बमबारी की है।
लहर-लहर:हमारा दिमाग आधुनिक है, लेकिन सोच सदियों पुराने यकीनों पर चल रही है
इंसान ने शायद अपनी पूरी तारीख में कभी इतनी तरक्की नहीं की, जितनी पिछले सौ-दो सौ सालों में की है। उसने समंदर की गहराइयां नाप लीं, आसमान की ऊंचाइयां छू लीं, चांद पर कदम रख दिया और अरबों किलोमीटर दूर मौजूद ग्रहों तक अपने यान भेज दिए। उसने परमाणु की बनावट समझ ली, इंसानी जीनोम को पढ़ लिया और ऐसी मशीनें बना लीं जो सीख भी सकती हैं और फैसले भी कर सकती हैं। लेकिन इन सब उपलब्धियों के बीच एक सवाल अब भी हमारे सामने खड़ा है- क्या हमारी सोच भी उतनी ही आगे बढ़ी है, जितनी हमारी तकनीक? यहीं इक्कीसवीं सदी का सबसे बड़ा विरोधाभास दिखाई देता है। हमारा दिमाग आधुनिक है, लेकिन हमारी मानसिक दुनिया का एक हिस्सा अब भी सदियों पुराने यकीनों पर चलता है। ऐसा लगता है कि एक ही इंसान के भीतर दो अलग-अलग दुनिया रहती हैं। एक दुनिया प्रयोगशाला की है, जहां हर बात का आधार गणना, प्रयोग और प्रमाण है। दूसरी दुनिया परंपराओं, प्रतीकों और उन धारणाओं की है जिन्हें हमने विरासत में पाया है। जरा इस विडंबना पर गौर कीजिए। एक वैज्ञानिक वर्षों की मेहनत, गणित, भौतिकी और हजारों प्रयोगों के सहारे अंतरिक्ष यान को लाखों किलोमीटर दूर किसी ग्रह या उपग्रह पर ठीक उसी जगह पहुंचा देता है, जहां उसे पहुंचाना निर्धारित किया गया है। अगर रॉकेट की कामयाबी विज्ञान, गणना और प्राकृतिक नियमों पर निर्भर है, तो फिर किसी दूसरी अलौकिक व्यवस्था की जरूरत कहां से आ जाती है? और अगर वह अलौकिक व्यवस्था ही निर्णायक है, तो फिर विज्ञान की इतनी लंबी तैयारी और इतने कठोर परीक्षणों का अर्थ क्या रह जाता है? 21वीं सदी के पहले ऐसा कभी हुआ ही नहीं कि आपका ज्ञान और आपकी आस्था एक-दूसरे के विरोधी हैं और दोनों आप ही के अंदर हैं। शायद यही हमारे समय का सबसे बड़ा बौद्धिक अंतर्विरोध है- हमारी जानकारी एक दिशा में खड़ी है और हमारी आस्था दूसरी दिशा में। दोनों एक ही इंसान के भीतर रहती हैं, लेकिन एक-दूसरे से कभी सवाल नहीं करतीं। धर्मों को समझने के लिए इंसान को उसके ऐतिहासिक संदर्भ में देखना होगा। वो उस जमाने में जन्मा, जब इंसान के पास प्रकृति की वैज्ञानिक व्याख्या नहीं थी। बिजली क्यों चमकती है, भूकंप क्यों आते हैं, महामारी कैसे फैलती है, ग्रहण क्यों लगता है, बारिश कैसे होती है- इन सवालों के जवाब उसके पास नहीं थे। इसलिए उसने अपनी समझ, कल्पना और अनुभव के आधार पर उनके उत्तर खोजे। अपने समय के हिसाब से वे उत्तर स्वाभाविक भी थे। लेकिन ज्ञान की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वह ठहरा हुआ नहीं रहता। हर नई खोज हमें पुरानी धारणाओं पर फिर से सोचने के लिए मजबूर करती है। इसलिए समय के साथ हमारी समझ का बदलना भी उतना ही स्वाभाविक है। समस्या तब पैदा होती है, जब हम इक्कीसवीं सदी के विज्ञान का लाभ तो पूरी तरह उठाना चाहते हैं, लेकिन उसी विज्ञान की सबसे बुनियादी आदत- हर दावे को सवाल, तर्क और प्रमाण की कसौटी पर परखने-अपनाने से हिचकते हैं। तब हमारी ज़िंदगी दो हिस्सों में बंट जाती है। हमारे हाथ में आधुनिक तकनीक होती है, लेकिन हमारी सोच का एक हिस्सा अब भी मध्ययुगीन धारणाओं से चिपका रहता है। तकनीक हमें आधुनिक बना सकती है, लेकिन आधुनिक मानसिकता केवल वैज्ञानिक दृष्टि ही दे सकती है। अगर केवल धर्म ही इंसान को नेक और नैतिक बना देता, तो मध्य-पूर्व आज दुनिया का सबसे शांत इलाका होता। लेकिन हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। कोई भी सभ्यता केवल इसलिए जिंदा नहीं रहती कि उसने अपने अतीत को संभालकर रखा है। वह इसलिए आगे बढ़ती है कि अपने अतीत का सम्मान करते हुए उससे सवाल पूछने का साहस भी रखती है। विरासत का मतलब उसे सिर पर उठाकर ढोना नहीं, बल्कि उसे समझना, परखना और हर दौर की नई रोशनी में देखना है। जो धारणाएं तर्क, अनुभव और प्रमाण की कसौटी पर खरी उतरती हैं, उन्हें बचाने के लिए किसी आग्रह की जरूरत नहीं होती; वे अपने दम पर जीवित रहती हैं। लेकिन किसी विचार को केवल इसलिए सच मानते रहना कि वह सदियों पुराना है, अतीत का सम्मान नहीं, उसके बोझ तले दब जाना है। सभ्यता की पहचान इस बात से नहीं होती कि वह अपने पूर्वजों की हर बात दोहराती रहे, बल्कि इस बात से होती है कि वह उनकी विरासत में अपने विवेक का भी इजाफा करे। मैं खुद नास्तिक हूं। मेरी कोई धार्मिक आस्था नहीं है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि मुझे दूसरों की आस्था से आपत्ति है। आपत्ति तब होती है, जब निजी विश्वास सार्वजनिक निर्णयों की जगह लेने लगते हैं। आधुनिक समाज की असली चुनौती विज्ञान और आस्था के बीच कोई युद्ध खड़ा करना नहीं है। चुनौती यह है कि दोनों की सीमाएं साफ-साफ समझी जाएं। आस्था व्यक्ति का निजी अधिकार है, लेकिन जहां ज्ञान, शिक्षा, चिकित्सा, कानून या सार्वजनिक नीति का सवाल हो, वहां फैसले विश्वास से नहीं, प्रमाण, तर्क और परीक्षण के आधार पर होने चाहिए। निजी जीवन को आस्था सहारा दे सकती है, लेकिन समाज को आगे बढ़ाने का काम विवेक और ज्ञान ही करते हैं। अध्यात्म की भी मेरी समझ कुछ ऐसी ही है। अगर अध्यात्म का मतलब अपने भीतर झांकना, अपनी जिंदगी का हिसाब करना और अपनी कमजोरियों व खूबियों को पहचानना है, तो इसमें किसी को क्या एतराज हो सकता है? और अगर अध्यात्म का अर्थ धर्म, जाति, नस्ल और पंथ की दीवारों से ऊपर उठकर पूरी इंसानियत से मोहब्बत करना है, तो मुझे उससे भी कोई आपत्ति भी नहीं। बस मैं उसे अध्यात्म नहीं, मानवता कहता हूं। आज के दौर में अध्यात्म अमीरों के लिए एक तरह का ट्रैंक्विलाइजर बन गया है। यह टिप्पणी अध्यात्म पर नहीं, उसके बाजारीकरण पर है। यही वजह है कि आज के तथाकथित गुरु और बुद्ध में फर्क साफ दिखाई देता है। गौतम बुद्ध महल छोड़कर सत्य की तलाश में जंगल गए थे। आज के अनेक गुरु जंगल से निकलकर महलों में पहुंच जाते हैं। (संपादन और समन्वय- अरविंद मण्डलोई)

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