कश्मीर में स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान बच्चियों के नृत्य का एक वीडियो सामने आने के बाद पूर्व अभिनेत्री जायरा वसीम ने जम्मू-कश्मीर वक्फ बोर्ड की भूमिका पर सवाल उठाए हैं। जायरा वसीम ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर पूछा कि धार्मिक और सामुदायिक उद्देश्यों के लिए गठित संस्था के बैनर तले आयोजित कार्यक्रम में छोटी बच्चियों से मंच पर नृत्य क्यों कराया गया? उनका तर्क है कि बच्चों को केवल नृत्य या मनोरंजन तक सीमित करने की बजाय उन्हें सोचने, सीखने, सृजन करने, चर्चा करने और समाज में योगदान देने के अवसर मिलने चाहिए।
देखा जाये तो जायरा वसीम के सवालों के साथ कुछ और सवाल भी खड़े होते हैं। सबसे पहला सवाल यही है कि स्वतंत्रता दिवस के कार्यक्रम में बच्चियों की भागीदारी आखिर समस्या क्यों बन गई? क्या मंच पर नृत्य करना अपने आप में बच्चियों की गरिमा, शिक्षा या स्वतंत्रता के खिलाफ है? यदि प्रस्तुति बच्चों की स्वेच्छा, विद्यालय की गतिविधि और राष्ट्रीय पर्व के उत्सव का हिस्सा है, तो क्या उसे केवल इसलिए अनुचित मान लिया जाना चाहिए क्योंकि वह धार्मिक संस्था से जुड़े स्कूल में आयोजित हुई? और यदि यही कार्यक्रम किसी दूसरी संस्था के बैनर तले होता, तो क्या जायरा की आपत्ति उतनी ही तीखी होती?
यहां एक विडंबना भी दिखाई देती है। जायरा वसीम स्वयं कभी उसी फिल्मी दुनिया का हिस्सा थीं, जिसे उन्होंने बाद में अपने धार्मिक विश्वासों के साथ टकराव का कारण बताते हुए छोड़ दिया। ‘दंगल’ से पहचान बनाने के बाद उन्होंने ‘सीक्रेट सुपरस्टार’ और ‘द स्काई इज़ पिंक’ में काम किया। 2019 में उन्होंने अभिनय से अलग होने की घोषणा करते हुए कहा था कि फिल्म उद्योग उनके ईमान और धार्मिक आस्था के साथ टकरा रहा था।
यहीं उनसे दूसरा बड़ा सवाल पूछा जाना चाहिए कि अगर कभी फिल्मों में काम करना आपकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता और चुनाव था, तो आज किसी दूसरी बच्ची के सांस्कृतिक प्रदर्शन को उसकी स्वतंत्रता और चुनाव की बजाय धार्मिक कसौटी से क्यों देखा जा रहा है? बच्चों को सोचने की आजादी देने की बात बिल्कुल सही है, लेकिन क्या उस आजादी में नृत्य, संगीत, कला और राष्ट्रीय पर्व मनाने की स्वतंत्रता भी शामिल नहीं होनी चाहिए?
साथ ही जायरा वसीम की टिप्पणी का सबसे असहज पहलू उनकी प्राथमिकताओं को लेकर उठने वाला सवाल है। क्या देश के राष्ट्रीय पर्व की खुशी और धार्मिक आस्था को हमेशा एक-दूसरे के विरोध में खड़ा करना जरूरी है? स्वतंत्रता दिवस भारत के हर नागरिक का साझा राष्ट्रीय उत्सव है। इसमें मुस्लिम, हिंदू, सिख, ईसाई और हर समुदाय के बच्चे समान रूप से भाग लेते हैं। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या धार्मिक पहचान को इतनी प्रमुखता दी जानी चाहिए कि राष्ट्रीय उत्सव की सांस्कृतिक अभिव्यक्तियां ही संदेह के घेरे में आ जाएं? उनकी सार्वजनिक टिप्पणियां यह सवाल जरूर पैदा करती हैं कि क्या धार्मिक मूल्यों की रक्षा और भारतीय राष्ट्रीय जीवन की खुली, बहुलतावादी अभिव्यक्ति के बीच कोई संतुलन संभव नहीं है? जायरा को समझना चाहिए कि बच्चियों को पढ़ने, सोचने और सवाल करने के साथ-साथ मंच पर अपनी कला दिखाने का अधिकार भी मिलना ही चाहिए।
बहरहाल, आखिर सवाल सिर्फ एक नृत्य का नहीं है। सवाल यह है कि हम बच्चों के लिए कैसी दुनिया बनाना चाहते हैं? जहां संस्थाएं तय करें कि उन्हें क्या करना चाहिए, या ऐसी दुनिया जहां वे ज्ञान, कला, संस्कृति, देशभक्ति और अपनी व्यक्तिगत पसंद, सबको साथ लेकर आगे बढ़ सकें? जायरा से पूछा जाना चाहिए कि यदि स्वतंत्रता दिवस भी बच्चों की अभिव्यक्ति के लिए पर्याप्त स्वतंत्र मंच नहीं है, तो फिर स्वतंत्रता का अर्थ आखिर क्या बचता है?
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सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि वह एक हाई-पावर कमेटी बनाना चाहता है। इस कमेटी में पूर्व जज और DGP (डायरेक्टर जनरल ऑफ़ पुलिस) रैंक के रिटायर्ड पुलिस अधिकारी शामिल होंगे। यह कमेटी दिल्ली में NEET पेपर लीक को लेकर 20 जुलाई को हुए छात्र विरोध-प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की ज्यादतियों और हिंसा के आरोपों की स्वतंत्र, निष्पक्ष और निर्णायक जांच करेगी। सुप्रीम कोर्ट ने यह बात तब कही जब वह 20 जुलाई के प्रदर्शनों के दौरान छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस की कार्रवाई को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था। याचिकाकर्ताओं ने इस घटना की कोर्ट की निगरानी में जांच की मांग की है। इनमें से एक याचिका में खास तौर पर प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पैलेट गन के कथित इस्तेमाल पर सवाल उठाया गया है। इस मामले की सुनवाई भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची और वी मोहना की बेंच ने की।
हिंसा की जांच के लिए हाई-लेवल कमिटी
सुनवाई के दौरान, कोर्ट ने कहा कि कमिटी मामले के सभी पहलुओं की जांच करेगी, जिसमें पुलिस की बर्बरता के आरोप, महिला प्रदर्शनकारियों के साथ बर्ताव और प्रदर्शनों के दौरान बल का इस्तेमाल शामिल है। बेंच ने यह भी साफ़ किया कि जांच सिर्फ़ किसी एक पक्ष द्वारा लगाए गए आरोपों तक ही सीमित नहीं रहेगी। ये बातें तब सामने आईं जब एक याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि पूर्व सैनिक की पत्नी सुदेश को प्रदर्शनों के दौरान परेशान किया गया। एक और वकील ने दावा किया कि पीड़ितों के सोशल मीडिया अकाउंट सस्पेंड किए जा रहे थे, जबकि उन्हें ऑनलाइन परेशान करने वाले लोग बिना किसी रोक-टोक के अपने अकाउंट चला रहे थे। चीफ़ जस्टिस सूर्य कांत ने कहा कि कोर्ट हर पीड़ित के साथ है और ज़ोर देकर कहा कि सभ्य समाज में ऐसी घटनाओं को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। उन्होंने यह भी साफ़ किया कि कमिटी उसके सामने रखे गए हर आरोप की जांच करेगी।
बेकसूर छात्रों के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं: SC
कोर्ट ने आगे कहा कि जांच का फ़ोकस शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर नहीं, बल्कि उन आदतन अपराधियों पर होना चाहिए जिन्होंने शायद इन प्रदर्शनों में हिस्सा लिया हो। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट को बताया कि पुलिस ने आपराधिक रिकॉर्ड वाले 2,873 लोगों की पहचान की है। साथ ही, चीफ़ जस्टिस ने कहा कि प्रदर्शनों में शामिल कई लोग बेकसूर छात्र थे जिन्होंने अपना भविष्य बनाने के लिए कड़ी मेहनत की थी। उन्होंने कहा कि उनके माता-पिता ने उनकी पढ़ाई में मदद करने के लिए बरसों की कड़ी मेहनत और त्याग किया था। सुनवाई के दौरान, जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कहा कि सॉलिसिटर जनरल और याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट वृंदा ग्रोवर, दोनों ने अपनी दलीलें साफ़ तौर पर रखी हैं और अब कोर्ट को आगे की कार्रवाई तय करनी चाहिए।
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