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AIIMS मेडिकल बोर्ड ने Twisha Sharma की मौत को आत्महत्या बताया, CBI ने दाखिल किया आरोपपत्र

अदालत के आदेश पर दोबारा पोस्टमार्टम करने वाले अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के मेडिकल बोर्ड के अनुसार, त्विषा शर्मा की मौत फंदे से लटककर आत्महत्या करने के कारण हुई थी। मेडिकल बोर्ड ने अपनी अंतिम फॉरेंसिक राय एक सीलबंद लिफाफे में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) को सौंपी, जिसके बाद सीबीआई ने सोमवार को भोपाल की एक विशेष अदालत में आरोपपत्र दाखिल किया। सीबीआई ने पूर्व अभिनेत्री-मॉडल त्विषा के पति समर्थ सिंह और सास गिरिबाला सिंह के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया है।

उन पर त्विषा को मानसिक रूप से प्रताड़ित करने का आरोप है। त्विषा मई में, भोपाल स्थित अपने ससुराल में संदिग्ध परिस्थितियों में मृत पाई गई थी। सैकड़ों पन्नों के अनुलग्नक वाले 31 पन्नों के आरोपपत्र में, (त्विषा और समर्थ की) शादी के छह महीनों के दौरान समर्थ और सेवानिवृत्त जिला न्यायाधीश गिरिबाला (त्विषा की सास) द्वारा त्विषा को कथित तौर पर दी गई मानसिक प्रताड़ना का विवरण है।

पूर्व मिस पुणे को यह कठोर कदम उठाने के लिए मजबूर करने वाले ‘‘लगातार मानसिक उत्पीड़न’’ का भयावह ब्योरा देते हुए, एजेंसी ने अपने आरोपपत्र में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की उन धाराओं का हवाला दिया जो पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा महिला के साथ क्रूरता करने, आत्महत्या के लिए उकसाने और साझा इरादे से संबंधित हैं। त्विषा की शादी पिछले साल दिसंबर में समर्थ से हुई थी। वह इस वर्ष 12 मई को अपने ससुराल में फंदे से लटकी हुई मिली थी।

प्राथमिकी में आरोप लगाया गया है कि समर्थ उसे एम्स भोपाल ले गया था, जहां उसने दावा किया कि त्विषा ने रात 10:20 बजे घर पर फांसी लगा ली थी। प्राथमिकी के मुताबिक, एम्स के चिकित्सकों ने पुलिस को बताया कि उसे अस्पताल मृत अवस्था में लाया गया था, जिसके बाद एक ‘मेडिको-लीगल केस’ (एमएलसी) दर्ज किया गया। शुरुआती पुलिस जांच और एम्स भोपाल द्वारा किए गए पहले पोस्टमॉर्टम में रही कमियों के बारे में परिवार के आरोपों और अहम संदेहों को दूर करने के लिए मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के आदेश पर हुए दूसरे पोस्टमॉर्टम के बाद, सीबीआई ने जांच की जिम्मेदारी संभाली तथा समर्थ और गिरिबाला को गिरफ्तार कर लिया।

दूसरा पोस्टमॉर्टम 24 मई को भोपाल में एम्स दिल्ली की चार सदस्यीय टीम ने किया था। पोस्टमॉर्टम और बाद में एम्स दिल्ली के मेडिकल विशेषज्ञों के बोर्ड ने इस राय पर सहमति जताई है कि यह आत्महत्या का मामला है। आरोपपत्र के अनुसार, ‘‘मौत का कारण दम घुटना है, जो फंदे से लटकने की वजह से हुआ।

यह फांसी खुदकुशी के इरादे से लगाई गई थी और इसके लिए रिंग वाली जिम्नास्टिक बेल्ट का इस्तेमाल किया गया था। मृतका के शरीर पर चोट का ऐसा कोई निशान नहीं मिला, जो मौत से पहले मारपीट या हाथापाई का संकेत देती हो।’’ मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के आदेश पर गठित पांच सदस्यीय मेडिकल बोर्ड ने 10 जुलाई को सीबीआई को अपनी 11 पन्नों की मेडिकल राय सौंपी थी। इस राय में साफ तौर पर कहा गया कि त्विषा ने आत्महत्या की थी और उसके शरीर पर चोट का ऐसा कोई निशान नहीं मिला, जो कानूनी नजरिए से अहम हो या जिससे हाथापाई या संघर्ष का संकेत मिलता हो।

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Delhi Police का Supreme Court में हलफनामा, Jantar Mantar पर प्रदर्शन के लिए नहीं ली गई थी Permission

दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि 20 जुलाई को छात्रों और दूसरे प्रदर्शनकारियों का संसद की ओर मार्च करने का प्रयास गैर-कानूनी था, क्योंकि इस मार्च के लिए कोई इजाज़त नहीं ली गई थी। पुलिस ने ज़रूरत से ज़्यादा बल प्रयोग के आरोपों को भी खारिज करते हुए कहा कि कार्रवाई धीरे-धीरे और हालात बिगड़ने के बाद ही की गई थी। मामले की सुनवाई से पहले, दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दायर किया। इसमें विरोध-प्रदर्शन से जुड़े हालात और भीड़ को काबू करने के लिए उठाए गए कदमों की जानकारी दी गई।

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ज़रूरत से ज़्यादा बल का इस्तेमाल नहीं किया गया

पुलिस के मुताबिक, विरोध-प्रदर्शन वाले दिन जंतर-मंतर इलाके में करीब 30,000 लोग मौजूद थे। भीड़ लगभग तीन किलोमीटर के दायरे में फैली हुई थी और हालात को संभालने के लिए करीब 5,000 पुलिसकर्मी तैनात किए गए थे। पुलिस ने बताया कि शुरुआत में प्रदर्शन शांतिपूर्ण था। लेकिन हालात तब बिगड़ गए जब कुछ प्रदर्शनकारियों ने कथित तौर पर कई जगहों पर बैरिकेड तोड़ दिए और संसद की ओर बढ़ने की कोशिश की। इसके बाद प्रदर्शनकारियों और पुलिसकर्मियों के बीच झड़प और हाथापाई हुई। पुलिस ने यह भी कहा कि विरोध मार्च गैर-कानूनी था क्योंकि इसके लिए कोई इजाज़त नहीं ली गई थी।

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'करीब 30,000 लोग जमा हुए; इजाज़त नहीं दी गई थी'

पुलिस के मुताबिक, विरोध प्रदर्शन वाले दिन जंतर-मंतर इलाके में करीब 30,000 लोग मौजूद थे। भीड़ लगभग तीन किलोमीटर तक फैली हुई थी और हालात को संभालने के लिए करीब 5,000 पुलिसकर्मी तैनात किए गए थे। पुलिस ने बताया कि शुरुआत में प्रदर्शन शांतिपूर्ण था। हालांकि, हालात तब बिगड़ गए जब कुछ प्रदर्शनकारियों ने कथित तौर पर कई जगहों पर बैरिकेड तोड़ दिए और संसद की ओर बढ़ने की कोशिश की। इसके बाद प्रदर्शनकारियों और पुलिसकर्मियों के बीच झड़प और हाथापाई हुई। पुलिस ने कहा कि मार्च निकालने की इजाज़त नहीं दी गई थी, इसलिए संसद की ओर बढ़ने की कोशिश गैर-कानूनी थी। पुलिस ने याचिकाओं में पेश किए गए सबूतों पर भी सवाल उठाए और कहा कि पुलिस बल पर लगाए गए आरोप चुनिंदा तस्वीरों, अधूरे वीडियो और सोशल मीडिया रिपोर्ट पर आधारित थे। पुलिस के मुताबिक, ऐसी सामग्री से उस दिन हुई घटनाओं की पूरी तस्वीर सामने नहीं आती। 

240 से ज़्यादा पुलिसकर्मी घायल

दिल्ली पुलिस ने बताया कि झड़प के दौरान 240 से ज़्यादा पुलिस और सुरक्षाकर्मी घायल हुए, जबकि लगभग 200 प्रदर्शनकारी भी घायल हुए। पुलिस का कहना है कि भीड़ को आगे बढ़ने से रोकने और व्यवस्था बहाल करने के लिए ज़रूरत के हिसाब से और उचित मात्रा में बल का इस्तेमाल किया गया। हलफनामे में यह भी कहा गया है कि विरोध प्रदर्शन में शामिल कुछ लोगों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं। पुलिस के अनुसार, लगभग 2,873 लोगों पर हत्या, हत्या की कोशिश, डकैती, बलात्कार और POCSO एक्ट के तहत उल्लंघन जैसे अपराधों के मामले दर्ज हैं। दिल्ली पुलिस द्वारा गठित एक स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) उनके बैकग्राउंड और इसमें उनकी भूमिका की जांच करेगी।

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