चीन से बाहर पिक्सल उत्पादन शिफ्ट करने की तैयारी में गूगल, 2027 तक पूरी मैन्युफैक्चरिंग हटाने की योजना: रिपोर्ट
नई दिल्ली, 18 अगस्त (आईएएनएस)। अमेरिका और चीन के बीच जारी भू-राजनीतिक तनाव तथा वैश्विक सप्लाई चेन में विविधीकरण की रणनीति के तहत अमेरिकी टेक दिग्गज गूगल अपने पिक्सल स्मार्टफोन, स्मार्टवॉच और वायरलेस ईयरबड्स के उत्पादन को चीन से बाहर स्थानांतरित करने की योजना पर काम कर रही है। एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, कंपनी का लक्ष्य 2027 तक पिक्सल उत्पादों का पूरा उत्पादन चीन से बाहर ले जाना है।
निक्केई एशिया की रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि गूगल ने पिछले कुछ वर्षों में वियतनाम और भारत में अपनी विनिर्माण क्षमता का विस्तार किया है और अब उसे भरोसा है कि वह 2027 तक पिक्सल डिवाइसों का संपूर्ण उत्पादन चीन से बाहर स्थानांतरित कर सकती है।
हालांकि वर्तमान में गूगल के उत्पादन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा अब भी चीन में होता है, लेकिन कंपनी ने इस वर्ष वियतनाम में अपने प्रीमियम पिक्सल स्मार्टफोनों के सफल विकास और उत्पादन के बाद अगला कदम उठाने की तैयारी शुरू कर दी है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि हाई-एंड स्मार्टफोन का निर्माण स्मार्टवॉच और वायरलेस ईयरबड्स की तुलना में अधिक जटिल होता है, इसलिए पिक्सल स्मार्टफोनों का सफल उत्पादन स्थानांतरण एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।
यदि यह रणनीति सफल रहती है, तो सैमसंग के बाद गूगल दुनिया की दूसरी बड़ी स्मार्टफोन कंपनी बन जाएगी, जिसने अपने स्मार्टफोन उत्पादन को पूरी तरह चीन से बाहर स्थानांतरित कर दिया हो।
रिपोर्ट के अनुसार, गूगल के लिए यह बदलाव अपेक्षाकृत आसान हो सकता है क्योंकि कंपनी चीन में पिक्सल स्मार्टफोन नहीं बेचती। ऐसे में उसे स्थानीय उत्पादन बनाए रखने की उतनी आवश्यकता नहीं है जितनी कुछ अन्य वैश्विक ब्रांडों को होती है।
इस बीच कंपनी पिक्सल स्मार्टफोनों की बिक्री बढ़ाने पर भी जोर दे रही है। रिपोर्ट के मुताबिक, गूगल ने अपने आपूर्तिकर्ताओं को संकेत दिया है कि वह इस वर्ष पिक्सल की शिपमेंट में 8 से 10 प्रतिशत की वृद्धि का लक्ष्य रखती है। पिछले वर्ष कंपनी ने लगभग 1.2 करोड़ पिक्सल डिवाइस की शिपमेंट की थी।
विश्लेषकों का मानना है कि गूगल पिक्सल स्मार्टफोन को केवल एक हार्डवेयर उत्पाद नहीं, बल्कि अपने जेमिनी एआई इकोसिस्टम के विस्तार का माध्यम मानती है। कंपनी का विश्वास है कि अधिक पिक्सल उपयोगकर्ता सीधे तौर पर उसके एआई उत्पादों और सेवाओं के उपयोग को बढ़ावा देंगे। इसी वजह से वह बढ़ती कंपोनेंट लागतों, विशेषकर मेमोरी चिप की ऊंची कीमतों, के बावजूद उत्पादन और बिक्री बढ़ाना चाहती है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि बेहतर शिपमेंट वॉल्यूम गूगल को मेमोरी चिप आपूर्तिकर्ताओं के साथ मूल्य वार्ता में अधिक ताकत प्रदान कर सकते हैं। इसी उद्देश्य से कंपनी अपने क्लाउड कंप्यूटिंग कारोबार और स्मार्टफोन व्यवसाय के लिए आवश्यक चिप ऑर्डरों को एक साथ जोड़कर माइक्रोन, सैमसंग और एसके हाइनिक्स जैसे निर्माताओं के साथ बातचीत कर रही है।
गूगल के एक कंपोनेंट सप्लायर से जुड़े अधिकारी के अनुसार, कंपनी उन चुनिंदा स्मार्टफोन निर्माताओं में शामिल है जिन्होंने इस वर्ष अपने शिपमेंट लक्ष्य में कटौती नहीं की है। इसके विपरीत, वह बाजार हिस्सेदारी बढ़ाने की कोशिश कर रही है।
विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि यदि एप्पल भविष्य में आईफोन की कीमतों में वृद्धि करता है, तो गूगल को अमेरिका, जापान और यूरोप जैसे प्रमुख बाजारों में अतिरिक्त बाजार हिस्सेदारी हासिल करने का अवसर मिल सकता है।
यह कदम वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग में चल रहे उस बड़े बदलाव का हिस्सा माना जा रहा है, जिसमें कई बहुराष्ट्रीय कंपनियां चीन पर अपनी विनिर्माण निर्भरता कम कर भारत, वियतनाम और अन्य देशों में उत्पादन क्षमता का विस्तार कर रही हैं। गूगल की इस रणनीति से भारत को भी उन्नत स्मार्टफोन विनिर्माण और इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात के क्षेत्र में लाभ मिलने की संभावना है।
--आईएएनएस
डीबीपी
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Explainer: चलती ट्रेन में अचानक बिगड़ जाए तबीयत तो न हों परेशान, जानें कैसे मिलेगी तत्काल मेडिकल मदद
Indian Railway: भारत में ट्रेन का सफर सिर्फ एक यात्रा नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की दिनचर्या का अहम हिस्सा है. हर रोज दो करोड़ से ज्यादा मुसाफिर देश के एक कोने से दूसरे कोने तक रेल के जरिए पहुंचते हैं. लंबा सफर हो या छोटा, यात्रा के दौरान कब क्या आपात स्थिति आ जाए, इसका कोई निश्चित समय नहीं होता. कई बार सफर के दौरान मौसम में बदलाव, खान-पान, धक्का-मुक्की या किसी पुरानी बीमारी के चलते यात्रियों की तबीयत अचानक गंभीर रूप से बिगड़ जाती है.
ऐसी स्थिति में बीच रास्ते में चलती ट्रेन के अंदर लोग अक्सर घबरा जाते हैं कि अब डॉक्टर या दवा का इंतजाम कैसे होगा. अगर आप या आपके साथ सफर कर रहा कोई सह-यात्री ऐसी आपात स्थिति में फंस जाए, तो घबराने के बजाय भारतीय रेलवे द्वारा दी जाने वाली आपातकालीन मेडिकल सेवाओं का लाभ उठाएं.
संकट का साथी: रेलवे का 'वन नेशन, वन हेल्पलाइन' 139
पहले यात्रियों को अलग-अलग परेशानियों जैसे पूछताछ, सुरक्षा, सफाई या मेडिकल इमरजेंसी के लिए अलग-अलग नंबर याद रखने पड़ते थे. भारतीय रेलवे ने यात्रियों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए 139 को एक एकीकृत (All-in-One) हेल्पलाइन बना दिया है. यह नंबर 24 घंटे, सातों दिन सक्रिय रहता है और देश की प्रमुख 12 से अधिक भाषाओं में सेवा प्रदान करता है. चलती ट्रेन में तबीयत बिगड़ने पर आप सीधे अपने फोन से 139 पर कॉल कर सकते हैं. कॉल कनेक्ट होते ही यह सिस्टम आपको कुछ ही सेकंड में मेडिकल सहायता तक पहुंचा देता है.
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हेल्पलाइन 139 से मेडिकल मदद पाने की पूरी स्टेप-बाय-स्टेप प्रक्रिया
यदि ट्रेन में किसी मरीज को अचानक फर्स्ट एड, डॉक्टर या एम्बुलेंस की जरूरत पड़ जाए, तो इन आसान चरणों का पालन करें:
1. 139 डायल करें: अपने मोबाइल से बिना किसी एसटीडी कोड के सीधे 139 नंबर पर कॉल मिलाएं.
2. भाषा का चयन करें: अपनी पसंदीदा भाषा (हिंदी, अंग्रेजी या अन्य क्षेत्रीय भाषा) चुनें.
3. इमरजेंसी विकल्प चुनें: IVRS मेन्यू में सुरक्षा और मेडिकल इमरजेंसी के लिए '1' दबाएं.
4. एग्जीक्यूटिव को विवरण दें: आपका कॉल तुरंत इमरजेंसी हेल्पडेस्क एग्जीक्यूटिव से जुड़ जाएगा. यहां घबराए बिना मरीज की स्थिति स्पष्ट बताएं.
जरूरी जानकारी साझा करें:
अपना PNR नंबर
ट्रेन का नाम या नंबर
कोच नंबर (जैसे B2, S4) और बर्थ/सीट नंबर
मरीज की उम्र और मुख्य लक्षण (जैसे सीने में दर्द, तेज बुखार, उल्टी-दस्त, चक्कर या सांस लेने में तकलीफ)
अलर्ट जारी होते ही रेलवे का सिस्टम कैसे काम करता है?
जब आप 139 पर कॉल दर्ज कराते हैं, तो बैकएंड पर पूरा रेलवे प्रशासन तुरंत सक्रिय हो जाता है:
कंट्रोल रूम को सूचना: कॉल सेंटर तुरंत संबंधित रेलवे डिवीजन के सेंट्रल कंट्रोल रूम को इमरजेंसी टिकट भेजता है.
अगले स्टेशन पर डॉक्टर की व्यवस्था: कंट्रोल रूम ट्रेन के रूट पर आने वाले अगले ऐसे बड़े स्टेशन के स्टेशन मास्टर को अलर्ट करता है, जहां रेलवे अस्पताल या सूचीबद्ध डॉक्टर्स उपलब्ध हों.
प्लेटफॉर्म पर टीम की मौजूदगी: जैसे ही ट्रेन उस स्टेशन पर रुकती है, मेडिकल टीम आवश्यक प्राथमिक दवाओं, इंजेक्शन या उपकरणों के साथ सीधे आपके कोच और सीट तक पहुंचती है.
ऑन-बोर्ड स्टाफ को निर्देश: इसके साथ ही कंट्रोल रूम ट्रेन के ऑन-बोर्ड टीटीई (TTE) और ट्रेन मैनेजर (गार्ड) को भी सूचित करता है, ताकि वे स्टेशन पहुंचने से पहले ही मरीज के पास प्राथमिक उपचार बॉक्स पहुंचा सकें.
सीधे अपने कोच के टीटीई या ट्रेन सुपरिटेंडेंट से संपर्क करें.
सह-यात्री डॉक्टर्स की मदद: टीटीई के पास रिजर्वेशन चार्ट होता है, जिसमें यात्रा कर रहे रजिस्टर्ड डॉक्टरों की पहचान दर्ज होती है. गंभीर स्थिति में वे उसी ट्रेन में सफर कर रहे किसी डॉक्टर से तत्काल मदद का अनुरोध कर सकते हैं.
जरूरी बातें: जो हर यात्री को ध्यान में रखनी चाहिए
फीस और चार्ज: सामान्य परिस्थितियों में अटेंड करने आने वाले रेलवे डॉक्टर की परामर्श फीस (लगभग ₹100) और दी गई दवाओं का शुल्क यात्री को वहन करना होता है. इसलिए अपने पास कुछ नकदी जरूर रखें.
अस्पताल रेफरल और एम्बुलेंस: यदि डॉक्टर को लगता है कि मरीज की हालत ज्यादा नाजुक है और उसे भर्ती कराना जरूरी है, तो रेलवे स्टेशन से स्थानीय सरकारी या निजी अस्पताल ले जाने के लिए 108 एम्बुलेंस की व्यवस्था की जाती है.
अनावश्यक चेन पुलिंग से बचें: कई बार घबराहट में लोग बीच जंगल या आउटर सिग्नल पर अलार्म चेन खींचकर ट्रेन रोक देते हैं. ऐसा करने से मदद मिलने में और अधिक देरी हो जाती है, क्योंकि डॉक्टर और मेडिकल सुविधाएं स्टेशन पर ही उपलब्ध होती हैं। ट्रेन को तेजी से अगले स्टेशन तक पहुंचने देना ही मरीज के हित में होता है. रेल यात्रा के दौरान किसी भी मेडिकल इमरजेंसी से निपटने के लिए भारतीय रेलवे का सिस्टम पूरी तरह तैयार है. जरूरत सिर्फ इस बात की है कि यात्री जागरूक रहें और समय पर सही माध्यम का इस्तेमाल करें. अपने फोन में 139 हेल्पलाइन नंबर को हमेशा सुरक्षित रखें और सफर के दौरान किसी भी आपात स्थिति में संयम से काम लेते हुए तुरंत मदद मांगें.
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