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Explainer: संविधान संशोधन बिल पास कराने के कितने करीब है NDA, किन दलों से बनेगी बात और कौन बिगाड़ सकता है दोबारा खेल, समझें पूरा गणित

Explainer: 20 जुलाई से शुरू होने वाले संसद के मॉनसून सत्र से पहले देश की राजनीति में नए समीकरण बनने की चर्चा तेज हो गई है. संविधान संशोधन से जुड़े संभावित परिसीमन (Delimitation) विधेयक को लेकर सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों अपने-अपने स्तर पर रणनीति बनाने में जुटे हैं. एनडीए चाहती है कि इस सत्र में संविधान संशोधन बिल को पास कराया जाए. वहीं विपक्ष इसे नाकाम करना चाहता है या फिर अपनी शर्तों पर पास करवाना चाहता है.  इसी बीच राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट) की ओर से आए संकेतों ने राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है. 

चर्चा इस बात की है कि यदि शरद पवार की पार्टी इस विधेयक पर सरकार का समर्थन करती है, तो लोकसभा में बहुमत जुटाने की NDA की राह पहले की तुलना में काफी आसान हो सकती है. हालांकि अंतिम फैसला विधेयक के वास्तविक मसौदे के सामने आने के बाद ही होगा.

आखिर क्यों अहम है परिसीमन विधेयक?

परिसीमन केवल लोकसभा सीटों की सीमाएं बदलने की प्रक्रिया नहीं है. यदि इसके लिए संविधान संशोधन आवश्यक हो, तो सरकार को संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत हासिल करना पड़ता है.

संविधान संशोधन विधेयक को पारित कराने के लिए दो शर्तें पूरी करनी होती हैं...

- सदन की कुल सदस्य संख्या के बहुमत का समर्थन
- उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई मत

यही वजह है कि सरकार के लिए केवल अपने गठबंधन के सांसद पर्याप्त नहीं होते, बल्कि कई बार अन्य दलों का सहयोग भी जरूरी हो जाता है.

अप्रैल में क्यों अटक गया था विधेयक?

अप्रैल में लोकसभा में पेश संविधान (131वां संशोधन) विधेयक सरकार की अपेक्षाओं के अनुरूप समर्थन नहीं जुटा सका था. विधेयक के पक्ष में 298 वोट पड़े, जबकि 230 सांसदों ने विरोध किया। उस समय सदन में मतदान करने वाले सदस्यों की संख्या के आधार पर सरकार को लगभग 352 वोटों की आवश्यकता थी, जो उसे नहीं मिल सके. यानी सरकार बहुमत से नहीं, बल्कि विशेष बहुमत के आंकड़े से पीछे रह गई थी। इसी कारण यह विधेयक पारित नहीं हो पाया.

लोकसभा में अब क्या है नया गणित?

राजनीतिक परिस्थितियां पिछले कुछ महीनों में काफी बदली हैं. कई दलों के भीतर असंतोष और टूट की खबरों ने संसद का गणित भी प्रभावित किया है. यदि पिछली बार मिले 298 समर्थन को आधार माना जाए, तो सरकार अब उन दलों और सांसदों पर नजर रखे हुए है जो पहले विपक्ष के साथ थे, लेकिन अब अलग रुख अपनाते दिखाई दे रहे हैं.

राजनीतिक चर्चाओं के अनुसार सरकार को अतिरिक्त समर्थन मिलने की संभावना जिन समूहों से जोड़ी जा रही है, उनमें शामिल हैं...

- तृणमूल कांग्रेस के बागी सांसद
- शिवसेना (उद्धव गुट) छोड़ चुके सांसद
- एनसीपी (शरद पवार गुट)
- द्रविड़ मुनेत्र कषगम (DMK), यदि वह किसी समझौते पर सहमत होती है. 

हालांकि इनमें से किसी भी दल ने अभी तक औपचारिक रूप से सरकार के पक्ष में मतदान करने की घोषणा नहीं की है. 

शरद पवार की पार्टी के संकेत क्यों महत्वपूर्ण हैं?

एनसीपी (शरद पवार गुट) की सांसद सुप्रिया सुले ने हाल ही में कहा कि उनकी पार्टी विधेयक का अंतिम मसौदा देखने के बाद ही अपना रुख तय करेगी. उन्होंने यह भी संकेत दिया कि यदि सभी राज्यों के साथ समान व्यवहार किया जाता है और सीटों के पुनर्वितरण में संतुलन रखा जाता है, तो पार्टी इस पर सकारात्मक विचार कर सकती है. 

यही बयान राजनीतिक विश्लेषकों के बीच चर्चा का विषय बन गया है. क्योंकि यदि एनसीपी सरकार के साथ आती है, तो NDA के लिए विशेष बहुमत जुटाने का लक्ष्य पहले से आसान हो सकता है.

DMK का रुख भी रहेगा निर्णायक

दक्षिण भारत की राजनीति में DMK सबसे प्रभावशाली दलों में गिनी जाती है. पार्टी लंबे समय से परिसीमन को लेकर अपनी चिंताएं जताती रही है. DMK का कहना रहा है कि जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों के संसदीय प्रतिनिधित्व में कमी नहीं आनी चाहिए. इसलिए यदि सरकार ऐसा कोई फार्मूला पेश करती है, जिसमें राज्यों के हितों का संतुलन बना रहे, तो आगे की बातचीत की संभावनाएं बन सकती हैं. हालांकि अभी तक DMK ने समर्थन का कोई आधिकारिक संकेत नहीं दिया है.

आंकड़ों पर नजर

- बहुमत के लिए जरूरी आंकड़ा 362
- एनडीए के पास फिलहाल 298

- टीएमसी के बागी विधायकों की संख्या 20 
- शिवसेना यूबीटी के 6 सांसद
- एनसीपी के 8 सांसद
- डीएमके के 22 सांसद 

अब एनडीए को इन सभी सांसदों का समर्थन मिलता है तो उनका संख्या बल होता है 356. ऐसे में यानी अब एनडीए के सामने सिर्फ 6 वोटों की जरूरत है. ऐसे में ये कहा जा सकता है कि इन 6 वोटों की जुगाड़ करना किसी भी सत्तापक्ष के लिए कोई बड़ी बात नहीं है. लेकिन सारा दारोमदार डीएमके और एनसीपी के वोट काफी मायने रखते हैं. 

विपक्ष के सामने क्यों बढ़ी चुनौती?

इंडिया गठबंधन लगातार विपक्षी एकता की बात करता रहा है. लेकिन हाल के महीनों में कई दलों और नेताओं के अलग रुख अपनाने से विपक्ष की रणनीति पर सवाल उठने लगे हैं. पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के भीतर असंतोष, महाराष्ट्र में राजनीतिक पुनर्संरचना और अन्य क्षेत्रीय दलों की बदलती प्राथमिकताओं ने विपक्ष के लिए चुनौती बढ़ा दी है. यदि संविधान संशोधन जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर विपक्ष एकजुट नहीं रहता, तो सरकार को राजनीतिक लाभ मिल सकता है.

क्या सिर्फ संख्या ही तय करेगी परिणाम?

ऐसा नहीं है... संविधान संशोधन केवल संख्या का खेल नहीं होता। इसमें राजनीतिक सहमति, राज्यों के हित और क्षेत्रीय दलों की मांगें भी अहम भूमिका निभाती हैं. सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वह विभिन्न दलों की आशंकाओं का समाधान कैसे करती है. दूसरी ओर विपक्ष भी यह तय करेगा कि वह एकजुट होकर मतदान करता है या अलग-अलग रणनीति अपनाता है.

अगर बिल पास हुआ तो क्या बदल सकता है?

यदि परिसीमन से जुड़ा संविधान संशोधन विधेयक पारित होता है, तो भविष्य में लोकसभा सीटों के पुनर्निर्धारण का रास्ता साफ हो सकता है. इसके साथ ही महिलाओं के लिए आरक्षण लागू करने जैसी संवैधानिक प्रक्रियाओं को भी आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है, यदि वे संबंधित संशोधन का हिस्सा हों.

हालांकि अंतिम स्वरूप पूरी तरह इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकार संसद में कौन-सा मसौदा पेश करती है और उस पर क्या सहमति बनती है.

मॉनसून सत्र पर टिकी हैं नजरें

20 जुलाई से शुरू होने वाला मॉनसून सत्र केवल विधायी कामकाज के लिहाज से ही महत्वपूर्ण नहीं माना जा रहा, बल्कि यह सरकार और विपक्ष दोनों की राजनीतिक ताकत की भी परीक्षा होगा.

एक ओर सरकार विशेष बहुमत जुटाने की रणनीति पर काम कर रही है, तो दूसरी ओर विपक्ष अपनी एकजुटता बनाए रखने की चुनौती से जूझ रहा है.

परिसीमन विधेयक को लेकर फिलहाल जितनी चर्चा हो रही है, उतना ही बड़ा राजनीतिक गणित भी इसके पीछे छिपा हुआ है. शरद पवार की पार्टी के संभावित रुख, DMK की रणनीति, विपक्ष की एकजुटता और NDA की संख्या..इन सभी पर आने वाले दिनों में देश की राजनीति की दिशा काफी हद तक निर्भर करेगी.

फिलहाल इतना तय है कि मॉनसून सत्र केवल बहस का मंच नहीं होगा, बल्कि संसद के भीतर शक्ति संतुलन की एक बड़ी परीक्षा भी साबित हो सकता है. अंतिम तस्वीर तब साफ होगी, जब विधेयक सदन में पेश होगा और विभिन्न दल अपना आधिकारिक रुख सार्वजनिक करेंगे.

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