जब आग दोनों तरफ लगी हो, तो सबसे पहले चिंगारी सुलगाने वाले का अचानक खामोश हो जाना हैरान भी करता है और खटकता भी है। अमेरिका और ईरान के बीच थमा-थमा सा दिखने वाला बारूद अब एक भयानक विस्फोट की शक्ल ले चुका है। दोनों ओर से हो रहे ताबड़तोड़ हमलों ने एक ऐसे विनाशकारी क्षेत्रीय युद्ध की आहट दे दी है जिससे पूरी दुनिया कांप रही है। लेकिन इस खूनी खेल के बीच, सबसे दिलचस्प और रहस्यमयी भूमिका इस समय इस्राइल की है, जो बिल्कुल 'अदृश्य' होकर पर्दे के पीछे चला गया है। यह वही इस्राइल है जिसके प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू सालों से वॉशिंगटन के गलियारों में घूम-घूमकर डोनाल्ड ट्रंप के कान में यह मंत्र फूंकते थे कि 'तेहरान का इलाज सिर्फ सैन्य हमला है'। यह वही नेतन्याहू हैं जिन्होंने पेंटागन को यह यकीन दिलाया था कि अयातुल्ला खामेनेई और ईरान के शीर्ष नेतृत्व को एक ही झटके में नेस्तनाबूद किया जा सकता है, जिसके बाद 28 फरवरी के उस भयानक हमले की स्क्रिप्ट लिखी गई। यहाँ तक कि ट्रंप की जान को खतरा बताने वाली खुफिया फाइलें भी खुद इस्राइल ने ही अमेरिका को सौंपी थीं, ताकि आग में घी का काम किया जा सके। लेकिन आज न तो नेतन्याहू का कोई आक्रामक बयान आ रहा है, न तेल अवीव की तरफ से कोई विजयघोष हो रहा है। जब अमेरिका खुद फ्रंटफुट पर आकर ईरान को मटियामेट करने पर तुला है, तो इस्राइल ने अचानक यह 'मौन व्रत' क्यों धारण कर लिया है? क्या यह किसी बहुत बड़े तूफान के आने से पहले का सन्नाटा है? क्या इस्राइल इस जंग की पूरी जिम्मेदारी और बदनामी का ठीकरा अमेरिका के सिर फोड़कर खुद को सुरक्षित रखना चाहता है? या फिर खेल इससे कहीं ज्यादा गहरा है, जहाँ मोहरे आगे कर दिए गए हैं और असली खिलाड़ी हाथ बांधकर तमाशा देख रहा है?
ईरान की गोलीबारी से सुरक्षित दूरी
फिलहाल, इज़राइल की तटस्थ रहने की रणनीति ने उसे ईरानी जवाबी कार्रवाई का मुख्य निशाना बनने से बचा लिया है, जबकि बहरीन, कुवैत, जॉर्डन और ओमान जैसे अन्य क्षेत्रीय देश, जहाँ अमेरिकी सैन्य अड्डे हैं, तेहरान की जवाबी कार्रवाई का सबसे अधिक शिकार हुए हैं। इससे इज़राइल को अपने पहले से ही तनावग्रस्त वायु रक्षा प्रणालियों को चुपचाप मजबूत करने के लिए बहुमूल्य समय मिल गया है। गौरतलब है कि हमलों के नवीनतम दौर में अमेरिका ने इज़राइली क्षेत्र को प्रक्षेपण यान के लिए इस्तेमाल करने से भी परहेज किया है। लेकिन यह संतुलन शायद ज़्यादा समय तक न रहे। तेहरान की एक भी गलत चाल – या इज़राइल पर सीधे हमले – से अमेरिका और ईरान के बीच तनाव एक बड़े युद्ध में बदल सकता है; ऐसे में नेतन्याहू जानते हैं कि उनका देश शायद हमेशा इससे दूर नहीं रह पाएगा।
काम पूरा करने की मांग करने वाली आवाज़ें
हालांकि, इज़राइल का सार्वजनिक रूप से शांत रवैया यह नहीं दिखाता कि वह दोबारा सैन्य कार्रवाई नहीं करना चाहता। द न्यूयॉर्क टाइम्स' के अनुसार, अप्रैल में ईरान के साथ युद्धविराम के बाद से ही इज़राइल में काम पूरा करने की मांग उठती रही है। देश के सुरक्षा तंत्र से जुड़े कई लोगों का मानना है कि यह अभियान तब खत्म हो गया, जब इज़राइल ईरान के अहम ऊर्जा बुनियादी ढांचे और अन्य रणनीतिक ठिकानों पर हमला कर सकता था; उनकी नज़र में इन हमलों से इस्लामिक रिपब्लिक (ईरान) काफी कमज़ोर हो सकता था। इज़राइल के पूर्व प्रधानमंत्री शिमोन पेरेस के पूर्व सलाहकार और अब इज़राइल पॉलिसी फ़ोरम के फ़ेलो निम्रोद नोविक ने द न्यूयॉर्क टाइम्स को बताया रक्षा तंत्र और सरकार में हर कोई एक और मौका चाहता है। उन्होंने कहा IDF (इज़राइली सेना) का एक पुराना नारा है बस एक और पहाड़ी, और जीत पक्की है।" साथ ही, उन्होंने यह भी कहा कि इतिहास में शायद ही कभी ऐसा हुआ हो जब यह बात सच साबित हुई हो। नोविक ने द न्यूयॉर्क टाइम्स को यह भी बताया कि इज़राइल की जनता का एक बड़ा हिस्सा और अधिक मिसाइल हमलों और रोज़मर्रा की ज़िंदगी में रुकावटों को सहने के लिए तैयार होगा, अगर इसका मतलब उस ईरानी खतरे को हमेशा के लिए खत्म करना हो, जिसे वे खतरा मानते हैं।
नेतान्याहू क्यों पीछे हट रहे हैं?
साथ ही, 'द न्यूयॉर्क टाइम्स' में बताए गए जानकारों ने चेतावनी दी कि एक और युद्ध से इज़राइल को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। वहीं, ईरान के इंफ्रास्ट्रक्चर के खिलाफ किसी भी बड़े हमले से देश के नेताओं के मुकाबले ईरानी नागरिकों को ज़्यादा परेशानी झेलनी पड़ सकती है। अखबार ने यह भी बताया कि हालिया तनाव के दौरान नेतन्याहू की चुप्पी एक बड़ी रणनीतिक सोच को दिखाती है। जानकारों ने 'द न्यूयॉर्क टाइम्स' को बताया कि इज़राइल के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसी छवि बनाना ठीक नहीं होगा कि वह एक और युद्ध चाहता है। खासकर तब, जब आम धारणा यह है कि नेतन्याहू ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को पिछले संघर्ष में शामिल करने में अहम भूमिका निभाई थी। फिलहाल, इज़राइल ने उस रास्ते को चुना है जिसे कई लोग सबसे कम जोखिम वाला मानते हैं: यानी इंतज़ार करना, जबकि वॉशिंगटन और तेहरान हमलों और जवाबी हमलों के सिलसिले में उलझे हुए हैं। विश्लेषकों का एक और तर्क यह है कि अगर इज़राइल ईरान पर हवाई हमले करता है, तो उसे जॉर्डन, सीरिया और इराक के हवाई क्षेत्र का भी इस्तेमाल करना होगा, जिससे टकराव का दायरा बढ़ेगा और क्षेत्रीय संकट और गहरा जाएगा।
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मिडिल ईस्ट एक बार फिर बारूद के ढेर पर खड़ा है। इजराइल ईरान तनाव लाल सागर में बढ़ते हमले। सीरिया में अस्थिर था और खाली देशों में अमेरिकी सैनिक गतिविधियों के बीच अब अमेरिका ने इराक से अपने सभी सैनिकों को वापस बुलाने का ऐलान कर दिया। 30 सितंबर 2026 तक इराक से अमेरिकी सेना की वापसी पूरी हो जाएगी। 2021 में अफगानिस्तान से वापसी के बाद अब इराक से भी अमेरिकी सैनिकों का जाना दुनिया की राजनीति में एक बड़ा मोड़ जाना जा रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इराक के प्रधानमंत्री अली अल जहदी की संयुक्त घोषणा के बाद यह साफ हो गया कि वाशिंगटन अब अपनी रणनीति बदल रहा है। ट्रंप ने कहा कि अमेरिका और इराक के रिश्ते अब सैन्य नहीं बल्कि व्यापार और अर्थव्यवस्था पर आधारित होंगे। हालांकि जमीनी हकीकत कुछ और कहानी बयां करती है।
एक तरफ अमेरिका इराक छोड़ने की बात कर रहा है। वहीं दूसरी तरफ उसने हाल के महीनों में मिडिल ईस्ट में करीब 10,000 अतिरिक्त सैनिक तैनात किए हैं। अमेरिकी सेंट्रल कमांड के मुताबिक पूरे पश्चिम एशिया में इस वक्त 500 से ज्यादा अमेरिकी सैनिक मौजूद हैं। कुवैत में अमेरिका का सबसे बड़ा जमीनी लॉजिस्टिक सेंटर है। 13,500 से ज्यादा अमेरिकी सैनिक तैनात हैं। कतर के अल उदिद एयरबेस पर 11,000 सैनिक मौजूद हैं। 100 से ज्यादा लड़ाकू विमान मौजूद हैं। बहरीन में अमेरिकी नौसेना की फिफ्थ फ्लिट का मुख्यालय मौजूद है। 9000 से ज्यादा नौसैनिक तैनात हैं। जॉर्डन, यूएई, सऊदी अरब और सीरिया में भी हजारों अमेरिकी सैन्य सक्रिय हैं। ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि अगर अमेरिका मिडिल ईस्ट छोड़ रहा है तो फिर इतनी बड़ी सैन्य मौजूदगी क्यों बनाए हुए हैं? रूसी विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका युद्ध का मैदान नहीं छोड़ रहा बल्कि युद्ध लड़ने का तरीका बदल रहा है।
अफगानिस्तान और इराक में दो दशक तक चले अभियानों ने अमेरिका को हजारों सैनिकों और खरबों डॉलर का नुकसान पहुंचाया है। अब वाशिंगटन कम सैनिकों, ज्यादा तकनीक और तेज सैन्य प्रतिक्रिया वाली रणनीति पर काम कर रहा है। इस नई नीति के तहत अमेरिका स्थाई रूप से बड़ी संख्या में सैनिक रखने के बजाय क़तर, कुवैत और बहरीन जैसे सुरक्षित ठिकानों का इस्तेमाल करेगा। एयरक्राफ्ट कैरियर, ड्रोन, लंबी दूरी की मिसाइलें और खुफिया नेटवर्क के जरिए पूरे क्षेत्र पर नजर रखी जाएगी। यानी सैनिक कम होंगे लेकिन मारक क्षमता पहले से कहीं ज्यादा होगी। इराक से वापसी के पीछे कई कारण है। इराकी संसद और जनता लंबे समय से विदेशी नौसैनिकों की वापसी की मांग कर रहे हैं। वहीं ईरान समर्थित शिया मिलीशिया लगातार अमेरिकी ठिकानों पर ड्रोन और रॉकेट हमले कर रहे थे। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने इराक को एक तरह से प्रॉक्सी वॉर का मैदान बना दिया था। इराक के प्रधानमंत्री अली अल जैदी ने यह भरोसा भी दिलाया है कि अमेरिकी सेना के जाने के बाद देश में मौजूद हत्यारबंद मिलिशिया को कंट्रोल किया जाएगा और सिर्फ सरकारी सुरक्षा बलों के पास ही हथियार रहेंगे। लेकिन सवाल यह है कि क्या इराक वास्तव में इन शक्तिशाली गुटों को काबू कर पाएगा?
इस पूरे घटनाक्रम के बीच सबसे अहम बात यह है कि मिडिल ईस्ट में तनाव कम नहीं हुआ है बल्कि कई मोर्चों पर बढ़ता दिखाई दे रहा है। ईरान का परमाणु कार्यक्रम इजराइल के साथ उसका टकराव सीरिया की अस्थिरता और खाली क्षेत्र की समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा आज भी अमेरिका की प्राथमिकता बने हुए है। दूसरी तरफ चीन भी इस क्षेत्र में अपनी आर्थिक पकड़ मजबूत कर रहा है। ऐसे में अमेरिका किसी भी कीमत पर पश्चिम एशिया को पूरी तरह छोड़ने का जोखिम नहीं उठाना चाहता।
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