सऊदी लीग में भारी खर्च बेअसर, वर्ल्ड कप में नाकामी:नई रणनीति; महंगे सितारों की जगह युवा खिलाड़ियों पर फोकस, ताकि टीम का स्तर सुधरे
सऊदी प्रो लीग के नए सीजन का आगाज हो रहा है। कभी पूरी दुनिया के दिग्गज और उम्रदराज फुटबॉलरों पर पानी की तरह पैसा बहाने वाली लीग अब नए दौर में प्रवेश कर रही है। लीग अब ढलती उम्र के मेगास्टार्स पर पैसा खर्च करने की अपनी पुरानी रणनीति से आगे बढ़ रही है। 2023 में करीब 8000 करोड़ रुपए खर्च कर सुर्खियां बटोरने वाली लीग का फोकस अब सिर्फ नामचीन चेहरों पर नहीं, बल्कि ‘वैल्यू फॉर मनी’ और सऊदी अरब के स्थानीय फुटबॉल के स्तर को ऊपर उठाने पर है। चर्चा थी कि मिस्र के 34 वर्षीय स्टार सालाह सऊदी लीग का हिस्सा बन सकते हैं, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। दरअसल, सालाह अब लीग के नए मॉडल में फिट नहीं बैठते। अब लीग ऐसे युवा खिलाड़ियों को साइन कर रही है, जिनकी भविष्य में रीसेल वैल्यू हो और जिन्हें कुछ साल बाद वापस यूरोप भेजा जा सके। लीग ने विदेशी सितारों को लाकर क्लबों का स्तर तो सुधारा है, लेकिन इसका फायदा नेशनल टीम को नहीं मिला। वर्ल्ड कप से जल्दी बाहर होने के बाद यह सवाल उठा कि क्या अरबों रुपए खर्च करने से स्थानीय खिलाड़ियों का स्तर सुधरा? वर्ल्ड कप में उरुग्वे और केप वर्डे से ड्रॉ और स्पेन से हार के बावजूद यह स्पष्ट हो गया कि स्थानीय खिलाड़ी विदेशी टैलेंट के कारण टीम से बाहर हो रहे हैं। प्लेमेकर, गोलस्कोरर और गोलकीपर जैसी अहम जगहों पर विदेशी काबिज हैं। 26 सदस्यीय वर्ल्ड कप टीम में से सिर्फ सऊद अब्दुलहामिद (लेंस क्लब) ही देश से बाहर खेलते हैं। कुल मिलाकर, सऊदी लीग के लिए 30 पार कर चुके विदेशी सितारों को भारी कीमत पर खरीदने से ज्यादा जरूरी यह है कि वह अपने स्थानीय खिलाड़ियों को मौके दे। तभी लंबी अवधि में सऊदी फुटबॉल का असली विकास संभव हो सकेगा। रोनाल्डो 1000 करियर गोल के ऐतिहासिक मुहाने पर 41 वर्षीय पुर्तगीज स्टार क्रिस्टियानो रोनाल्डो अपने करियर के 1000 गोल से अब सिर्फ 24 गोल दूर हैं। अल-नासर के लिए 107 लीग मैचों में 102 गोल दाग चुके पांच बार के बैलेन डि’ओर विजेता इस सीजन में यह जादुई आंकड़ा छू सकते हैं। हालांकि, सवाल यह है कि रोनाल्डो की यह व्यक्तिगत उपलब्धि लीग की लंबी अवधि की योजनाओं में कैसे फिट बैठती है। दरअसल, पिछले कुछ वर्षों में लीग को कई अंतरराष्ट्रीय ब्रॉडकास्टिंग डील मिलीं। रोनाल्डो की पीली CR7 जर्सी ने लीग को मशहूर तो किया, लेकिन अब लीग का लक्ष्य खेल की गुणवत्ता सुधारना है। इसलिए इस बार किसी यूरोपियन दिग्गज के साथ सऊदी प्रो लीग ने कोई बड़ी डील नहीं की है।
53 साल से पद्मश्री का इंतजार कर रहे फारुख इंजीनियर:1973 में अखबार में नाम छपा था; BCCI सरकार को पत्र लिखेगा
पूर्व भारतीय विकेटकीपर फारुख इंजीनियर को पद्मश्री मिलने का इंतजार 53 साल बाद भी खत्म नहीं हुआ है। 88 साल के इंजीनियर के मुताबिक, 1973 में अखबारों के जरिए उन्हें पता चला था कि सरकार ने उन्हें पद्मश्री के लिए चुना है। उस समय वे इंग्लैंड में भारतीय टीम के साथ खेल रहे थे। टीम मैनेजर हेमू अधिकारी ने भी उन्हें इसकी जानकारी दी थी। लेकिन इसके बाद उन्हें सरकार की ओर से कोई आधिकारिक सूचना नहीं मिली। न मेडल मिला और न ही प्रमाणपत्र। पद्म पुरस्कार की वेबसाइट पर इंजीनियर का नाम 1973 के पद्मश्री सम्मान पाने वालों में दर्ज है। हालांकि, इसके बाद पुरस्कार उन तक क्यों नहीं पहुंचा। इसकी स्थिति स्पष्ट नहीं है। अब इस मामले में BCCI सरकार को पत्र लिखने की तैयारी कर रहा है। इंजीनियर बोले- मेडल ट्रॉफी कैबिनेट में रखूंगा इंजीनियर इंग्लैंड में रहते हैं, लेकिन कहते हैं कि भारत उनके दिल में है। उनका कहना है कि वे पद्मश्री को अपने घर की ट्रॉफी कैबिनेट में रखना चाहते हैं और राष्ट्रपति भवन जाकर राष्ट्रपति के हाथों सम्मान लेना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि मैनचेस्टर के ओल्ड ट्रैफर्ड मैदान में उनके और क्लाइव लॉयड के नाम पर स्टैंड हैं, लेकिन राष्ट्रपति भवन में पद्मश्री लेना उनके लिए उससे भी बड़ा सम्मान होगा। जय शाह से मदद मांगी इंजीनियर ने हाल में ICC चेयरमैन जय शाह से भी इस मामले में मदद मांगी थी। उन्होंने बताया कि पिछले महीने जय शाह ने उनकी मदद करने का भरोसा दिया। इससे पहले उन्होंने पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली से भी इस मामले में मदद मांगी थी। 1971 की ऐतिहासिक सीरीज के बाद मिला था सम्मान फारुख इंजीनियर को 1971 में इंग्लैंड के खिलाफ भारत की ऐतिहासिक टेस्ट सीरीज जीत में योगदान के बाद पद्मश्री के लिए चुना गया था। उस सीरीज के तीसरे टेस्ट में उन्होंने पहली पारी में 59 रन बनाए। भारत की टीम 125/5 के मुश्किल स्कोर पर थी, तब इंजीनियर ने एकनाथ सोलकर के साथ साझेदारी कर टीम को संभाला। दूसरी पारी में उन्होंने 28 रन की नाबाद पारी खेलकर भारत को 174 रन का लक्ष्य हासिल करने में मदद की। 46 टेस्ट खेले, 2,611 रन बनाए इंजीनियर ने भारत के लिए 1961 से 1975 तक 46 टेस्ट खेले। उन्होंने 2,611 रन बनाए। उनका टेस्ट औसत 31.08 रहा। वे उस दौर के मशहूर स्पिन चौकड़ी बिशन सिंह बेदी, ईरापल्ली प्रसन्ना, भागवत चंद्रशेखर और एस. वेंकटराघवन के विकेटकीपर भी रहे। उनके करियर की सबसे यादगार पारियों में 1966-67 में वेस्टइंडीज के खिलाफ मद्रास टेस्ट का शतक शामिल है। उन्होंने उस पारी में लंच से पहले ही 94 रन बना लिए थे। शानदार बल्लेबाज और फुर्तीले विकेटकीपर थे इंजीनियर फारुख इंजीनियर अपने दौर के बेहतरीन विकेटकीपर-बल्लेबाजों में गिने जाते थे। वे आक्रामक बल्लेबाजी के साथ विकेट के पीछे अपनी तेज रिफ्लेक्स के लिए मशहूर थे। यही वजह थी कि 1970 के दशक की शुरुआत में इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया में हुई रेस्ट ऑफ द वर्ल्ड-XI सीरीज के लिए उन्हें पहली पसंद का विकेटकीपर चुना गया। इंजीनियर बाद में इंग्लैंड में बस गए और लंकाशायर के लिए भी क्रिकेट खेला। MCA भी मदद के लिए आगे आया फारुख इंजीनियर ने मुंबई क्रिकेट एसोसिएशन के पदाधिकारियों से भी इस मामले में मदद मांगी है। जून-जुलाई में MCA प्रेसिडेंट-XI के इंग्लैंड दौरे के दौरान इंजीनियर को सम्मानित किया गया था। इसी दौरान उन्होंने MCA के कोषाध्यक्ष अरमान मलिक से पद्मश्री का मेडल हासिल करने में मदद करने को कहा। -------------- गॉल टेस्ट से जुड़ी यह खबर भी पढ़िए… भारत तीन लेफ्ट आर्म स्पिनर उतार सकता है, मोर्केल ने कहा- कुलदीप, जडेजा और सुथार की स्कील्स अलग भारत गॉल टेस्ट में तीन लेफ्ट आर्म स्पिनर उतार सकता है। टीम के बॉलिंग कोच मोर्ने मोर्केल ने गुरुवार को इसके संकेत दिए। टीम कुलदीप यादव, मानव सुथार और रवींद्र जडेजा को प्लेइंग-11 में मौका दे सकती है। पढ़ें पूरी खबर
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