नई दिल्ली, 12 जुलाई (आईएएनएस)। हार्ट फेलियर एक गंभीर बीमारी है, जिससे दुनिया भर में लाखों लोग प्रभावित हैं। यह बीमारी अस्पताल में भर्ती होने की बड़ी वजहों में से एक है। हालांकि इसके लिए दी जाने वाली दवाई हर तरह के मरीजों के लिए के फायदेमंद नहीं हो सकती।
हार्ट फेलियर में दिल शरीर की जरूरत के हिसाब से पर्याप्त मात्रा में खून पंप नहीं कर पाता। जब दिल सही तरीके से काम नहीं कर पाता तो मरीजों को सांस लेने में परेशानी, जल्दी थकान, पैरों और टखनों में सूजन और रोजमर्रा के काम करने में दिक्कत जैसी समस्याएं हो सकती हैं।
हार्ट फेलियर हर मरीज में एक जैसा नहीं होता। इसका एक प्रकार ऐसा होता है जिसमें दिल की मांसपेशियां कमजोर हो जाती हैं और वह खून को ठीक से पंप नहीं कर पाता। इसे हार्ट फेलियर विद रिड्यूस्ड इजेक्शन फ्रैक्शन कहा जाता है। इसके इलाज के लिए कई दवाएं लंबे समय से इस्तेमाल की जा रही हैं।
वहीं, हार्ट फेलियर का एक दूसरा प्रकार भी है, जो लगभग आधे मरीजों में देखा जाता है। इसमें दिल खून को सामान्य मात्रा में पंप तो करता है, लेकिन दिल की मांसपेशियां सख्त हो जाती हैं और ठीक से फैल नहीं पातीं। इस वजह से हर धड़कन के बीच दिल में पर्याप्त खून नहीं भर पाता। इसे हार्ट फेलियर विद प्रिजर्व्ड इजेक्शन फ्रैक्शन (एचएफपीईएफ) कहा जाता है।
डॉक्टर कमजोर दिल वाले हार्ट फेलियर के मरीजों को अक्सर बीटा-ब्लॉकर दवाएं देते हैं। ये दवाएं दिल की धड़कन को धीमा करती हैं और दिल पर पड़ने वाले दबाव को कम करती हैं। इन दवाओं से कमजोर दिल वाले मरीजों में फायदा देखा गया है और इससे अस्पताल में भर्ती होने का खतरा भी कम हो सकता है।
लेकिन क्या ये दवाएं सख्त दिल वाले मरीजों के लिए भी उतनी ही फायदेमंद हैं? इसी बात को जानने के लिए अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ वर्मोंट के शोधकर्ताओं ने एक बड़ी स्टडी की। यह अध्ययन यूनिवर्सिटी ऑफ वर्मोंट के डॉ. टिमोथी प्लांटे के नेतृत्व में किया गया और इसे जेएएमए नेटवर्क ओपन में प्रकाशित किया गया।
शोधकर्ताओं ने टॉपकैट स्टडी के आंकड़ों का विश्लेषण किया, जो अमेरिका के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ द्वारा समर्थित एक बड़ा क्लिनिकल ट्रायल था। इसमें शामिल करीब 80 प्रतिशत मरीज बीटा-ब्लॉकर दवाएं ले रहे थे। इससे शोधकर्ताओं को दवा लेने वाले और दवा न लेने वाले मरीजों के स्वास्थ्य परिणामों की तुलना करने का मौका मिला।
स्टडी के नतीजे कुछ चौंकाने वाले रहे। शोधकर्ताओं ने पाया कि सख्त दिल वाले मरीज जो बीटा-ब्लॉकर ले रहे थे, उनमें हार्ट फेलियर बिगड़ने की वजह से अस्पताल में भर्ती होने का खतरा 74 प्रतिशत तक ज्यादा देखा गया।
इसका मतलब यह नहीं है कि बीटा-ब्लॉकर हर मरीज के लिए नुकसानदायक हैं, लेकिन यह जरूर संकेत मिलता है कि जो दवाएं कमजोर दिल वाले मरीजों के लिए फायदेमंद हैं, जरूरी नहीं कि वही दवाएं सख्त दिल वाले मरीजों के लिए भी काम करें।
शोधकर्ताओं का मानना है कि इसके पीछे एक कारण यह हो सकता है कि एचएफपीईएफ में दिल पहले से ही ठीक से रिलैक्स नहीं कर पाता। बीटा-ब्लॉकर दिल की गति को धीमा करते हैं, जिससे कुछ मरीजों में दिल के अंदर दबाव बढ़ सकता है। इससे शरीर में पानी जमा होने, सांस फूलने और सूजन जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं।
हालांकि, विशेषज्ञों ने यह भी कहा है कि मरीज अपनी मर्जी से बीटा-ब्लॉकर दवा बंद न करें। कई लोग इन दवाओं का इस्तेमाल हाई ब्लड प्रेशर, अनियमित दिल की धड़कन, हार्ट अटैक के बाद सुरक्षा या अन्य कारणों से करते हैं। दवा में कोई भी बदलाव डॉक्टर की सलाह के बाद ही करना चाहिए।
यह अध्ययन हार्ट फेलियर के एचएफपीईएफ प्रकार के लिए नए और बेहतर इलाज खोजने की जरूरत पर जोर देता है।
--आईएएनएस
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समय स्वयं से कभी सार्वजनिक घोषणा नहीं करता। वह कोई शंखनाद नहीं करता, कोई बिगुल भी नहीं बजाता। वह केवल संकेत देता है। जो संकेतों को समझ लेते हैं, वे इतिहास में गरिमा के साथ दर्ज होते हैं। जो उन्हें अनसुना करते हैं, वे भी इतिहास में दर्ज तो होते हैं, लेकिन उनके अंतिम अध्याय पर अक्सर एक अनावश्यक उदासी की परत चढ़ जाती है।
लंदन से डॉ. हिमांशु द्विवेदी
गत दिवस विंबलडन के सेंटर कोर्ट पर जैनिक सिनर के हाथों नोवाक जोकोविच की लगातार तीन सेटों में हुई हार केवल एक सेमीफाइनल का परिणाम नहीं थी। वह समय की दस्तक थी। यह वह क्षण था, जब टेनिस ने स्वयं अपने सबसे बड़े योद्धाओं में से एक से समय ने कहा, अब अगली पीढ़ी का समय है।
रोजर फेडरर ने यह आवाज समय रहते सुन ली थी। राफेल नडाल ने भी सुन ली। दोनों जानते थे कि महानता केवल यह नहीं कि आप कितनी बार जीतते हैं; महानता यह भी है कि आप विदा कब लेते हैं? वे खेल से हारे नहीं थे, उन्होंने बढ़ती उम्र के अहसास को महसूस कर समय से संघर्ष करना छोड़ दिया था। इसलिए आज उनकी स्मृतियों में पराजय नहीं, केवल वैभव दिखाई देता है।
नोवाक जोकोविच अलग प्रकृति के खिलाड़ी हैं। शायद टेनिस इतिहास में उनसे अधिक जुझारू खिलाड़ी कम ही हुए हैं। टूटना उन्होंने सीखा ही नहीं। कठिन से कठिन परिस्थितियों में लौटकर जीतना उनकी पहचान रही है। यही जिद, यही आत्मविश्वास और यही अदम्य इच्छाशक्ति उन्हें उन ऊंचाइयों तक ले गई, जहां पहुंचना अधिकांश खिलाड़ियों के लिए केवल सपना रह जाता है। इसीलिए आज भी वे ग्रैंड स्लैम के सेमीफाइनल तक पहुंच जाते हैं। उनतालीस वर्ष की आयु में भी दुनिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों के बीच खड़े दिखाई देते हैं।
यह किसी साधारण खिलाड़ी की उपलब्धि नहीं हो सकती। लेकिन खेल केवल वहाँ तक पहुंचने का नाम नहीं है। महान खिलाड़ियों की असली पहचान वहां होती है, जहां वे निर्णायक मुकाबले जीतते हैं। इस कसौटी पर असें से महसूस हो रहा है कि जोकोविच अब अव्वल नहीं रहे।
विंबलडन के सेमीफाइनल में दुनिया एक संघर्ष देखना चाहती थी। वह चाहती थी कि अनुभव और युवावस्था का टकराव पांच सेटों तक जाए। लेकिन कोर्ट पर जो दिखाई दिया, वह एकतरफा था। तीन सेट, तीन बार 6-4, और लगभग पूरे मैच पर सिनर का नियंत्रण। जोकोविच लड़ते हुए ही नहीं दिखे, वे समय का पीछा करते हुए दिखे। जिस जोकोविच के सर्विस रिटर्न की दुनिया दीवानी रही, वह सिनर की सर्विस के आगे असहाय दिखे। पिछले कुछ समय से वह सिनर और अल्कारेज के आगे इतने ही असहाय महसूस होते आ रहे हैं।
निस्संदेह, क्वार्टरफाइनल में उन्होंने पाँच घंटे से अधिक का थकाऊ मुकाबला जीतकर अपनी महानता का एक और प्रमाण दिया था। लेकिन आधुनिक टेनिस किसी एक दिन का खेल नहीं है। यहां हर दूसरे दिन शरीर से वही गति, वही विस्फोट और वही ऊर्जा मांगी जाती है। यदि बहत्तर घंटे पहले खेला गया एक लंबा मैच सेमीफाइनल में आपकी
सबसे बड़ी कमजोरी बन जाए, तो समझ लेना चाहिए कि प्रतिद्वंद्वी नहीं। समय आपको चुनौती दे रहा है। समय पर सही फैसला ही इतिहास में। आपको अमरता दिलाता है। भारतीय क्रिकेट इस संदर्भ में दो विपरीत उदाहरण देता है। सुनील गावस्कर ने संव्यास उस समय लिया जब लोग उन्हें रोकना चाहते थे। अपने अंतिम एकदिवसीय मैच से ठीक पहले वाले मैच में उन्होंने करियर का एकमात्र वनडे शतक लगाया था।
अंतिम टेस्ट मैच में भी पाकिस्तान के तेज आक्रमण के सामने उन्होंने 96 रन बनाकर यह साबित कर दिया था कि उनके भीतर अभी भी बहुत क्रिकेट बाकी है। तब लोगों ने पूछा 'इतनी जल्दी क्यों लेकिन उन्होंने अपने शरीर की क्षमता को भांपते हुए बल्ला रख दिया था।
दूसरी ओर कपिल देव थे। विश्व कप विजेता कप्तान, भारतीय क्रिकेट के महानतम ऑलराउंडरों में एक। लेकिन रिचर्ड हैडली के विकेटों का विश्व रिकॉर्ड तोड़ने की चाह में वे अपेक्षा से अधिक समय तक खेलते रहे। तब सवाल बदल गया" अब तक क्यों महान खिलाड़ियों के सामने अंतत यही दो रास्ते होते हैं। या तो लोग कहें।" अभी क्यों जा रहे हो?' या फिर कहें। अब तक क्यों रुके हो?
नोवाक जोकोविच आज इसी चौराहे पर खड़े है। उनकी उपलब्धियां किसी प्रमाणपत्र की मोहताज नहीं। सबसे अधिक ग्रैंड स्लैम, सबसे अधिक संघर्षपूर्ण जीते और सबसे अधिक वापसी की कहानियों का वह हिस्सा है।
उन्होंने टेनिस के इतिहास को नई परिभाषाएं दी हैं। लेकिन हर महान खिलाड़ी की विरासत उसकी अंतिम ट्रॉफी से नहीं, उसके अंतिम निर्णय से भी तय होती है। सिनर और अल्काराज अब भविष्य नहीं है। वे वर्तमान है। खेल की धारा आगे बढ़ चुकी है। पुरानी पीढ़ी का सम्मान तभी अक्षुण्ण रहता है, जब वह नई पीढ़ी के लिए मंच भी सम्मानपूर्वक छोड़ती है।
शायद समय आ गया है कि बिग थी का अंतिम अध्याय भी उसी गरिमा के साथ लिखा जाए, जैसी गरिमा से उसके अभी तक अध्याय लिखे गए क्योंकि कुछ खिलाड़ी हारकर छोटे नहीं होते। वे केवल समय को जीतने की कोशिश करते-करते यह भूल जाते हैं कि समय से कोई नहीं जीतता। और सच तो यह है कि जो समय की आहट सुन ले वही सबसे बड़ा विजेता होता है।
शीर्ष दो खिलाड़ियों के बीच फाइनल विम्बलडन का पुरुष एकल फाइनल इस बार दुनिया के नंबर एक और नंबर दो खिलाड़ियों के बीच खेला जाएगा। दिलचस्प बात यह है कि पिछले वर्ष भी फाइनल शीर्ष दो खिलाड़ियों के बीच ही हुआ था, बस चेहरे बदल गए हैं। तब मुकाबला कार्लोस अल्काराज और यानिक सिनर के बीच था, जिसमें सिनर ने बाजी मारते हुए फ्रेंच ओपन की हार का बदला महज कुछ ही सप्ताह बाद विम्बलडन की घास पर चुका दिया था। इस बार कहानी फिर कुछ वैसी ही लग रही है। फर्क इतना है कि सामने कार्लोस अल्काराज नहीं, बल्कि फ्रेंच ओपन के नए चैंपियन अलेक्जेंडर ज्वेरेव हैं।
पेरिस की लाल मिट्टी पर ग्रैंड स्लैम जीतने के बाद अब ज्वेरेव की परीक्षा विम्बलडन की हरी घास पर होगी, जबकि दूसरी ओर गत चैंपियन और विश्व नंबर एक यानिक सिनर अपने ताज को बचाने के इरादे से उतरेंगे। दोनों की मौजूदा फॉर्म, रैंकिंग और दांव पर लगी प्रतिष्ठा को देखते हुए टेनिस प्रेमियों को एक रोमांचक और उच्चस्तरीय मुकाबले की उम्मीद है।
हालांकि, एक दिलचस्प संयोग यह भी है कि जिस समय दुनिया भर के टेनिस प्रेमियों की निगाहें विम्बलडन पर टिकी हैं, उसी समय ब्रिटेन का खेल माहौल कुछ अलग कहानी कह रहा है। इंग्लैंड की फुटबॉल टीम विश्व कप के अहम मुकाबलों में व्यस्त है, इसलिए लंदन और पूरे इंग्लैंड में चर्चा का सबसे बड़ा विषय विम्बलडन नहीं, बल्कि फुटबॉल है। यह खेल संस्कृति की वही खूबसूरती है, जहां एक ओर सेंटर कोर्ट पर इतिहास लिखने की तैयारी है, तो दूसरी ओर फुटबॉल का जुनून लोगों की धड़कनों पर राज कर रहा है।