ट्रायल में देरी पर सुप्रीम कोर्ट ने जताई चिंता, महाराष्ट्र सरकार से मांगा जवाब
सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान ट्रायल में हो रही देरी पर चिंता जताई. अदालत ने कहा कि किसी भी आपराधिक मामले में समय पर सुनवाई होना न्याय व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. कोर्ट के सामने यह बात रखी गई कि संबंधित मामले में आरोपी करीब चार साल से न्यायिक हिरासत में है, जबकि अब तक 45 गवाहों में से केवल दो गवाहों की ही गवाही दर्ज हो सकी है. इस स्थिति पर अदालत ने कहा कि ऐसी देरी न्यायिक प्रक्रिया के लिए चिंता का विषय है और इस पर गंभीरता से ध्यान दिए जाने की जरूरत है.
सुनवाई के दौरान जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने कहा कि अदालत लंबे समय से ऐसे मामलों को देख रही है, जहां मुकदमों की सुनवाई अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ पा रही है. उन्होंने इस बात पर भी चिंता जताई कि जब जमानत याचिका पर सुनवाई होती है तो राज्य की ओर से उसका विरोध किया जाता है, लेकिन दूसरी ओर मुकदमे को समय पर आगे बढ़ाने की प्रक्रिया भी उतनी ही महत्वपूर्ण है. अदालत का कहना था कि न्याय तभी प्रभावी माना जाता है, जब जांच, सुनवाई और फैसला सभी उचित समय के भीतर पूरे हों.
इस मामले में आरोपी ने जमानत की मांग की थी. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल जमानत देने से इनकार कर दिया. अदालत का कहना था कि इस चरण में जमानत देने का आधार नहीं बनता है. इसके साथ ही कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ट्रायल में हो रही देरी एक अलग और गंभीर मुद्दा है, जिस पर जवाब मांगा जाना जरूरी है. अदालत ने महाराष्ट्र सरकार की ओर से पेश वकील को इस संबंध में विस्तृत जवाब दाखिल करने का अवसर दिया है.
पुराने मामलों में तेजी लाने के लिए लगातार प्रयास
सुनवाई के दौरान राज्य की ओर से यह भी कहा गया कि पुराने मामलों में तेजी लाने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं और व्यवस्था में सुधार की दिशा में काम हो रहा है. अदालत ने इस पक्ष को भी रिकॉर्ड पर लिया और विस्तृत जवाब दाखिल करने के लिए समय दिया. अब इस मुद्दे पर अगली सुनवाई 24 जुलाई को होगी, जहां राज्य अपनी ओर से पूरी जानकारी अदालत के सामने रखेगा.
कानूनी जानकारों का मानना है कि किसी भी आपराधिक मुकदमे में समय पर गवाहों के बयान दर्ज होना और सुनवाई आगे बढ़ना बेहद जरूरी होता है. इससे न केवल न्यायिक प्रक्रिया मजबूत होती है, बल्कि सभी पक्षों को समय पर न्याय मिलने की संभावना भी बढ़ती है. यही वजह है कि अदालतें समय-समय पर लंबित मामलों की प्रगति की समीक्षा करती रहती हैं और जहां जरूरत होती है, वहां संबंधित पक्षों से जवाब भी मांगती हैं.
ट्रायल में हुई देरी पर विस्तृत स्पष्टीकरण मांगा
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी इसी व्यापक सिद्धांत की याद दिलाती है कि न्याय केवल फैसला सुनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भी जरूरी है कि मुकदमे अनावश्यक देरी के बिना आगे बढ़ें. अदालत ने फिलहाल जमानत याचिका खारिज करते हुए ट्रायल में हुई देरी पर विस्तृत स्पष्टीकरण मांगा है. अब सभी की नजर 24 जुलाई की अगली सुनवाई पर रहेगी, जब इस विषय पर महाराष्ट्र सरकार का विस्तृत जवाब अदालत के सामने रखा जाएगा.
सरकार ने 1600 और 140 सीरीज वाले फोन नंबरों को लेकर फैली भ्रामक खबरों पर जारी किया स्पष्टीकरण
नई दिल्ली, 10 जुलाई (आईएएनएस)। 1600 और 140 सीरीज के फोन नंबरों को लेकर सामने आ रही कुछ मीडिया रिपोर्ट्स पर केंद्र सरकार ने शुक्रवार को स्पष्टीकरण जारी किया है। सरकार ने कहा कि इन रिपोर्ट्स से लोगों में गलतफहमी फैल सकती है और इन नंबरों के इस्तेमाल को लेकर भ्रम पैदा हो सकता है।
भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (टीआरएआई) ने बयान जारी कर बताया कि 1600 सीरीज के नंबरों का इस्तेमाल केवल बैंकिंग, वित्तीय सेवाएं और बीमा (बीएफएसआई) क्षेत्र की विनियमित संस्थाओं द्वारा सेवा और लेन-देन (सर्विस एंड ट्रांजैक्शन) से जुड़ी कॉल करने के लिए किया जाता है।
टीआरएआई के अनुसार, इन नंबरों का उपयोग भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई), भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी), भारतीय बीमा विनियामक एवं विकास प्राधिकरण (आईआरडीएआई) तथा पेंशन फंड नियामक एवं विकास प्राधिकरण (पीएफआरडीए) के अधीन आने वाली संस्थाएं अपने मौजूदा ग्राहकों से संपर्क करने के लिए करती हैं। इसके अलावा, सरकारी संस्थाएं भी नागरिकों तक महत्वपूर्ण सूचनाएं पहुंचाने के लिए इसी सीरीज के नंबरों का इस्तेमाल करती हैं।
टीआरएआई ने कहा, 1600 सीरीज के नंबर जारी करने का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि ग्राहकों और नागरिकों को मिलने वाली ऐसी महत्वपूर्ण कॉल विश्वसनीय हों। टेलीकॉम कमर्शियल कम्युनिकेशंस कस्टमर प्रेफरेंस रेगुलेशन (टीसीसीसीपीआर) के तहत 1600 सीरीज से आने वाली कॉल को टैग करना, ब्लॉक करना या फिल्टर करना अनुमति नहीं है।
वहीं, 140 सीरीज के नंबरों का इस्तेमाल सभी क्षेत्रों की कंपनियों और संस्थाओं द्वारा प्रमोशनल कॉल करने के लिए अनिवार्य किया गया है।
टीआरएआई ने बताया कि जो भी संस्था 140 सीरीज के नंबर से प्रमोशनल कॉल करना चाहती है, उसे टीसीसीसीपीआर के तहत संबंधित टेलीकॉम सेवा प्रदाता के साथ पंजीकरण कराना होगा और नियामकीय नियमों का पालन करना होगा।
दूरसंचार नियामक ने यह भी कहा कि ग्राहकों के पास यह अधिकार है कि वे डू नॉट डिस्टर्ब (डीएनडी) रजिस्ट्री के माध्यम से तय कर सकें कि वे 140 सीरीज से आने वाली प्रमोशनल कॉल प्राप्त करना चाहते हैं या नहीं। ग्राहक चाहें तो किसी एक, कई या सभी क्षेत्रों से आने वाली प्रमोशनल कॉल को ब्लॉक कर सकते हैं।
टीआरएआई के अनुसार, यदि किसी ग्राहक ने डीएनडी रजिस्ट्री में किसी विशेष क्षेत्र या सभी क्षेत्रों की प्रमोशनल कॉल ब्लॉक कर रखी हैं, तो उसे 140 सीरीज से उन क्षेत्रों की कोई कॉल नहीं मिलेगी।
ग्राहक अपनी डीएनडी प्राथमिकता कई माध्यमों से दर्ज करा सकते हैं। इसके लिए टीआरएआई डीएनडी ऐप का भी उपयोग किया जा सकता है।
टीआरएआई ने स्पष्ट किया कि 140 सीरीज से आने वाली कॉल को भी टैग या फिल्टर करने की अनुमति नहीं है। केवल डीएनडी रजिस्ट्री के अनुसार इन्हें ब्लॉक किया जा सकता है। नियामक के अनुसार, कॉल को टैग करने से उन ग्राहकों में भ्रम पैदा हो सकता है, जिन्होंने किसी विशेष क्षेत्र से प्रमोशनल कॉल प्राप्त करने की अनुमति दे रखी है।
--आईएएनएस
डीबीपी
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