ईरान के सरकारी मीडिया ने पहली बार वह फुटेज सार्वजनिक किया है, जिसमें 28 फरवरी, 2025 को अमेरिका और इजराइल के संयुक्त हवाई हमलों में तबाह हुआ दिवंगत सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई का आधिकारिक आवास परिसर दिखाई दे रहा है। इसी भीषण हमले में 86 वर्षीय खामेनेई की मौत हो गई थी।
35 सेकंड के वीडियो में दिखी भारी तबाही
ईरान के सरकारी टेलीविजन और खामेनेई की आधिकारिक वेबसाइट पर जारी किए गए 35 सेकंड के इस वीडियो में 'इमाम खुमैनी हुसैनीया' को दिखाया गया है। यह तेहरान स्थित सर्वोच्च नेता के परिसर का वही मुख्य हॉल है, जो लंबे समय तक खामेनेई के सार्वजनिक भाषणों, राजनीतिक बैठकों और धार्मिक सभाओं का केंद्र रहा था। वीडियो में पूरा हॉल मलबे से पटा हुआ है, दीवारें ढह चुकी हैं और चारों तरफ भारी तबाही के निशान साफ नजर आ रहे हैं। इस फुटेज को उस हमले से हुए नुकसान का पहला प्रत्यक्ष और पुख्ता दृश्य प्रमाण माना जा रहा है।
यह हॉल लंबे समय तक खामेनेई के सार्वजनिक भाषणों और उनके शासनकाल के दौरान धार्मिक सभाओं का मुख्य स्थान रहा था। हाल ही में जारी फुटेज से उस हमले से हुए नुकसान का पहला दृश्य प्रमाण मिलता है, जिसमें ईरान पर US-इजराइल युद्ध के पहले ही दिन 86 वर्षीय नेता की मौत हो गई थी। परिसर पर हुए हमले में खामेनेई के साथ उनके परिवार के कई सदस्यों की भी मौत हुई, जिनमें उनकी 14 महीने की पोती भी शामिल थी। ख़बरों के अनुसार, हमले में उनके बेटे और मौजूदा सर्वोच्च नेता, मोजतबा अली खामेनेई भी घायल हो गए थे।
खामेनेई का अंतिम संस्कार
खामेनेई के पार्थिव शरीर को 9 जुलाई को उनके गृहनगर मशहद में इमाम रज़ा की दरगाह के पास दफनाया जाएगा। इसके साथ ही 4 जुलाई को तेहरान में शुरू हुआ छह दिवसीय राजकीय अंतिम संस्कार कार्यक्रम संपन्न हो जाएगा।
दफनाने से पहले, अंतिम संस्कार का जुलूस इराक के पवित्र शहरों नजफ और कर्बला से होकर गुजरेगा। ईरानी सरकारी मीडिया के अनुसार, खामेनेई के शव को शिया इस्लाम के सबसे पवित्र स्थलों में से एक, नजफ में इमाम अली की दरगाह में ले जाया गया, जहाँ अंतिम संस्कार समारोह के पांचवें दिन श्रद्धांजलि देने के लिए हजारों लोग जमा हुए थे।
अंतिम संस्कार मुख्यालय के एक प्रवक्ता ने कहा कि शव को दफनाने के लिए वापस ईरान ले जाने से पहले जुलूस कर्बला तक जाएगा। ईरानी झंडे में लिपटे खामेनेई के ताबूत को शोक मनाने वालों ने एक बड़े जुलूस के हिस्से के रूप में नजफ की सड़कों पर ले जाया। छह दिनों तक चली अंतिम संस्कार की यात्रा — जो तेहरान, क़ोम, नजफ़ और कर्बला से गुज़री — में लाखों शोक मनाने वाले लोग शामिल हुए। इसके साथ ही, इस क्षेत्र और बाहर से भी कई विदेशी गणमान्य व्यक्ति और राजनीतिक प्रतिनिधि भी इसमें शामिल हुए।
खास बात यह है कि ईरान के नए सर्वोच्च नेता, अयातुल्ला मोजतबा खामेनेई, अभी तक अंतिम संस्कार के कार्यक्रमों में शामिल नहीं हुए हैं, जो कई दिनों से चल रहे हैं। माना जा रहा है कि वह छिपे हुए हैं; खबरों के अनुसार, जिस हवाई हमले में उनके पिता की मौत हुई थी, उसमें वह भी घायल हो गए थे।
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पाकिस्तान की सिविलियन-मिलिट्री मिली-जुली सरकार के फैसलों और बयानों में अक्सर एक गहरा दोहरापन नजर आता है। हाल के दिनों में यह दोहरापन उसकी पूर्व-इस्लामिक (प्री-इस्लामिक) विरासत, विशेषकर सिंधु घाटी सभ्यता की साझी विरासत को अपना बताने की कोशिशों में साफ देखा जा सकता है। इस्लामाबाद ने इस नैरेटिव को गढ़ने पर तब से और ज्यादा ध्यान दिया है, जब अप्रैल 2025 में भारत द्वारा सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) को सस्पेंड कर दिया गया। प्राचीन भारतीय (इंडिक) विरासत पर अपना दावा ठोकने की पाकिस्तान की यह कोशिश एक अजीब विरोधाभास का शिकार हो जाती है—उसके सबसे घातक हथियारों, खासकर मिसाइलों के नाम उन विदेशी हमलावरों के नाम पर हैं, जिन्हें भारतीय उपमहाद्वीप में सिर्फ आक्रमण, मारकाट और लूटपाट के लिए जाना जाता है।
दो-राष्ट्र सिद्धांत से 'सिंधु सभ्यता' तक का वैचारिक भटकाव
आधुनिक पाकिस्तान की नींव 'दो-राष्ट्र सिद्धांत' (Two-Nation Theory) पर टिकी थी, जिसके तहत हिंदू और मुसलमान एक साथ नहीं रह सकते थे। 1947 के विभाजन के बाद, विशेष रूप से जनरल ज़िया-उल-हक के तानाशाही दौर में, पाकिस्तान ने एक कट्टर इस्लामी पहचान को गले लगाया। वहां के इतिहास को तोड़-मरोड़कर 8वीं सदी ईस्वी में मुहम्मद बिन कासिम द्वारा की गई सिंध की विजय के इर्द-गिर्द समेट दिया गया।
दशकों तक पाकिस्तानी पाठ्यपुस्तकों में यही पढ़ाया गया कि उनका इतिहास 712 ईस्वी से शुरू होता है। लेकिन आज, सिंधु नदी के पानी पर अपना हक जताने और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर खुद को प्राचीन सभ्यता का केंद्र दिखाने के लिए पाकिस्तान अचानक अपनी 'इस्लाम-पूर्व' सिंधु घाटी सभ्यता की जड़ों को याद करने लगा है।
विदेशी आक्रांताओं का महिमामंडन और सैन्य नामकरण
पाकिस्तान लंबे समय से अपनी राष्ट्रीय पहचान को भारतीय उपमहाद्वीप के मूल इतिहास से काटने के लिए अरब, अफगान और तुर्क हमलावरों की विरासत से जोड़ता रहा है। इन हमलावरों ने हिंदू कुश पर्वतमाला को पार कर भारत के बड़े हिस्सों को लहूलुहान किया और अपने राजवंश स्थापित किए। पाकिस्तानी सेना ने प्रतीकात्मक रूप से अपने हथियारों और मिसाइलों का नामकरण इन्हीं आक्रांताओं के नाम पर करके इन्हें अपने मुख्य प्रतिद्वंदी (भारत) के खिलाफ एक मनोवैज्ञानिक हथियार के रूप में पेश किया है।
वैश्विक स्तर पर हथियार नामकरण की अपनी-अपनी परंपराएं हैं। उदाहरण के लिए, अमेरिका अपने टैंकों के नाम महान सैन्य जनरलों (जैसे- M1 अब्राम्स, पैटन) पर रखता है। भारत अपने रक्षा बेड़े के लिए पौराणिक कथाओं, महाकाव्यों और संस्कृत शब्दों का चयन करता है—जैसे 'अग्नि' और 'पृथ्वी' मिसाइलें, 'अर्जुन' और 'भीष्म' टैंक, तथा फाइटर जेट 'तेजस'। इसके विपरीत, पाकिस्तान की मुख्य मिसाइलें भारत को जख्म देने वाले हमलावरों की याद दिलाती हैं:
हत्फ़-II अब्दाली: इसका नाम अफगान शासक अहमद शाह दुर्रानी (अब्दाली) के नाम पर है, जिसने 18वीं सदी में भारत पर कई क्रूर हमले किए।
हत्फ़-III गज़नवी: यह नाम तुर्क शासक महमूद गज़नवी की याद दिलाता है, जिसने भारत पर 17 बार आक्रमण किए और 1025 में प्रसिद्ध सोमनाथ मंदिर को लूटा।
हत्फ़-V ग़ौरी: इसका नाम मुहम्मद ग़ौरी पर रखा गया है, जिसने तराइन की दूसरी लड़ाई (1192) में जीत हासिल कर दिल्ली सल्तनत की नींव रखी थी।
हत्फ़-VII बाबर: यह मुग़ल साम्राज्य के संस्थापक बाबर के नाम पर है, जिसने उत्तर भारत को जीता था।
तैमूर क्रूज़ मिसाइल: इसका नाम 14वीं सदी के उस क्रूर तुर्क-मंगोल विजेता (तैमूर लंग) के नाम पर है, जिसने 1398 में दिल्ली में कत्लेआम और लूटपाट मचाई थी।
अरबी शब्दावली और सैन्य अभियानों का इस्लामीकरण
केवल मिसाइलें ही नहीं, पाकिस्तान के पूरे सैन्य ढांचे पर अरबी और शुरुआती इस्लामी इतिहास की गहरी छाप है। पूरी 'हत्फ़' मिसाइल श्रृंखला और 'अंज़ा' एयर-डिफेंस सिस्टम के नाम पैगंबर मुहम्मद के हथियारों (भाले) के अरबी नामों पर हैं। नौसेना के युद्धपोत 'ज़ुल्फ़िकार' का नाम उनकी ऐतिहासिक तलवार पर है। इसके अलावा, 'अल-खालिद' और 'अल-ज़रार' टैंक शुरुआती अरब जनरलों के नाम पर हैं, जबकि 'रा'द' क्रूज़ मिसाइल का नाम कुरान की 13वीं सूरह से प्रेरित है।
यह वैचारिक सोच केवल हथियारों तक सीमित नहीं है, बल्कि सैन्य अभियानों के नाम भी इसी मानसिकता से तय होते हैं। 1965 में कश्मीर में घुसपैठ के पाकिस्तानी ऑपरेशन का कोडनेम 'ऑपरेशन जिब्राल्टर' था, जो 8वीं सदी में स्पेन पर मुस्लिम विजय की याद दिलाता है। हाल ही में, मई 2025 में भारत के खिलाफ अपनी सैन्य तैयारियों को पाकिस्तानी सेना ने 'ऑपरेशन बनयान-उन-मारसूस' का नाम दिया। यहाँ तक कि पाकिस्तान की सेना का मीडिया विंग (DG ISPR) बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा के उग्रवादियों को "भारतीय प्रॉक्सी" बताने के लिए 'फ़ितना अल-खवारिज' और 'फ़ितना अल-हिंदुस्तान' जैसी सातवीं सदी की धार्मिक शब्दावली का इस्तेमाल करता है।
क्या कभी बदलेगा मिसाइलों का नाम?
हाल ही में पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने इस गहरे अंतर्विरोध को खुद स्वीकार किया था। उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था कि पाकिस्तान का इतिहास इस्लाम के आने से बहुत पहले का है और चंद्रगुप्त मौर्य, अशोक तथा कनिष्क भी इसी धरती की विरासत हैं। आसिफ ने तो महमूद गजनवी की यह कहकर आलोचना भी की थी कि उसने इस्लाम का प्रचार नहीं किया, बल्कि वह केवल भारत में "लूट-पाट" करने आया था।
लेकिन सवाल उठता है कि क्या पाकिस्तान अपनी इस 'भारतीय जड़ों' को अपनाने के दावों के तहत कभी अपनी मिसाइलों के नाम बदलेगा? इसका जवाब 'ना' में है।
पाकिस्तान में रणनीतिक हथियारों का नामकरण पूरी तरह वहां की सेना (रावलपिंडी) तय करती है, न कि लोकतांत्रिक सरकार। वर्तमान में पाकिस्तानी सेना का नेतृत्व फील्ड मार्शल आसिम मुनीर कर रहे हैं, जो सेना को पूरी तरह इस्लामी रंग देने में जुटे हैं। मुनीर खुद 'हाफ़िज़-ए-कुरान' हैं और उनके रहते सेना का अपनी इंडिक (भारतीय) सभ्यतागत पहचान की ओर मुड़ना असंभव है।
इस प्रकार, जिस ज़मीन पर कभी वैदिक संस्कृति, सिंधु घाटी सभ्यता और गांधार कला फली-फूली, उस इतिहास को पाकिस्तानी सेना ने पूरी तरह दरकिनार कर दिया है। जब तक पाकिस्तान के सबसे घातक हथियार भारत को लूटने वाले क्रूर हमलावरों का महिमामंडन करते रहेंगे, तब तक उसकी 'प्री-इस्लामिक भारतीय विरासत' को अपनाने की हर असैन्य कोशिश खोखली और महज एक कूटनीतिक दिखावा ही साबित होगी।
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