Explainer: टेक्सटाइल वेस्ट ने बदल दी महिलाओं की किस्मत, नवी मुंबई के इस प्रोजेक्ट से पर्यावण को भी हुआ लाभ
Explainer: इंसान की तरक्की और तेजी से विकसित हो रही तकनीकी ने पर्यावरण को काफी नुकसान पहुंचाया है. सड़कों पर दौड़ने वाली गाड़ियां हों या तन ढंकने के लिए इस्तेमाल होने वाले कपड़े हर वस्तु पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रही है. जिन कपड़ों को हम बेकार समझकर कचड़े के ढेर में फेंक देते हैं वे भी पर्यावरण को नुकसान पहुंचे में शामिल हैं. भारत में हर साल करीब 7.8 मिलियन मीट्रिक टन इस्तेमाल किए गए कपड़े फेंक दिए जाते हैं. हालांकि इन कपड़ों का दोबारा इस्तेमाल या रीसायकल किया जा सकता है. बावजूद इसके ज्यादातर कपड़े लैंडफिल में चले जाते हैं.
पुराने कपड़ों को लेकर मुंबई मेट्रोपॉलिटन रीजन ने अपनाया ये तरीका
पूरे मुंबई मेट्रोपॉलिटन रीजन (MMR) में साफ-सुथरे शहर के तौर पर पहचाने जाने वाले नवी मुंबई ने एक अलग तरीका अपनाया है. दरअसल, पुराने कपड़ों को कचरा मानने के बजाय, नवी मुंबई ने भारत की पहली म्युनिसिपल टेक्सटाइल रिकवरी फैसिलिटी बनाई है. यह फैसिलिटी सर्कुलर सिस्टम और कम्युनिटी की भागीदारी के जरिए बेकार कपड़ों को महिलाओं के लिए रोजगार, बिजनेस के लिए रॉ मटीरियल और लैंडफिल में जाने वाले कचरे को कम करने का जरिया बन गई है.
- पीआईबी की हाल ही में आई एक सरकारी जानकारी के मुताबिक, स्वच्छ भारत मिशन-अर्बन 2.0 के तहत, नवी मुंबई की टेक्सटाइल रिकवरी फैसिलिटी लैंडफिल में जाने वाले कचरे को कम कर रही है. जिससे रोजगार पैदा हो रहे हैं और शहरी भारत के लिए एक ऐसा मॉडल पेश किया जा रहा है जिसे बड़े पैमाने पर अपनाया जा सकता है.
- पीआईबी की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में हर साल 7.8 मिलियन मीट्रिक टन टेक्सटाइल वेस्ट (कपड़े का कचरा) निकलता है. यह रिपोर्ट बताती है कि साड़ियों और यूनिफॉर्म से लेकर डेनिम और घर के कपड़ों तक, टेक्सटाइल शहरी कचरे का एक अहम हिस्सा हैं, लेकिन अक्सर इन पर ध्यान नहीं दिया जाता.
कैसे कपड़े के ढेर को रोजगार में बदल रहा नवी मुंबई?
नवी मुंबई, नवी मुंबई म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन (NMMC) के जरिए बेलापुर में भारत की पहली म्युनिसिपल टेक्सटाइल रिकवरी फैसिलिटी शुरू करके एक मिसाल कायम कर रहा है. इसके तहत, इस सेंटर ने अलग-अलग जगहों से कचरा इकट्ठा करने, वैज्ञानिक तरीके से छंटाई करने, कचरे के स्रोत का पता लगाने और महिलाओं के लिए रोजगार के अवसर पैदा करने जैसी चीजो को एक साथ लाने पर काम किया है.
- इस मॉडल में एक ऐसा सिस्टम है जो डिसेंट्रलाइज्ड कलेक्शन (अलग-अलग जगहों से इकट्ठा करने) से शुरू होता है. TRF ने सभी 8 म्युनिसिपल वार्डों की हाउसिंग सोसायटियों में टेक्सटाइल बिन लगाए हैं. जिसके तहत अब तक 140 बिन लगाए जा चुके हैं और मौजूदा चरण में कम से कम 250 बिन लगाने का लक्ष्य है.
अलग-अलग कैटेगरी में बांटे जाते हैं बेकार कपड़े
इकट्ठा किए गए कपड़ों को तौला और टैग किया जाता है, और फिर उन्हें सिस्टमैटिक तरीके से अलग-अलग कैटेगरी में बांटा जाता है- जैसे दोबारा इस्तेमाल होने वाले, रीसाइकिल होने वाले, अपसाइकिल होने वाले, डाउनसाइकिल होने वाले और बेकार (रिजेक्ट) कपड़े. कोशा नाम के हैंडहेल्ड फाइबर-आइडेंटिफिकेशन स्कैनर की मदद से फाइबर की पहचान की जाती है, जिसमें कॉटन, पॉलीकॉटन, पॉलिएस्टर, ऊन और सिल्क शामिल हैं.
- कपड़ों की पहचान के बाद इन कपड़ों को एक और बार अलग-अलग किया जाता है; यह छंटाई आगे की प्रोसेसिंग के लिए कपड़े के प्रकार, रंग और हालत के आधार पर की जाती है. इसके बाद, दोबारा इस्तेमाल में लाने से पहले साफ-सफाई और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए मटीरियल को सैनिटाइज किया जाता है.
- इस प्रक्रिया में कपड़ों को बैग, चटाई, एक्सेसरीज, परिधान और घरेलू सजावट की वस्तुओं में रूपांतरित किया जाता है, जिन्हें स्वयं सहायता समूहों की कुशल महिलाओं द्वारा हस्तनिर्मित किया जाता है. इन वस्तुओं को प्रदर्शनियों में भी प्रदर्शित किया जाता है. इसके अलावा दानदाताओं के बीच पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए, दान से लेकर अंतिम उत्पाद तक सामग्री की संपूर्ण ट्रेसबिलिटी प्रदान करने के लिए एक डिजिटल ट्रैकिंग सिस्टम वर्तमान में विकसित किया जा रहा है.
ट्रेनिंग के बाद 15 हजार रुपये महीना तक कमा रहीं महिलाएं
- बता दें कि इस पहल के तहत, 300 से ज्यादा महिलाओं को आठ दिनों तक ट्रेनिंग दी गई. इस ट्रेनिंग में फाइबर की पहचान, चीजो को अलग-अलग करने के नियम, मरम्मत के तरीके और अपसाइकलिंग (पुरानी चीजों से नई चीजें बनाना) जैसे विषय शामिल थे.
- इसी रिपोर्ट के अनुसार, अभी 150 से ज्यादा महिलाएं टेक्सटाइल की छंटाई, सिलाई और प्रोडक्ट को नया रूप देकर हर महीने 9,000 से 15,000 रुपये तक कमा रही हैं.
- यह सुविधा एक खास अपसाइकलिंग सेंटर के तौर पर काम करने के साथ-साथ, सेल्फ-हेल्प ग्रुप (SHG) के सदस्यों के लिए भी एक बेस का काम करती है, जहां वे बेकार हो चुके कपड़ों से बैग, कपड़े, पाउच और घर की सजावट का सामान बनाते हैं.
क्या हुआ इस पहल का असर?
इस मॉडल के जरिए सामाजिक असर के अलावा, इस्तेमाल के बाद बेकार हुए 30 मीट्रिक टन टेक्सटाइल वेस्ट (कपड़े का कचरा) को इकट्ठा किया गया है. इसमें से 25.5 मीट्रिक टन कचरे को वैज्ञानिक तरीके से छांटा गया है, और रोजाना औसतन लगभग 500 आइटम के हिसाब से कुल 41,000 से ज्यादा आइटम प्रोसेस किए गए हैं.
टीआरएफ 1,14,575 से अधिक परिवारों तक पहुंचा और और 75 से ज्यादा IEC वर्कशॉप आयोजित किए. नवी बई के वार्डों में 350 से ज्यादा सोसायटियों को भी इस प्रोजेक्ट में शामिल किया गया है, जिससे लोगों का सक्रिय सहयोग मिल सके. इसके साथ ही 400 से ज्यादा अपसाइकल किए गए प्रोडक्ट के सैंपल तैयार किए गए हैं, और इस सेंटर ने बेकार टेक्सटाइल वेस्ट से पेपर का एक पायलट बैच भी सफलतापूर्वक बनाया है.
इस प्रोसेस के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए, टेक्सटाइल रिकवरी फैसिलिटी ने 30 से ज्यादा प्रदर्शनियों और पब्लिक इवेंट्स में भी भाग लिया. रिपोर्ट में बताया गया है कि टीआरएफ इस दौरान कई चुनौतियों का भी सामना करना पड़ा. इसमें लोगों द्वारा बिन लगाने का विरोध करना और टेक्सटाइल को अलग-अलग करने के बारे में कम जानकारी होना तक शामिल था. लेकिन ट्रेनिंग और टेक्नोलॉजी की मदद से यह सेंटर अपना काम जारी रखने में कामयाब रहा है.
एफएसएसएआई ने भ्रामक दावों और लेबलिंग नियमों के उल्लंघन को लेकर लोटे इंडिया, कुबेरा फूड्स और एफएनपी को जारी किया नोटिस
नई दिल्ली, 8 जुलाई (आईएएनएस)। भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) ने बुधवार को कहा कि उसने विभिन्न खाद्य उत्पादों पर कथित भ्रामक दावों और लेबलिंग नियमों के उल्लंघन को लेकर लोटे इंडिया कॉर्पोरेशन प्राइवेट लिमिटेड, कुबेरा फूड्स और फर्न्स एन पेटल्स प्राइवेट लिमिटेड (एफएनपी) को नोटिस जारी किए हैं।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर जारी पोस्ट में एफएसएसएआई ने कहा कि तीनों कंपनियों को सात दिनों के भीतर यह स्पष्टीकरण प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है कि उनके खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की जानी चाहिए।
एफएसएसएआई के अनुसार, लोटे इंडिया कॉर्पोरेशन ने बिना पूर्व अनुमति के कंपनी के पुराने नाम वाले पहले से छपे लेबल का इस्तेमाल किया। इसके अलावा, कंपनी के कुछ चोको पाई उत्पादों पर किया गया 100 प्रतिशत शाकाहारी दावा भी भ्रामक पाया गया।
नियामक ने यह भी कहा कि कंपनी के पेपेरो क्रंची बिस्किट स्टिक्स कार्टन और पेपेरो ओरिजिनल बिस्किट स्टिक्स पर पोषण संबंधी जानकारी निर्धारित प्रारूप में नहीं दी गई थी। वहीं, लॉली ब्लिस लॉलीपॉप में विटामिन की मात्रा एफएसएस (विज्ञापन और दावे) विनियमों के निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं पाई गई।
इसके अलावा, एफएसएसएआई ने पाया कि कंपनी के फ्रूट्ज एक्लेयर्स उत्पाद के नाम से यह भ्रम पैदा हो सकता है कि उसमें फल मौजूद हैं, जबकि उत्पाद में फल नहीं होते हैं। साथ ही, नियमों के तहत पैक के सामने अनिवार्य डिस्क्लेमर भी नहीं दिया गया था।
वहीं, कुबेरा फूड्स को उसके सॉफ्ट एंड फ्रेश क्रीम बन पाइनएप्पल उत्पाद पर कथित भ्रामक दावों के लिए नोटिस जारी किया गया है।
एफएसएसएआई के अनुसार, इस उत्पाद के पैक पर 100 प्रतिशत नेचुरल और नो प्रिजर्वेटिव्स, कलर्स एंड फ्लेवर्स जैसे दावे किए गए थे, जबकि लेबल पर प्रिजर्वेटिव (आईएनएस 282), सिंथेटिक फूड कलर (आईएनएस 110) और अतिरिक्त फ्लेवरिंग पदार्थों का उल्लेख किया गया है।
नियामक ने कहा कि शुद्ध, ताजा और प्राकृतिक जैसे शब्दों का उपयोग एफएसएस (विज्ञापन और दावे) विनियमों के प्रावधानों का उल्लंघन करता है।
इसके अलावा, फर्न्स एन पेटल्स (एफएनपी) को उसके रोस्टेड आलमंड चॉकलेट उत्पाद पर कथित भ्रामक दावों और लेबलिंग में खामियों को लेकर नोटिस भेजा गया है।
एफएसएसएआई ने कहा कि इस उत्पाद को प्रीमियम चॉकलेट के रूप में प्रचारित किया गया, जबकि इसमें हाइड्रोजेनेटेड वेजिटेबल फैट मौजूद है और ऐसे उत्पादों के लिए आवश्यक अनिवार्य घोषणा लेबल पर नहीं की गई।
नियामक ने यह भी पाया कि उत्पाद के पोषण संबंधी विवरण में अनुशंसित आहार भत्ता (आरडीए) की जानकारी नहीं दी गई थी। इसके अलावा, पैकेजिंग पर बादाम को प्रमुखता से दिखाने के बावजूद सामग्री सूची में बादाम की वास्तविक प्रतिशत मात्रा का उल्लेख भी नहीं किया गया।
एफएसएसएआई ने तीनों कंपनियों को सात दिनों के भीतर अपना जवाब देने का निर्देश दिया है। नियामक ने कहा कि संतोषजनक जवाब नहीं मिलने पर खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम, 2006 के प्रावधानों के तहत कार्रवाई की जा सकती है।
--आईएएनएस
डीबीपी
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