'मैं 9 बच्चों की मां हूं', 32 की उम्र में बिना शादी के Mother बनीं सिंगर, प्यार में मिले धोखे के बाद बदल गई लाइफ
Sunanda Sharma Tell How She Became Mother: पंजाबी सिंगर और एक्ट्रेस सुनंदा शर्मा (Sunanda Sharma) इन दिनों अपनी पर्सनल लाइफ को लेकर सुर्खियों में हैं. म्यूजिक की दुनिया में 'जानी तेरा ना', 'दूजी वार प्यार' और 'बिल्ली अक्ख' जैसे हिट गानों से पहचानी जाने वाली सुनंदा ने हाल ही में ऐसा खुलासा किया, जिसने हर किसी को इमोशनल कर दिया. 32 साल की सुनंदा ने अभी तक शादी नहीं की है, लेकिन वह खुद को 9 बच्चों मां बन गई हैं. उन्होंने अपनी लाइफ, प्यार में मिले धोखे, आध्यात्म और बच्चों को अपनाने के फैसले पर खुलकर बात की. आइए इस बारे में विस्तार से जानते हैं-
प्यार में मिला धोखा
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सुनंदा शर्मा एक समय पंजाबी म्यूजिक प्रोड्यूसर पुष्पिंदर धालीवाल संग रिलेशन में थीं. लेकिन किन्हीं वजहों से यह रिश्ता ज्यादा लंबे समय तक नहीं टिक पाया. सिंगर मुताबिक, उन्हें इस रिश्ते में धोखा मिला. इतना ही नहीं, उनके पैसे भी हड़प लिए गए और उन्हें घर से बाहर तक निकाल दिया गया. उस समय इसको काफी विवाद भी हुआ था. हालांकि, इस मुश्किल दौर ने उन्हें तोड़ा नहीं. उन्होंने न्यूजबुकसे बातचीत में बताया कि ब्रेकअप के बाद उनकी लाइफ में आध्यात्म ने बड़ा रोल निभाया. उनका कहना है कि ऊपर वाले की कृपा से आज उनके पास अपना घर है, नाम है, पैसा है और लाइफ में किसी चीज की कमी नहीं है.
'मैं 9 बच्चों की मां हूं'
बातचीत के दौरान जब बच्चों का जिक्र आया तो सुनंदा शर्मा इमोशनल हो गईं. इंटरव्यू में उन्होंने बताया कि वह 9 बच्चों की मां हैं. इसमें दो तो उनके भाई के बच्चे हैं. बाकी स्कूल में पढ़ रहे हैं. जबकि कुछ बच्चियां कॉलेज जाती हैं. इतना ही नहीं एक लड़का यूनिवर्सिटी में पढ़ता है और दो छोटे बच्चे हैं. उन्होंने बताया कि ब्रेकअप के बाद भले ही उन्होंने अपने दिल के दरवाजे बंद कर दिए, लेकिन ममता कभी खत्म नहीं होने दी. उन्होंने ऐसे बच्चों को अपनाना शुरू किया जिनका कोई सहारा नहीं था. सुनंदा ने यह भी बताया कि पिछले साल उन्होंने एक ऐसे बच्चे को अपनाया, जिसकी मां की मौत हो चुकी थी और पिता ने दूसरी शादी के लिए उसे छोड़ दिया था.
अभी और बच्चों को अपनाने की इच्छा
सुनंदा शर्मा ने कहा कि हर इंसान की तरह उनका भी ड्रीम था कि वह शादी करें, लेकिन लाइफ ने उनके लिए दूसरा रास्ता चुना. उन्होंने कहा, 'मैंने जो-जो लाइफ में मांगा, मुझे वो सब मिला है. मैं 32 साल की हूं. मुझे मदरहुड की फीलिंग को एक्सपीरियंस करना था कि मां कैसी होती है. मुझे ऊपर वाले ने वो भी दिया, चाहे जरिया कोई भी हो.' उन्होंने आगे कहा कि अभी भी उनकी इच्छा है कि वह एक-दो नहीं, बल्कि और बच्चों को भी गोद ले सकें. उनका कहना है कि वह शुरू से ही ऐसे बच्चों की तलाश करती हैं, जिनका कोई अपना नहीं होता. पिछले दो सालों में उनकी लाइफ पूरी तरह बदल गई है और अब उन्हें शादी से ज्यादा अपने बच्चों और फैमिली की देखभाल करना अच्छा लगता है.
सिंगिंग से एक्टिंग तक बनाया अलग मुकाम
आपको बता दें कि 30 जनवरी 1992 को जन्मीं सुनंदा शर्मा ने पंजाबी म्यूजिक इंडस्ट्री में 'बिल्ली अक्ख' से पहचान बनाई थी. इसके बाद उन्हें 'जानी तेरा ना' और 'दूजी वार प्यार' जैसे कई हिट गानों से बड़ी पहचान मिली. उन्होंने एक्टिंग की शुरुआत दिलजीत दोसांझ और योगराज सिंह के साथ फिल्म 'सज्जन सिंह रंगरूट' से की. बाद में उन्होंने बॉलीवुड में 'तेरे नाल नचना' गाने में भी नजर आईं. साल 2025 में उन्होंने करण औजला के साथ 'Boyfriend' गाना भी किया. आज सुनंदा शर्मा अपनी सिंगिंग के साथ-साथ अपनी पर्सनल लाइफ और गोद लिए बच्चों के लिए भी सुर्खियों में रहती हैं. उनका कहना है कि अब उनकी सबसे बड़ी खुशी उनके बच्चे हैं और वही उनकी लाइफ की असली ताकत बन चुके हैं.
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Explainer: मौत के बाद कितने दिनों तक सुरक्षित रह सकती है इंसान की डेडबॉडी? जानिए कौन-सी तकनीक महीनों और कौन सी दशकों तक कारगर
हाल ही में ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार को लेकर सोशल मीडिया और विभिन्न मीडिया रिपोर्टों में चर्चा तेज हुई. इन रिपोर्टों में दावा किया गया कि उनका अंतिम संस्कार काफी समय बाद किया जाएगा. ऐसे दावों के बीच लोगों के मन में एक सवाल बार-बार उठने लगा कि आखिर किसी व्यक्ति के शव को कितने दिनों तक सुरक्षित रखा जा सकता है? क्या कोई डेडबॉडी महीनों या वर्षों तक बिना खराब हुए संरक्षित रह सकती है?
दरअसल, आधुनिक विज्ञान और चिकित्सा ने ऐसी कई तकनीकें विकसित की हैं, जिनकी मदद से शव के प्राकृतिक रूप से सड़ने-गलने की प्रक्रिया को काफी हद तक धीमा किया जा सकता है. हालांकि, यह समझना जरूरी है कि शव को "जीवित" नहीं रखा जाता, बल्कि केवल उसके विघटन (Decomposition) की गति को कम किया जाता है.
मौत के बाद शरीर में क्या होता है?
किसी व्यक्ति की मृत्यु के तुरंत बाद शरीर में कई जैविक परिवर्तन शुरू हो जाते हैं. सबसे पहले रक्त संचार और ऑक्सीजन की आपूर्ति बंद हो जाती है. इसके बाद शरीर की कोशिकाएं धीरे-धीरे नष्ट होने लगती हैं. लगभग दो से चार घंटे के भीतर शरीर में अकड़न (Rigor Mortis) शुरू हो सकती है. अगले 24 घंटे के दौरान शरीर में पहले से मौजूद बैक्टीरिया ऊतकों को तोड़ना शुरू कर देते हैं और यहीं से सड़ने की प्रक्रिया तेज होने लगती है.
गर्मी, नमी और वातावरण में मौजूद सूक्ष्मजीव इस प्रक्रिया को और तेज कर देते हैं. इसलिए यदि शव को सुरक्षित रखना हो तो जल्द से जल्द वैज्ञानिक संरक्षण प्रक्रिया अपनाई जाती है.
बिना किसी विशेष व्यवस्था के शव कितनी देर सुरक्षित रहता है?
यदि किसी शव को सामान्य कमरे के तापमान पर रखा जाए तो उसकी स्थिति मौसम पर निर्भर करती है...
- गर्मियों में आमतौर पर 4 से 6 घंटे के भीतर शरीर में स्पष्ट परिवर्तन दिखाई देने लगते हैं.
- सामान्य मौसम में लगभग 6 से 10 घंटे तक शव अपेक्षाकृत सुरक्षित रह सकता है.
- सर्दियों में कम तापमान होने के कारण यह अवधि 12 से 15 घंटे तक बढ़ सकती है.
इसी वजह से अंतिम संस्कार में देरी होने पर शव को ठंडा रखने या अन्य संरक्षण तकनीकों का सहारा लिया जाता है.
क्या केवल बर्फ से शव सुरक्षित रह सकता है?
भारत में कई बार अंतिम दर्शन के लिए शव के आसपास बर्फ रखी जाती है. यह तरीका शरीर का तापमान कम करके विघटन की गति को धीमा करता है.
हालांकि, केवल बर्फ स्थायी समाधान नहीं है. इससे सामान्यतः एक से दो दिन तक ही शव को अपेक्षाकृत सुरक्षित रखा जा सकता है. जैसे-जैसे बर्फ पिघलती है और तापमान बढ़ता है, बैक्टीरिया फिर सक्रिय होने लगते हैं. यही कारण है कि लंबे समय तक संरक्षण के लिए केवल बर्फ पर निर्भर नहीं रहा जाता.
प्राकृतिक बर्फ कैसे वर्षों तक शरीर बचा सकती है?
यदि कोई शव प्राकृतिक रूप से अत्यधिक ठंडे स्थान, जैसे ग्लेशियर या बर्फीले पर्वतों में दबा रह जाए, तो स्थिति अलग होती है.
बहुत कम तापमान पर बैक्टीरिया और अन्य सूक्ष्मजीव लगभग निष्क्रिय हो जाते हैं. इससे शरीर की कोशिकाओं का विघटन बेहद धीमा हो जाता है.
भारत में भी ऐसे उदाहरण सामने आए हैं, जहां बर्फ में दबे लोगों के शव कई दशकों बाद लगभग सुरक्षित अवस्था में मिले. यह दर्शाता है कि प्राकृतिक ठंड शरीर के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है.
कोल्ड स्टोरेज: सबसे सामान्य और प्रभावी तरीका
आज अधिकांश अस्पतालों और मॉर्च्युरी में शवों को कोल्ड स्टोरेज में रखा जाता है. आमतौर पर इन्हें 2 से 4 डिग्री सेल्सियस तापमान पर रखा जाता है. इस तापमान पर बैक्टीरिया की गतिविधि काफी धीमी हो जाती है और शव कुछ दिनों तक सुरक्षित रह सकता है.
यदि शव को एक स्थान से दूसरे स्थान ले जाना हो या अंतिम संस्कार में कुछ दिन का समय हो, तो विशेष आइस पैक और कूलिंग सिस्टम का भी उपयोग किया जाता है. यह तरीका अल्पकालिक संरक्षण के लिए सबसे अधिक इस्तेमाल किया जाता है.
एम्बामिंग क्या होती है?
यदि शव को कई सप्ताह या महीनों तक सुरक्षित रखना हो तो एम्बामिंग (Embalming) की प्रक्रिया अपनाई जाती है. इस तकनीक में शरीर से रक्त निकालकर उसकी जगह विशेष रासायनिक घोल भरा जाता है. इस घोल में प्रायः फॉर्मेल्डिहाइड आधारित रसायन होते हैं, जो बैक्टीरिया की वृद्धि रोकते हैं और ऊतकों को लंबे समय तक सुरक्षित बनाए रखते हैं.
एम्बामिंग के दौरान शरीर की सफाई, रसायनों का संचार और बाहरी संरक्षण किया जाता है. पूरी प्रक्रिया में लगभग दो से चार घंटे लग सकते हैं.
एम्बामिंग के बाद शव कितने समय तक सुरक्षित रहता है?
यदि एम्बामिंग वैज्ञानिक तरीके से की जाए और उसके बाद शव को नियंत्रित तापमान में रखा जाए, तो वह कई सप्ताह से लेकर कई महीनों तक सुरक्षित रह सकता है. मेडिकल कॉलेजों में अध्ययन और शोध के लिए उपयोग किए जाने वाले देहदान किए गए शवों को भी इसी तकनीक से संरक्षित किया जाता है.
ठंडे और सूखे वातावरण में एम्बामिंग के बाद शव लगभग दो से छह महीने तक अच्छी स्थिति में रह सकता है. यदि इसके साथ कोल्ड स्टोरेज की सुविधा भी हो तो संरक्षण अवधि और बढ़ सकती है.
क्रायोप्रिजर्वेशन: सबसे उन्नत तकनीक
लंबे समय तक संरक्षण की बात करें तो क्रायोप्रिजर्वेशन (Cryopreservation) सबसे आधुनिक तकनीकों में से एक मानी जाती है. इसमें पूरे शरीर या किसी अंग को -130 डिग्री सेल्सियस या उससे भी कम तापमान पर रखा जाता है. इसके लिए सामान्यतः लिक्विड नाइट्रोजन का उपयोग किया जाता है. इतने कम तापमान पर लगभग सभी जैविक प्रक्रियाएं रुक जाती हैं और बैक्टीरिया भी सक्रिय नहीं रह पाते.
हालांकि, यह तकनीक बेहद महंगी है और दुनिया के कुछ ही देशों में सीमित स्तर पर उपलब्ध है. इसके जरिए शरीर को बहुत लंबे समय तक संरक्षित रखा जा सकता है, लेकिन अब तक ऐसा कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है कि भविष्य में ऐसे संरक्षित शवों को दोबारा जीवित किया जा सके.
क्या शव हमेशा के लिए सुरक्षित रखा जा सकता है?
वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो किसी भी संरक्षण तकनीक का उद्देश्य शव को हमेशा के लिए सुरक्षित रखना नहीं, बल्कि उसके विघटन को अधिकतम सीमा तक धीमा करना होता है.
यदि तापमान, आर्द्रता और रखरखाव पूरी तरह नियंत्रित रहे तो संरक्षण अवधि काफी लंबी हो सकती है. लेकिन प्राकृतिक परिस्थितियों में अंततः जैविक परिवर्तन होते ही हैं.
मृत्यु के बाद शरीर का विघटन एक स्वाभाविक जैविक प्रक्रिया है, जिसे पूरी तरह रोका नहीं जा सकता. हालांकि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने ऐसी तकनीकें विकसित कर ली हैं, जिनकी मदद से इस प्रक्रिया को कुछ घंटों से लेकर कई महीनों और विशेष परिस्थितियों में दशकों तक धीमा किया जा सकता है.
सामान्य परिस्थितियों में बर्फ और कोल्ड स्टोरेज अल्पकालिक संरक्षण के लिए उपयोगी हैं, जबकि एम्बामिंग लंबे समय तक शव को सुरक्षित रखने का सबसे प्रचलित तरीका है. वहीं क्रायोप्रिजर्वेशन अत्यंत कम तापमान पर संरक्षण की उन्नत तकनीक है, जिसका उपयोग सीमित परिस्थितियों में किया जाता है. इन सभी तरीकों का उद्देश्य केवल शरीर को संरक्षित रखना है, न कि जीवन को वापस लाना.
FAQ: डेडबॉडी को सुरक्षित रखने से जुड़े 4 अहम सवाल
Q1. मौत के बाद इंसान का शरीर कितनी देर में सड़ना शुरू हो जाता है?
शरीर में विघटन की प्रक्रिया मृत्यु के कुछ घंटों बाद ही शुरू हो जाती है. आमतौर पर 2 से 4 घंटे में शरीर में अकड़न (Rigor Mortis) आने लगती है, जबकि 24 घंटे के भीतर बैक्टीरिया ऊतकों को नुकसान पहुंचाना शुरू कर देते हैं. गर्म मौसम में यह प्रक्रिया और तेज हो सकती है.
Q2. क्या केवल बर्फ के सहारे शव को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है?
नहीं. बर्फ शरीर का तापमान कम करके सड़ने की गति को धीमा जरूर करती है, लेकिन यह स्थायी समाधान नहीं है. सामान्य परिस्थितियों में बर्फ के सहारे शव को लगभग 24 से 48 घंटे तक ही अपेक्षाकृत सुरक्षित रखा जा सकता है.
Q3. एम्बामिंग (Embalming) क्या होती है और इससे शव कितने समय तक सुरक्षित रहता है?
एम्बामिंग एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है, जिसमें शरीर से रक्त निकालकर उसकी जगह विशेष रासायनिक घोल डाला जाता है. इससे बैक्टीरिया की वृद्धि रुक जाती है और शव कई सप्ताह से लेकर 2–6 महीने तक सुरक्षित रखा जा सकता है. मेडिकल कॉलेजों में अध्ययन के लिए भी इसी तकनीक का उपयोग किया जाता है.
Q4. क्या क्रायोप्रिजर्वेशन से शव को दोबारा जीवित किया जा सकता है?
नहीं. वर्तमान वैज्ञानिक जानकारी के अनुसार, क्रायोप्रिजर्वेशन केवल शरीर को अत्यधिक कम तापमान पर संरक्षित रखने की तकनीक है. अब तक ऐसा कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है कि इस तकनीक से संरक्षित किसी शव को भविष्य में दोबारा जीवित किया जा सका हो.
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