Explainer: जंग के बीच ईंधन का संकट, जानें कैसे भारत के भविष्य का ईंधन बन सकता है इथेनॉल?
Explainer: अमेरिका और ईरान के बीच फरवरी में शुरु हुई जंग ने पूरे मिडिल ईस्ट को अशांत कर दिया. जिसका असर अमेरिका और ईरान पर ही देखने को नहीं मिला, बल्कि पूरी दुनिया ने इसका खामियाजा उठाया है. क्योंकि जंग के चलते होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से दुनियाभर में ईंधन की किल्लत शुरू हो गई. कच्चे तेल के बढ़ते दामों ने का असर भारत में भी देखा गया. उसके बाद जून में देश की तेल विपरण कंपनियों को पेट्रोल-डीजल की कीमतों में मामूली उछाल करना पड़ा.
क्रूड की बढ़ती कीमतों और तेल की कम निकासी के चलते एक्सपोर्ट और इम्पोर्ट जैसे क्षेत्रों में भारी नुकसान हुआ है. इसके अलावा, कई देशों में बढ़ती महंगाई से आम जनता परेशान है. भारत ने ईंधन के रूप में इथेनॉल का विकल्प तलाश लिया है, हालांकि इसे पूरी तरह से लागू करने में अभी काफी समय लगेगा. ऐसे में एक रिपोर्ट सामने आई है जिसमें बताया गया है कि कैसे इथेनॉल का इस्तेमाल भारत की ऊर्जा व्यवस्था का एक अहम आधार बन सकता है. चलिए जानते हैं रिपोर्ट में क्या कुछ कहा गया.
तनाव का देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ा सीधा असर
हम अपनी ऊर्जा जरूरतों का एक हिस्सा दूसरे देशों से आने वाले कच्चे तेल से पूरा करते हैं. इसलिए, अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में बढ़ोतरी या राजनीतिक तनाव का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है. ग्लोबल कंसल्टिंग फर्म KPMG की एक रिपोर्ट के अनुसार, भविष्य में इथेनॉल भारत के ट्रांसपोर्ट एनर्जी सेक्टर की मजबूत रीढ़ बनकर उभर सकता है.
भारत में 20 प्रतिशत इथेनॉल मिलाने के लक्ष्य
फिलहाल भारत ने पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल मिलाने का लक्ष्य हासिल कर लिया है. इसलिए, देश को E85 और E100 जैसे ज्यादा इथेनॉल वाले ईंधन की ओर बढ़ने की राह आसान हो गई है. 'बियॉन्ड E20' (Beyond E20) नाम की रिपोर्ट में कहा गया है कि इथेनॉल को सिर्फ एक मिश्रित ईंधन के तौर पर नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा के लिए एक अहम साधन के तौर पर देखा जाना चाहिए.
कम होगी तेल आयात पर निर्भरता
अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए दूसरे देशों पर निर्भर होने की वजह से अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में उछाल या कुछ देशों के बीच राजनीतिक तनाव का सीधा असर भारत की भी अर्थव्यवस्था पर दिखाई देता है. केपीएमजी की रिपोर्ट के मुताबिक, इथेनॉल के ज्यादा इस्तेमाल से आयातित तेल पर निर्भरता कम होगी.
इससे विदेशी मुद्रा की बचत होगी और ग्लोबल ऑयल मार्केट में उतार-चढ़ाव का असर कम होगा. रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया में तनाव जैसी स्थितियों ने वैकल्पिक ईंधन की जरूरत को और बढ़ा दिया है.
इथेनॉल इकोसिस्टम को मजबूत करना
बता दें कि पिछले कुछ सालों में भारत ने इथेनॉल के प्रोडक्शन और डिस्ट्रीब्यूशन के क्षेत्र में काफी तरक्की की है. सरकार के इथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम के तहत प्रोडक्शन क्षमता और सप्लाई नेटवर्क का विस्तार किया है. बतादें कि कुछ दिन पहले ही केंद्र ने 22 प्रतिशत से 30 प्रतिशत तक इथेनॉल ब्लेंड वाले पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी में छूट देने की रणनीति बनाई. इस कदम से ज्यादा इथेनॉल ब्लेंड वाले ईंधन को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है.
गन्ना और दूसरी कृषि फसलों के अलावा दूसरे स्रोंतों की जरूरत
हालांकि इसमें कई बड़ी चुनौतियां भी हैं. KPMG की एक रिपोर्ट के अनुसार, E20 से आगे बढ़ने के लिए कई चुनौतियों से पार पाना होगा. वर्तमान में इथेनॉल का उत्पादन गन्ना और दूसरी कृषि उपजों से किया जाता है. ऐसे में हमें इसका उत्पादन बढ़ाने के लिए नए स्रोतों की जरूरत होगी. इसके अलावा, फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों की संख्या बढ़ानी होगी और ज्यादा इथेनॉल वाले मिश्रण के इस्तेमाल के लिए फ्यूल डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क में भी बदलाव करने होंगे.
ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भरता की ओर एक कदम
KPMG की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अगर भारत बड़े पैमाने पर इथेनॉल-आधारित ईंधन प्रणाली को अपनाने में सफल हो जाता है, तो यह देश की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने और साथ ही तेल आयात पर निर्भरता कम करने में अहम भूमिका निभा सकता है. इससे भारत वैश्विक तेल बाजार में होने वाले उतार-चढ़ाव का बेहतर ढंग से सामना कर सकेगा और ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठा सकेगा.
भारत के ट्रांसपोर्ट सेक्टर का अहम हिस्सा बन सकता है इथेनॉल
ऐसे में इथेनॉल भारत के ट्रांसपोर्ट एनर्जी सेक्टर का एक अहम आधार बन सकता है. E20 से आगे बढ़कर E85 और E100 जैसे ब्लेंड्स को अपनाने से तेल आयात पर निर्भरता कम हो जाएगी. इसके साथ ही एनर्जी सिक्योरिटी मजबूत होगी और ग्लोबल ऑयल मार्केट में आने वाले उतार-चढ़ाव का असर भी कम होगा. ऐसे में भारत अपनी ऊर्जा जरूरत के लिए ईरान या दूसरे खाड़ी देशों पर निर्भर नहीं रहेगा और अपनी जरूरत की ऊर्जा को इथेनॉल के जरिए खुद ही पैदा कर सकेगा.
अभी ये हैं इथेनॉल को लेकर मुश्किलें
हालांकि भारत में पूरी तरह से इथेनॉल के इस्तेमाल को लेकर कुछ चिंताएं भी सामने आ रही हैं. इसमें वाहन और इंजन की अनुकूलता सबसे बड़ी मुश्किल है. क्योंकि वर्तमान में भारत की सड़कों पर दौड़ने वाली अधिकांश सामान्य पेट्रोल गाड़ियां सिर्फ पेट्रोल या E20 के लिए ही डिजाइन की गई हैं. इनमें E100 यानी सौ प्रतिशत इथेनॉल का उपयोग करने से फ्यूल पंप के फेल होने का खतरा रहता है. इसके साथ ही पाइपलाइनों में जंग लगना और इंजन खराब होने का भी खतरा बना हुआ है.
फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों की जरूरत
इसके साथ ही शुद्ध इथेनॉल या E85 से E100 तक के उच्च मिश्रण वाले ईंधन का उपयोग करने के लिए विशेष रूप से डिजाइन किए गए फ्लेक्स-फ्यूल इंजन और संक्षारण-प्रतिरोधी ईंधन प्रणालियों की जरूरत होगी.
कम माइलेज की परेशानी
इसके साथ ही इथेनॉल में पेट्रोल की तुलना में लगभग 30 प्रतिशत से 40 फीसदी तक कम ऊर्जा-घनत्व होता है. वहीं समान दूरी तय करने के लिए गाड़ी को अधिक मात्रा में इथेनॉल ईंधन की जरूरत होती है. जो वाहन की माइलेज को कम कर कर देती है. इसके अलावा इथेनॉल को लेकर एक और परेशानी है. दरअसल, इथेनॉल की प्रकृति हाइड्रोफिलिक होती है, अर्थात यह हवा से बहुत जल्दी नमी (पानी) सोख लेता है. उच्च आर्द्रता वाले क्षेत्रों में, यह ईंधन में पानी के अंश बढ़ा देता है, जिससे दहन प्रक्रिया प्रभावित होती है और इंजन के पुर्जों में जंग लगने का खतरा बढ़ जाता है.
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