Explainer: पुरी का जगन्नाथ मंदिर 'श्रीमंदिर' क्यों कहलाता है? रथयात्रा के दौरान लक्ष्मी ठाकुरानी तोड़ देती है रथ! जानें हेरा पंचमी की दिलचस्प कहानी
Jagannath Rath Yatra 2026: जगन्नाथ मंदिर पुरी में स्थित है. आप इस मंदिर को जगन्नाथ मंदिर के नाम से जानते होंगे लेकिन क्या आपको पता है मंदिर का असली नाम ये नहीं है? जी हां, श्री जगन्नाथ मंदिर का असली नाम श्रीमंदिर है. श्रीमंदिर यानी माता लक्ष्मी का मंदिर. दरअसल, जगन्नाथ भगवान विष्णु भगवान के अवतार हैं. इसलिए, माता लक्ष्मी उनकी पत्नी हुई. ये उनका ससुराल है यानी कि अपना घर. इस वजह से यह महल माता लक्ष्मी का हुआ. पौराणिक कथाओं के अनुसार, जगन्नाथ जी के मंदिर में माता लक्ष्मी नहीं बल्कि माता लक्ष्मी के महल में जगन्नाथ भगवान, बलभद्र और सुभद्रा देवी निवास करते हैं. जगन्नाथ मंदिर में मिलने वाला भोग भी महाप्रसाद इसलिए कहलाता है क्योंकि उसे स्वयं माता लक्ष्मी पकाती हैं. इसलिए, एकादशी में भी यहां के भात को खाया जाता है.
हर साल जगन्नाथ मंदिर में रथयात्रा का आयोजन होता है. यह विशाल यात्रा विश्वभर में सुप्रसिद्ध है. रथयात्रा आषाढ़ के महीने में होती है. इस साल रथयात्रा 16 जुलाई को है. बाहुदा यात्रा 24 जुलाई को है. क्या आप जानते हैं रथयात्रा के दौरान माता लक्ष्मी जगन्नाथ भगवान से नाराज हो जाती हैं. इतना ही नहीं क्रोधित लक्ष्मी ठाकुरानी जगन्नाथ जी के रथ को भी तोड़ देती है. आइए जानते हैं इस कथा के बारे में.
जगन्नाथ रथयात्रा क्या होती है?
भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा एक वार्षिक उत्सव होता है. यह पूर्वी राज्य ओडिशा का पर्व है, जो बड़े धूमधाम से मनाया जाता है. आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीय तिथि को निकलने वाली इस यात्रा में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा देवी और सुदर्शन चक्र, बड़े विशाल रथों में सवार होते हैं. नगर में यात्रा करने के बाद वह सीधे गुंडिचा मंदिर पर रुकते हैं. गुंडिचा मंदिर भगवान जगन्नाथ का मौसी घर होता है.
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हेरा पंचमी क्या होता है?
हेरा पंचमी रथयात्रा के दौरान होने वाला एक आनंदमय उत्सव होता है. यह यात्रा के पांचवे दिन मनाई जाने वाली एक खास रस्म होती है. इसमें माता लक्ष्मी नाराज हो जाती है. दरअसल, रथयात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ दोनों भाई-बहनों और सुदर्शन चक्र के साथ यात्रा के लिए रवाना हो जाते हैं लेकिन लक्ष्मी ठाकुरानी महल में अकेले छूट जाती है. इसके बाद माता गुस्से में गुंडिचा मंदिर रवाना होती है, वहां भगवान जगन्नाथ के रथ को तोड़ देती है.
क्या है रथ तोड़ने की कथा?
दरअसल, रथयात्रा पर जाते हुए नटखट भगवान जगन्नाथ माता लक्ष्मी को कहकर जाते हैं कि प्रिये मैं जल्द ही वापस आउंगा. मगर पूरे पांच दिन हो जाते हैं और भगवान जगन्नाथ श्रीमंदिर वापस नहीं आते हैं. वह देखती हैं कि प्रभु और बाकी लोग भी महल नहीं लौट रहे हैं. इसके बाद जैसे ही उन्हें खबर मिलती है कि वह भ्रमण करने अकेले ही अपनी मौसी के घर चले गए हैं तो पंचमी की रात में क्रोधित होकर अपने रथ पर संवार होती है. अपने सेवादारों के साथ वह सीधे गुंडिचा मंदिर के लिए प्रस्थान करती हैं. वहां भी जगन्नाथ प्रभु बाहर नहीं आते तो मां लक्ष्मी गुस्से में उनके रथ पर प्रहार कर देती है. इससे नंदीघोष रथ का एक हिस्सा टूट जाता है. गुंडिचा मंदिर पहुंचकर माता लक्ष्मी सीधे प्रभु के सामने नहीं आती बल्कि छिपते हुए उनके दर्शन करती है. इसे निशामणि मंडप में छिपकर भगवान जगन्नाथ के दर्शन करना, कहते हैं. रथ को तोड़ने के बादा माता लक्ष्मी मुख्य मार्ग से नहीं बल्कि एक गुप्त मार्ग से श्रीमंदिर में चुपचाप वापस आ जाती है ताकि भगवान जगन्नाथ को उनके आने के बारे में न पता चल सके. इस रास्ते को ओड़िया भाषा में हेरा गोहिरी कहते हैं.
हेरा गोहिरी साही का महत्व
जब माता लक्ष्मी प्रभु जगन्नाथ के पास जाती हैं तो वह बड़े जुलूस के साथ ढोल-नगाड़ों के साथ रवाना होती है. मगर जैसे ही रथ टूटता है तो वह थोड़ी घबरा जाती हैं. इसलिए, वे हेरा गोहिरी साही से वापस आती है. इसे माता लक्ष्मी का निजी क्षेत्र माना जाता है. कहते हैं कि जब जगन्नाथ जी श्रीमंदिर में नहीं होते तो माता लक्ष्मी इस गुप्त भवन में ही विश्राम करती है.
सिर्फ अनुष्ठान नहीं प्रेम का होता है इजहार
रथयात्रा की प्यारी रस्म सिर्फ एक अनुष्ठान नहीं है. बल्कि इसे पति-पत्नी के बीच के प्रेम का सार भी माना जाता है. ये देवी-देवता की मनोहर नोक-झोंक वाले प्रेम को दर्शाती है.
भगवान जगन्नाथ कैसे मांगते हैं लक्ष्मी ठाकुरानी से माफी?
जब रथयात्रा पूरे होने के बाद जगन्नाथ जी वापस श्रीमंदिर जाने के लिए प्रस्थान करते हैं. तब उन्हें पता लगता है कि माता लक्ष्मी गुंडिचा मंदिर आई थी और गुस्से में उनके रथ को भंग करके चली गई हैं. तब भगवान जगन्नाथ अपनी गलती मानते हैं और भाई-बहन के साथ वापस निकलते हैं. यहां वे श्रीमंदिर के मुख्य द्वार पर पहुंचकर माता लक्ष्मी से गुहार करते हैं कि उन्हें अंदर आने दिया जाए. मगर माता लक्ष्मी बहुत क्रोधित होती है. फिर जगन्नाथ जी उन्हें पाटो साड़ी (ओड़िशा की प्रमुख सूती साड़ी) और रसगुल्ले भेंट देते हैं. इस मिलन और द्वार खोलने की रस्म को नीलाद्री बिजे कहते हैं. यह बहुदा यात्रा के अगले दिन का और रथयात्रा का अंतिम अनुष्ठान होता है. इस साल नीलाद्री बिजे 25 जुलाई को है.
कैसे खुलवाए जाते हैं द्वार?
नीलाद्री बिजे के दिन माता लक्ष्मी के पक्ष और भगवान जगन्नाथ के पक्ष के बीच मीठी बहस होती है. जैसे ही रथ श्रीमंदिर के मुख्य द्वार यानी जय-विजय द्वार पर पहुंचता है, तो भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा तो चुपचाप मंदिर के भीतर प्रवेश कर जाते हैं. मगर भगवान जगन्नाथ जैसे ही प्रवेश करने लगते हैं तो देवी लक्ष्मी के सेवक उनके सामने दरवाजे कस कर बंद कर देते हैं और रास्ते को रोक देते हैं. इसके बाद सिंहद्वार की सीढ़ियों जिसे बाईसी पहाचा कहा जाता है, यहां पर एक खास संवाद देखने को मिलता है.
माता लक्ष्मी की ओर से भीतरछ महापात्र सेवक द्वार के पीछे खड़े होकर लक्ष्मी मां का पक्ष रखते हैं. वे सवाल करते हैं कि जब आप अपने भाई-बहन के साथ मौसी के घर घूमने गए, तब आपको पत्नी की याद नहीं आई? अब जब यात्रा खत्म हो गई, तो वापस क्यों आए हैं? आपके लिए दरवाजे नहीं खुलेंगे. वहीं, दूसरी तरफ भगवान की तरफ से दैतापति सेवक पैरवी करते हुए कहते हैं कि गुंडिचा मंदिर में बहुत भीड़ और असुरक्षा थी, इसलिए भगवान देवी को साथ नहीं ले गए. भगवान को अपनी गलती का अहसास है और वे क्षमा मांगते हैं. मगर देवी फिर भी गुस्सा होता है. इसके बाद साड़ी और रसगुल्ले के भोग से माता को शांत किया जाता है और प्रभु अंदर प्रवेश करते हैं. इस परंपरा के चलते इस दिन पर ओडिशा में रसगुल्ला दिवस भी मनाया जाता है.
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