अपनी आजादी का जश्न मना रहे बलूचिस्तानियों पर पाकिस्तान ने एयर स्ट्राइक कर दी। इसके जवाब में बलूच लड़ाकों ने बंदूकें उठा लीं और पाकिस्तानी सेना पर कई जगह ताबड़तोड़ हमले शुरू कर दिए। देखते ही देखते सोराब और ग्वादर से लेकर चागाई, खुजदार, वाध, मंगुचर और झाओ तक हिंसा फैल गई और दोनों पक्षों के बीच जबरदस्त संघर्ष छिड़ गया। पाकिस्तान की हवाई कार्रवाई में महिलाओं और बच्चों समेत कम से कम 21 नागरिकों के मारे जाने की खबर है, जबकि जवाबी हमलों में बलूच विद्रोहियों ने पुलिस और सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया। इस तरह बलूचिस्तान एक बार फिर पाकिस्तान की सैन्य ताकत और बलूचों की आजादी की लड़ाई के बीच सीधे टकराव का मैदान बन गया है।
स्थानीय लोगों और कार्यकर्ताओं का आरोप है कि पाकिस्तानी विमानों ने अलग-थलग आतंकी ठिकानों की बजाय आबादी वाले इलाकों को निशाना बनाया। हमलों के बाद सोराब और ग्वादर में विरोध प्रदर्शन हुए और लोगों ने सैन्य कार्रवाई के खिलाफ आवाज उठाते हुए जवाबदेही की मांग की। हम आपको बता दें कि बलूचों को जबरन गायब कर देना, सुरक्षा अभियानों के नाम पर बलूचों से बदसलूकी, बलूच महिलाओं के शोषण, उनकी राजनीतिक अभिव्यक्ति पर पाबंदियों और गंभीर मानवाधिकार उल्लंघनों ने पाकिस्तान के खिलाफ स्थानीय असंतोष को दशकों से लगातार गहरा किया है।
देखा जाये तो बलूचिस्तान का संकट अचानक पैदा हुआ कोई सुरक्षा संकट नहीं है। पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत प्राकृतिक संसाधनों जैसे गैस, खनिज, ऊर्जा और रणनीतिक समुद्री क्षेत्र से बेहद समृद्ध है, लेकिन स्थानीय आबादी लंबे समय से खुद को विकास और संसाधनों के लाभ से वंचित मानती रही है। बलूच राष्ट्रवादियों का आरोप है कि इस प्राकृतिक संपदा का फायदा स्थानीय लोगों की बजाय पाकिस्तान के सत्ता प्रतिष्ठान को मिलता है। साथ ही वह पंजाबी प्रभुत्व वाले संघीय ढांचे पर राजनीतिक और जातीय भेदभाव का आरोप लगाते हैं।
इसी असंतोष ने आत्मनिर्णय की उस लंबी लड़ाई को जन्म दिया, जिसने बलूचिस्तान को पाकिस्तान के सबसे चुनौतीपूर्ण इलाकों में बदल दिया है। साथ ही बलूच राष्ट्रवादियों का कहना है कि 1947 में ब्रिटिश सत्ता समाप्त होने के समय कलात खानत ने अपनी संप्रभुता का दावा किया था। 11 अगस्त इसी ऐतिहासिक घटना की याद में बलूच राष्ट्रवादियों के लिए प्रतीकात्मक स्वतंत्रता दिवस है। उनका दावा है कि मार्च 1948 में पाकिस्तान में विलय का फैसला स्वतंत्र इच्छा से नहीं, बल्कि दबाव में कराया गया। हालांकि पाकिस्तान इस दावे को स्वीकार नहीं करता और 14 अगस्त को ही बलूचिस्तान समेत पूरे देश का स्वतंत्रता दिवस मानता है। दूसरी ओर, इस बार 11 अगस्त का संदेश केवल प्रतीकात्मक नहीं रहा। बलूच राष्ट्रवादियों ने इसे अपनी राजनीतिक पहचान और स्वतंत्र अस्तित्व की घोषणा के रूप में पेश किया। सोशल मीडिया पर कुछ बलूच समर्थकों ने दावा किया कि भविष्य में अलग ‘रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान’ के लिए पासपोर्ट, मुद्रा और दूतावास जैसी संस्थाओं की तैयारी की जा रही है।
उधर, पाकिस्तान की एयर स्ट्राइक के बाद हालात और विस्फोटक हो गए। बलूच लिबरेशन आर्मी यानी BLA ने इसके समानांतर कई जिलों में समन्वित हमले किए। चागाई में आधी रात को पुलिस स्टेशन पर बम हमला कर उसे नष्ट किए जाने और तीन सुरक्षा कर्मियों के मारे जाने की खबर है। यखमाच में वाणिज्यिक वाहनों पर घात लगाकर हमला और एक ट्रक हाईजैक किए जाने की सूचना सामने आई। खुजदार RCD हाईवे पर सुरक्षा काफिले और बख्तरबंद वाहन को निशाना बनाए जाने, वाध में सैन्य वाहनों पर घात लगाकर हमला करने, मंगुचर बाजार में सुरक्षा चौकी पर विस्फोट और भारी गोलीबारी तथा झाओ में पाकिस्तानी सैन्य शिविर पर रात में हमले की रिपोर्ट है।
साथ ही BLA ने इस महीने अलग-अलग हमलों में कम से कम 32 पाकिस्तानी सैनिकों को मारने का दावा भी किया है। दूसरी ओर पाकिस्तान का कहना है कि सुरक्षा बलों ने बलूचिस्तान में मुठभेड़ों के दौरान 10 उग्रवादियों को मार गिराया। एक कार बम के समय से पहले फटने की घटना में आठ आतंकियों और पास के घर में मौजूद तीन लोगों समेत 11 लोगों के मारे जाने की बात भी पाकिस्तानी अधिकारियों ने कही है।
देखा जाये तो इन घटनाओं को अलग-अलग हमलों के रूप में देखना बड़ी तस्वीर को नजरअंदाज करना होगा। बलूचिस्तान में अब एक खतरनाक चक्र बनता दिखाई दे रहा है। पाकिस्तानी सैन्य कार्रवाई, नागरिकों में आक्रोश, बलूच विद्रोहियों की जवाबी हिंसा और फिर और कठोर सैन्य अभियान। यही चक्र इस संघर्ष को लगातार गहरा कर रहा है।
बलूचिस्तानियों की आजादी की लड़ाई की ‘सफलता’ को फिलहाल पाकिस्तान से वास्तविक राजनीतिक स्वतंत्रता के रूप में देखना जल्दबाजी होगी। लेकिन इतना स्पष्ट है कि दशकों के दमन, सैन्य अभियानों और राजनीतिक असंतोष के बावजूद स्वतंत्रता की मांग खत्म नहीं हुई। बल्कि 11 अगस्त जैसे प्रतीक, सड़कों पर विरोध और BLA जैसे सशस्त्र संगठनों की बढ़ती गतिविधियां बताते हैं कि बलूच सवाल अब भी पाकिस्तान के सामने एक गंभीर और जटिल चुनौती है।
बहरहाल, पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या वह बलूचिस्तान को केवल बंदूक और एयर स्ट्राइक से नियंत्रित कर पाएगा। क्योंकि जिस संघर्ष को दशकों तक सुरक्षा समस्या बताकर दबाने की कोशिश की गई, वह अब राजनीतिक पहचान, संसाधनों पर अधिकार और आत्मनिर्णय की मांग से जुड़ा व्यापक संकट बन चुका है। और जब किसी जमीन पर लोग अपनी आजादी का दिन मनाने के लिए भी डर और गोलियों के साये में खड़े हों, तो यह सिर्फ कानून-व्यवस्था का सवाल नहीं रहता, यह उस राज्य की वैधता पर उठता एक बेहद गंभीर सवाल बन जाता है।
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रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने गुरुवार को पहली बार जापान के दावे वाले विवादित कुरील द्वीप समूह का दौरा किया। क्रेमलिन ने पुतिन के दौरे का वीडियो जारी किया। उन्होंने कुरील द्वीप पर एक फिश प्रोसेसिंग प्लांट का दौरा किया। पुतिन की इस यात्रा के बाद जापान ने कड़ा विरोध जताया और कहा कि यह इलाका उसका हिस्सा है। रूस और जापान के बीच प्रशांत महासागर में 4 द्वीपों को लेकर 80 साल से विवाद है। जापान इसे नॉर्दर्न टेरिटरीज कहता है जबकि रूस इन्हें कुरील आइलैंड ग्रुप का हिस्सा मानता है। पुतिन की दौरे से जुड़ी 2 फोटोज रूस और जापान में 4 द्वीपों को लेकर विवाद रूस और जापान के बीच प्रशांत महासागर में स्थित चार द्वीपों को लेकर विवाद है। जापान इन्हें 'नॉर्दर्न टेरिटरीज' (उत्तरी क्षेत्र) कहता है, जबकि रूस इन्हें कुरील द्वीप समूह का हिस्सा मानता है। द्वितीय विश्व युद्ध के आखिरी दिनों में 1945 में सोवियत संघ ने इन द्वीपों पर कब्जा कर लिया था। इसके बाद यहां रहने वाले करीब 17 हजार जापानी नागरिकों को वहां से हटा दिया गया। कब्जे के बाद सोवियत संघ ने यहां हवाई और नौसैनिक अड्डे बनाए। प्रशांत महासागर में रणनीतिक स्थिति होने की वजह से इन द्वीपों का सैन्य महत्व लगातार बढ़ता गया। आज भी रूस यहां बड़ी संख्या में सैनिक और आधुनिक सैन्य उपकरण तैनात रखता है। द्वितीय विश्व युद्ध खत्म होने के बाद ज्यादातर देशों ने आपस में शांति संधि (पीस ट्रीटी) पर हस्ताक्षर कर दिए थे, लेकिन कुरील द्वीपों के विवाद की वजह से रूस और जापान आज तक ऐसा नहीं कर सके हैं। दोनों देशों में नाम लगभग एक जैसे खास बात यह है कि इन विवादित द्वीपों के नाम दोनों देशों में लगभग एक जैसे हैं। रूस इन्हें कुनाशिर, इतुरुप, शिकोतान और हाबोमाई कहता है, जबकि जापान इन्हें कुनाशिरी, एतोरोफू, शिकोतान और हाबोमाई के नाम से जानता है। इन चारों द्वीपों पर करीब 20 हजार लोग रहते हैं। यहां बहुत ठंड पड़ती है, लेकिन सोना-चांदी जैसे खनिज और मछलियों के बड़े भंडार होने की वजह से इन द्वीपों की आर्थिक अहमियत काफी ज्यादा है। रूस 2 द्वीप देने का तैयार हुआ, जापान नहीं माना 1956 में सोवियत संघ और जापान के बीच राजनयिक संबंध बहाल होने के बाद विवाद सुलझाने की कोशिश शुरू हुई। उस समय सोवियत नेता निकिता ख्रुश्चेव ने शांति समझौते के बदले शिकोतान और हाबोमाई द्वीप जापान को लौटाने का प्रस्ताव दिया था, लेकिन जापान चार से कम मानने को तैयार नहीं था। 1991 में सोवियत संघ के टूटने के बाद भी रूस और जापान के बीच कई दौर की बातचीत हुई, लेकिन कोई समाधान नहीं निकला। 2010 में तत्कालीन रूसी राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव इन विवादित द्वीपों का दौरा करने वाले पहले रूसी राष्ट्रपति बने। इसके बाद रूस ने यहां अपनी सैन्य मौजूदगी और मजबूत की, जबकि जापान लगातार अपना दावा दोहराता रहा। यूक्रेन युद्ध के बाद दोनों देशों के रिश्ते और खराब हो गए। अब पुतिन का यह दौरा इन विवादित द्वीपों पर रूस के दावे को फिर से मजबूत करने के मैसेज के तौर पर देखा जा रहा है।
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जापान की ओर करीब 200 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से डॉल्फिन तूफान बढ़ रहा है। इसकी वजह से 2.6 लाख लोगों को घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों पर जाने के आदेश दिए गए हैं। पूरी खबर यहां पढ़ें…
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