बांग्लादेश में 35 साल बाद राष्ट्रपति चुनाव में मुकाबला:BNP प्रत्याशी फखरुल की जीत तय; कट्टरपंथी जमात ने रिटायर्ड आर्मी अफसर को उम्मीदवार बनाया
बांग्लादेश में 35 साल बाद राष्ट्रपति चुनाव का मुकाबला होने जा रहा है। 1991 के बाद यह पहली बार है, जब राष्ट्रपति पद के लिए दो उम्मीदवार मैदान में होंगे। रूलिंग पार्टी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) ने गुरुवार को पार्टी के महासचिव मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर को राष्ट्रपति चुनाव के लिए अपना उम्मीदवार बनाया है। बांग्लादेश में राष्ट्रपति को जनता सीधे नहीं चुनती। संसद के सदस्य राष्ट्रपति का चुनाव करते हैं। फरवरी में हुए आम चुनाव में BNP को संसद में दो-तिहाई बहुमत मिला था। इसलिए फखरुल की जीत लगभग तय मानी जा रही है। दूसरी ओर, बांग्लादेश की मुख्य कट्टरपंथी विपक्षी पार्टी जमात-ए-इस्लामी ने भी अपना उम्मीदवार उतारा है। जमात के नेतृत्व वाले गठबंधन के नेता और लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी के अध्यक्ष रिटायर्ड कर्नल ओली अहमद ने भी अपना नामांकन पत्र जमा कर दिया है। चुनाव 20 अगस्त को होगा। आखिरी बार 1991 में चुनाव में मुकाबला हुआ था बांग्लादेश में अब तक 12 राष्ट्रपति चुनाव हुए हैं। इनमें 8 बार राष्ट्रपति निर्विरोध चुने गए। संविधान लागू होने के बाद पहला राष्ट्रपति चुनाव 1974 में हुआ, जिसमें सांसदों ने वोट देकर मोहम्मद मोहम्मदुल्लाह को चुना। 1975 में संविधान संशोधन के बाद राष्ट्रपति का चुनाव सीधे जनता से कराने की व्यवस्था हुई। इसके तहत 1978, 1981 और 1986 में लगातार तीन बार जनता ने राष्ट्रपति चुना। 1991 में फिर संसदीय व्यवस्था लागू हुई और राष्ट्रपति का चुनाव दोबारा सांसदों के जरिए होने लगा। 1991 में दो उम्मीदवारों के बीच मुकाबला हुआ। इसके बाद 2023 तक सभी चुनाव निर्विरोध रहे, क्योंकि हार के डर से विपक्ष ने उम्मीदवार नहीं उतारा। 1991 के बाद 35 साल में पहली बार बांग्लादेश में राष्ट्रपति पद के लिए मुकाबला हो रहा है। यानी सांसदों को मतदान करना होगा। 1960 में BNP उम्मीदवार ईस्ट पाकिस्तान यूनियन से जुड़े थे फखरुल का राजनीतिक सफर करीब छह दशक पुराना है। 1960 में ढाका यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान उन्होंने छात्र राजनीति शुरू की। वे उस समय ईस्ट पाकिस्तान स्टूडेंट्स यूनियन से जुड़े थे। 1969 में राष्ट्रपति अयूब खान के खिलाफ बड़े जन आंदोलन के दौरान वे छात्र संगठन की ढाका यूनिवर्सिटी इकाई के अध्यक्ष थे। राजनीतिक गतिविधियों के कारण उन्हें गिरफ्तार भी किया गया। हालांकि, छात्र राजनीति के बाद वे तुरंत सक्रिय राजनीति में नहीं आए। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने शिक्षक के तौर पर करियर शुरू किया। 1972 में ढाका कॉलेज में लेक्चरर बने। बाद में कई सरकारी कॉलेजों में भी पढ़ाया। फखरुल 1986 में सरकारी नौकरी छोड़ राजनीति में आए उम्मीदवारी मिलते ही फखरुल ने BNP के महासचिव पद और पार्टी की स्थायी समिति से इस्तीफा दे दिया। गुरुवार को ही उनका नामांकन पत्र चुनाव आयोग में जमा कर दिया गया। जमात गठबंधन के उम्मीदवार लिबरेशन वॉर में शामिल थे कट्टरपंथी विपक्षी पार्टी जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाले गठबंधन के उम्मीदवार कर्नल (रिटायर्ड) ओली अहमद बांग्लादेश के जाने-माने और अनुभवी राजनेता हैं। वह 1971 के बांग्लादेश लिबरेशन वॉर में भी शामिल रहे थे। 1980 में सेना से रिटायर होने के बाद उन्होंने राजनीति में कदम रखा। वे BNP के शुरुआती संस्थापकों में शामिल रहे और खालिदा जिया के करीबी नेताओं में गिने जाते थे। 1991 में BNP की सरकार बनने पर उन्हें संचार मंत्री बनाया गया। वे युवा विकास और बिजली-ऊर्जा जैसे मंत्रालयों की जिम्मेदारी भी संभाल चुके हैं। 2006 में ओली अहमद ने BNP से अलग होकर लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी (LDP) बनाई और बाद में इसके अध्यक्ष बने। वे कई बार सांसद भी रह चुके हैं। -------------------- यह खबर भी पढ़ें… बांग्लादेश में 10-10 घंटे बिजली कट रही:सरकार ने रात 8 बजे बाजार बंद करने का आदेश दिया, भारत से डीजल सप्लाई बढ़ाने की मांग बांग्लादेश में बिजली संकट लगातार गंभीर होता जा रहा है। देश के कई हिस्सों में रोज 8 से 10 घंटे तक बिजली कट रही है। इसका सबसे ज्यादा असर ग्रामीण इलाकों में देखने को मिल रहा है। तेज गर्मी और हीटवेव ने लोगों की परेशानी और बढ़ा दी है। पूरी खबर पढ़ें…
केन-बेतवा लिंक परियोजना से प्रभावित ग्रामीण पहुंचे दिल्ली, राहुल गांधी से की मुलाकात, बताई अपनी पीड़ा
बुंदेलखंड के विकास और जल संकट को दूर करने के लिए वरदान मानी जाने वाली बहुप्रतीक्षित केन बेतवा लिंक परियोजना अब स्थानीय लोगों के लिए जी का जंजाल बन चुकी है और इसी के चलते पीड़ित ग्रामीणों ने अब सीधे देश की राजधानी दिल्ली का रुख किया है। विकास की इस बड़ी परियोजना के कारण अपने घरों और जमीनों से बेदखल हुए विस्थापित ग्रामीणों का आक्रोश अब चरम पर पहुंच गया है। अपनी मांगों को लेकर लगातार संघर्ष कर रहे प्रभावित ग्रामीणों के एक विशेष प्रतिनिधिमंडल ने दिल्ली पहुंचकर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी से मुलाकात की। इस महत्वपूर्ण मुलाकात के दौरान ग्रामीणों ने केन बेतवा लिंक परियोजना के कारण उत्पन्न हुई विस्थापन की गंभीर स्थिति, मुआवजे की विसंगतियों और प्रभावित परिवारों के सामने खड़े जीवनयापन के संकट को बेहद मजबूती के साथ राहुल गांधी के समक्ष रखा।
ग्रामीणों का स्पष्ट रूप से कहना है कि इस महत्वाकांक्षी परियोजना के कारण क्षेत्र के सैकड़ों परिवारों को बेघर होना पड़ा है और वे लंबे समय से अपनी ही जमीन के बदले उचित और सम्मानजनक मुआवजे की मांग को लेकर भटक रहे हैं। पीड़ित ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि उनकी जायज मांगों और गंभीर समस्याओं को लेकर लगातार शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन किए जा रहे हैं, लेकिन शासन और प्रशासन की ओर से उनकी आवाज को अनसुना किया जा रहा है। प्रतिनिधिमंडल ने राहुल गांधी को अपनी दयनीय स्थिति से विस्तार से अवगत कराया और प्रभावित परिवारों के लिए उचित मुआवजा सुनिश्चित करने तथा उनके बुनियादी अधिकारों की रक्षा के लिए इस पूरे मामले में तुरंत राजनीतिक हस्तक्षेप करने की पुरजोर मांग की है।
राहुल गांधी से मुलाकात के बाद ग्रामीणों को न्याय की नई उम्मीद
दिल्ली में हुई इस मुलाकात के बाद अब पीड़ित ग्रामीणों के मन में न्याय की एक नई उम्मीद जागी है। उन्हें पूरा भरोसा है कि राहुल गांधी से मिलने के बाद अब उनकी मांगों को राष्ट्रीय और राजनीतिक स्तर पर भी बड़ी मजबूती मिलेगी और सरकार पर उनके पुनर्वास के लिए दबाव बनेगा। केन बेतवा लिंक परियोजना को लेकर प्रभावित क्षेत्रों में विस्थापन और मुआवजे का यह मुद्दा लंबे समय से बेहद संवेदनशील और गर्माया हुआ रहा है, जिसने स्थानीय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
केन-बेतवा परियोजना के विरोध में ग्रामीणों का आंदोलन लगातार जारी
आपको बता दें कि इस परियोजना के खिलाफ स्थानीय ग्रामीणों और आदिवासियों द्वारा लगातार उग्र और अनोखे तरीके से विरोध प्रदर्शन किए जाते रहे हैं। अपनी आवाज बुलंद करने के लिए ग्रामीणों ने पूर्व में चिता व जल सत्याग्रह जैसा दिल दहला देने वाला आंदोलन भी किया था। साल 2026 के जुलाई महीने में छतरपुर जिले के कुपी गांव के पास बहने वाली बराना नदी में यह आंदोलन उस समय पूरे देश की सुर्खियों में आ गया था, जब न्याय की गुहार लगा रहे प्रदर्शनकारियों ने अपने गले में फंदे डाल लिए थे और नदी के पानी के बीच बनाई गई प्रतीकात्मक चिताओं पर लेटकर अपना विरोध दर्ज कराया था। ग्रामीणों के इस बेहद संवेदनशील और अनोखे आंदोलन को 19 जुलाई 2026 को पुलिस प्रशासन द्वारा बलपूर्वक समाप्त कर दिया गया था, जिससे ग्रामीणों में आक्रोश और अधिक भड़क गया था। आज भी ग्रामीण अपने हक की लड़ाई के लिए डटे हुए हैं और जब तक उन्हें न्याय नहीं मिल जाता, तब तक वे पीछे हटने को तैयार नहीं हैं।
नेता विपक्ष श्री @RahulGandhi ने मध्य प्रदेश में केन-बेतवा लिंक परियोजना के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे प्रतिनिधिमंडल के साथ मुलाकात कर, बातचीत की।
इस दौरान, राहुल गांधी जी ने प्रतिनिधिमंडल से इस परियोजना से होने वाली समस्याओं के साथ उनकी मांगों पर भी चर्चा की।
???? दिल्ली pic.twitter.com/tDs8HqTMUS
— Congress (@INCIndia) August 13, 2026
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