Explainer: DRS का वो नियम जिससे घूम जाता है दिग्गजों का सिर, जानिए क्या है अंपायर्स कॉल और इसके 50% का पूरा खेल
क्रिकेट का खेल अपने नियमों के हिसाब से खेला जाता है. इस गेम को खेलने के लिए कई नियम बनाए गए हैं, जिसमें एक नियम DRS (डिसीजन रिव्यू सिस्टम) का भी है. जब भी कोई टीम DRS लेती है तो फिर उसमें अंपायर्स कॉल की भी बात होती है. क्रिकेट में अंपायर्स कॉल DRS का एक ऐसा नियम है, जिसके तहत तकनीकी रूप से बेहद करीबी मामलों में मैदान पर मौजूद अंपायर का अंतिम फैसला होता है और उसे मानना पड़ता है. यह नियम मुख्य रूप से लेग बिफोर विकेट (LBW) के फैसलों पर लागू होता है, जहां हॉक-आई (Hawk-Eye) बॉल-ट्रैकिंग तकनीक पूरी तरह से आश्वस्त नहीं होती कि गेंद स्टंप्स पर लगेगी या नहीं. ऐसी अनिश्चित स्थिति में टेक्नोलॉजी मानवीय भूल की संभावना या 'मार्जिन ऑफ एरर' को स्वीकार करते हुए मैदानी अंपायर के फैसले का सम्मान करती है, जिसे अंपायर्स कॉल कहा जाता है.
अंपायर्स कॉल को लेकर क्या था ICC का मुख्य उद्देश्य?
अंपायर्स कॉल नियम लागू करने का आईसीसी का मुख्य उद्देश्य यह था कि खेल में मैदानी अंपायर्स के अधिकार और उनकी भूमिका अहम बनी रहे. टेक्नोलॉजी का उपयोग अंपायर की बड़ी गलतियों को सुधारने के लिए किया गया था, उनकी बेहद करीबी और कम अनुमानों वाले फैसलों को चुनौती देने के लिए नहीं किया गया था.
अंपायर्स कॉल में क्या है 50% का गणितीय नियम
बॉल-ट्रैकिंग टेक्नोलॉजी में 'अंपायर्स कॉल' पूरी तरह से 50 फीसदी के नियम पर काम करती है. अगर गेंद का 50% से अधिक का हिस्सा स्टंप्स या इम्पैक्ट लाइन के भीतर पाया जाता है, तो फिर यहां तकनीक के अनुमान को मजबूत आधार माना जाता है और मैदानी अंपायर्स का फैसला बदला जा सकता है. जैसे अंपायर ने आउट दिया है तो नॉटआउट करारा दिया जाता है. वहीं अगर नॉटआउट दिया है तो आउट दिया जा सकता है.
मगर वहीं, अगर बॉल का हिस्सा 50% से कम, चाहे वह 49% ही क्यों न हो, स्टंप्स से टकराता हुआ दिखता है, तो तकनीक इसे एक 'अस्पष्ट' स्थिति मानती है. इस स्थिति में मैदानी अंपायर का फैसला ही आखिरी फैसला माना जाता है. अंपायर्स कॉल का सीधा मतलब है कि जब कोई टीम रिव्यू (DRS) लेती है और टेक्नोलॉजी से पता चलता है कि गेंद का आधे से कम हिस्सा (50% से कम) स्टंप्स को छू रहा है, तो थर्ड अंपायर मैदानी अंपायर के फैसले को नहीं बदलता है. अगर मैदानी अंपायर ने पहले 'आउट' दिया था तो खिलाड़ी आउट ही रहेगा, और अगर 'नॉट आउट' दिया था तो वह नॉट आउट ही रहेगा.
LBW फैसलों में कैसे काम करता है अंपायर्स कॉल?
क्रिकेट में जब कोई टीम LBW के फैसले के खिलाफ DRH का इस्तेमाल करती है तो तीसरे अंपायर द्वारा बॉल-ट्रैकिंग टेक्नोलॉजी का उपयोग किया जाता है, जिसमें 3 मुख्य जोन में जांच की जाती है.
पिचिंग जोन (Pitching Zone): पहले यह देखा जाता है कि बॉल कहां टप्पा खाई है. पिचिंग जोन में भी 'अंपायर्स कॉल' (Umpire's Call) लागू हो सकती है, लेकिन यह केवल तब होता है जब गेंद का कुछ हिस्सा लाइन के अंदर और कुछ हिस्सा लाइन के बाहर टप्पा खाता है. नियम के अनुसार, यदि गेंद लेग स्टंप के बाहर पिच होती है, तो बल्लेबाज को आउट नहीं दिया जा सकता (चाहे ऑन-फील्ड अंपायर ने आउट ही क्यों न दिया हो). यदि गेंद स्टंप्स की लाइन में या ऑफ-स्टंप के बाहर पिच हुई है, तो ही LBW की आगे की जांच होती है.
इम्पैक्ट जोन (Impact Zone): इसमें यह देखा जाता है कि गेंद पहली बार बल्लेबाज के पैड या फिर शरीर से कहां टकराएगी. यदि गेंद का 50% से अधिक हिस्सा स्टंप्स की काल्पनिक सीधी लाइन (3D स्पेस) के भीतर होता है, तो इसे 'इन-लाइन' (In-Line) माना जाता है. इसमें यह देखा जाता है कि जब गेंद पैड से टकराई, तब क्या वह स्टंप्स की काल्पनिक सीधी लाइन के भीतर थी या बाहर. यदि गेंद का 50% से कम हिस्सा इस काल्पनिक लाइन के अंदर होता है, तो उसे 'अंपायर्स कॉल' माना जाता है. वहीं यदि बल्लेबाज ने शॉट खेलने का प्रयास नहीं किया है, तो इम्पैक्ट ऑफ-स्टंप के बाहर होने पर भी उसे आउट करार दिया जा सकता है.
विकेट जोन (Wicket Zone): इसमें यह देखा जाता है कि बॉल जाकर स्टंप्स को छुएगी या नहीं. यदि गेंद का 50% से कम हिस्सा किसी भी स्टंप (ऑफ, मिडिल या लेग) या गिल्लियों को छूता हुआ प्रतीत होता है, तो यहां भी 'अंपायर्स कॉल' लागू होता है और मैदान पर मौजूद अंपायर का फैसला ही अंतिम माना जाता है, लेकिन अगर गेंद का 50% या उससे अधिक हिस्सा स्टंप्स या गिल्लियों के किसी भी हिस्से से टकराता हुआ अनुमानित होता है, तब ऑन-फील्ड अंपायर का 'नॉट आउट' या फिर आउट का फैसला थर्ड अंपायर बदलता है.
क्या अंपायर्स कॉल पर टीम का रिव्यू जाता है बेकार?
आपको बता दें कि अंपायर्स कॉल पर टीमें अपना रिव्यू नहीं खोती हैं. यानी किसी टीम ने रिव्यू लिया और अंपायर्स कॉल हो गया तो रिव्यू बच जाता है और उसे दोबारा मैच में इस्तेमाल किया जा सकता है. किसी टीम का रिव्यू तभी खत्म होता है जब तकनीक पूरी तरह से मैदानी अंपायर के फैसले को सही साबित कर दे. जैसे कि गेंद स्टंप्स को या तो पूरी तरह से मिस कर रही हो या फैसला पूरी तरह पलट जाए.
अंपायर कॉल को लेकर क्यों होता है विवाद?
सचिन तेंदुलकर, शेन वॉर्न और बेन स्टोक्स जैसे दुनिया के कई दिग्गज अंपायर कॉल की आलोचना कर चुके हैं, क्योंकि उनका मानना है कि जब टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया जा रहा है, तो फैसला भी पूरी तरह से डिजिटल होना चाहिए. इन दिग्गजों का मानना है कि अंपायर कॉल की वजह से एक बल्लेबाज आउट हो जाता है तो दूसरा बच जाता है, क्योंकि मैदान पर मौजूद अंपायर का फैसला ही अंतिम होता है, चाहे उन्होंने पहले आउट दिया हो या नॉटआउट. दूसरी ओर, आईसीसी और कई विशेषज्ञों का तर्क है कि बॉल-ट्रैकिंग तकनीक सिर्फ गेंद के एक 'संभावित मार्ग' का अनुमान लगाती है, वास्तविक मार्ग का नहीं, यदि तकनीक में 1-2 मिलीमीटर की भी गलती हो, तो बॉल स्टंप्स को पूरी तरह छोड़ सकती है, इसलिए खेल में मानवीय निर्णय का होना भी जरूरी है.
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