यूरोप इन दिनों रिकॉर्डतोड़ और अभूतपूर्व भीषण गर्मी (Heatwave) की चपेट में है। इस तपिश के बीच ब्रिटेन (UK) से हैरान करने वाली खबरें और तस्वीरें सामने आ रही हैं, जहां डामर की सड़कें नरम पड़कर पिघलने लगी हैं। इस स्थिति ने दुनिया भर के विशेषज्ञों का ध्यान खींचा है, खासकर भारत जैसे देशों में जहां लोग यह सोच रहे हैं कि जब भारत में पारा अक्सर 50 डिग्री सेल्सियस के पार चला जाता है, तब भी यहां की सड़कें सुरक्षित कैसे रहती हैं? क्या ब्रिटेन की तुलना में भारत बेहतर और मजबूत सड़कें बनाता है? इसका जवाब इंजीनियरिंग और स्थानीय मौसम के उस विज्ञान में छिपा है, जिसे समझना बेहद दिलचस्प है।
आइए जानते हैं कि ऐसा क्यों होता है। इसका जवाब यह नहीं है कि एक देश दूसरे देश से बेहतर सड़कें बनाता है।
गर्मी में UK की सड़कें क्यों पिघलती हैं?
UK जैसे देश मुख्य रूप से डामर (asphalt) का इस्तेमाल करके सड़कें बनाते हैं, जो एग्रीगेट्स (कंकड़-पत्थर) और बिटुमेन का मिश्रण होता है। हालाँकि, यहाँ इस्तेमाल होने वाले डामर की बनावट भारत में इस्तेमाल होने वाले डामर से काफी अलग होती है।
यूरोपीय सड़कों में आमतौर पर हॉट-रोल्ड डामर (HRA) और घने डामर कंक्रीट (dense asphalt concrete) जैसी सामग्रियों का इस्तेमाल होता है, जिनमें बिटुमेन और बारीक एग्रीगेट्स की मात्रा ज़्यादा होती है। इससे सड़क की सतह को ज़्यादा लचीलापन मिलता है, जिससे कड़ाके की ठंड में बिना दरार पड़े सड़क फैल और सिकुड़ सकती है।
UK में नरम ग्रेड वाले बिटुमेन का इस्तेमाल होता है क्योंकि वहाँ की सड़कें लंबे समय तक जमा देने वाली ठंड को झेलने के लिए बनाई जाती हैं। नरम बिटुमेन तापमान के जमाव बिंदु (freezing point) से नीचे जाने पर भी लचीला बना रहता है, जिससे बार-बार जमने और पिघलने (freeze-thaw cycles) के कारण होने वाली दरारों और संरचनात्मक नुकसान को रोकने में मदद मिलती है।
भारत की सड़कें भीषण गर्मी को कैसे झेल लेती हैं?
हर साल भारत में गर्मियों में तापमान बहुत ज़्यादा रहता है और यहाँ की सड़कें उसी हिसाब से बनाई जाती हैं। भारत में ज़्यादातर सड़कें सख्त VG-ग्रेड बिटुमेन (जैसे VG-30 और VG-40) और बड़े एग्रीगेट्स वाले बिटुमिनस कंक्रीट से बनाई जाती हैं। यह मिश्रण खास तौर पर भीषण गर्मी और भारी ट्रैफिक का भार सहने के लिए तैयार किया जाता है।
इन बिटुमेन ग्रेड्स की ज़्यादा विस्कोसिटी (गाढ़ापन) और कठोरता के कारण गर्मी के दौरान भारतीय सड़कों के नरम पड़ने की संभावना बहुत कम होती है। ये भारी वाहनों के कारण होने वाले गड्ढों (rutting), आकार बिगड़ने (deformation) और सतह को होने वाले नुकसान का भी बेहतर ढंग से सामना करती हैं।
क्या अंतर है?
मुख्य अंतर यह है कि सड़कें किसी एक तरीके से नहीं, बल्कि स्थानीय मौसम के हिसाब से बनाई जाती हैं। UK में सड़कें लंबी और जमा देने वाली ठंड को झेलने के लिए बनाई जाती हैं, जहाँ बार-बार जमने और पिघलने से होने वाली दरारों को रोकने के लिए लचीलापन ज़रूरी होता है। इसके विपरीत, भारत में सड़कें लंबे समय तक भीषण गर्मी को झेलने के लिए बनाई जाती हैं, जिसमें नरम पड़ने और आकार बिगड़ने से बचाने पर ज़्यादा ज़ोर दिया जाता है। नतीजतन, ब्रिटेन के कुछ हिस्सों में तापमान 40°C के करीब या उससे ज़्यादा होने पर सड़कों की सतह नरम पड़ने लगती है, जबकि भारत में सड़कें आम तौर पर 45°C से भी ज़्यादा तापमान झेलने में सक्षम होती हैं।
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