भारत 1 जुलाई से पेट्रोल और डीज़ल की बिक्री पर लगी अस्थायी पाबंदियां हटा लेगा। इससे वे आपातकालीन उपाय खत्म हो जाएंगे जो इस महीने की शुरुआत में ईरान के खिलाफ़ अमेरिका-इज़राइल युद्ध और होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के बंद होने से पैदा हुई रुकावटों के बीच घरेलू ईंधन सप्लाई को सुरक्षित रखने के लिए लागू किए गए थे। संभावित सप्लाई की कमी को देखते हुए एहतियात के तौर पर लगाई गई इन पाबंदियों के तहत कमर्शियल ग्राहकों के लिए रिटेल फ्यूल स्टेशनों से पेट्रोल और डीज़ल खरीदना बंद कर दिया गया था। अधिकारियों ने आम जनता के लिए डीज़ल की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए इसकी खरीद पर रोज़ाना की सीमा भी तय कर दी थी। ये पाबंदियां इस डर के बीच लगाई गई थीं कि खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका-इज़राइल युद्ध से ग्लोबल एनर्जी सप्लाई चेन बाधित हो सकती है और ईंधन की उपलब्धता पर असर पड़ सकता है।
कमर्शियल LPG की सप्लाई फिर से शुरू
पिछले हफ़्ते, केंद्र सरकार ने कमर्शियल LPG की सप्लाई को संकट से पहले के स्तर पर बहाल कर दिया। मंत्रालय ने कहा कि उन्होंने मार्च में लगाई गई वे अस्थायी पाबंदियां हटा ली हैं, जो अमेरिका और इज़राइल के बीच युद्ध के कारण ग्लोबल एनर्जी सप्लाई चेन में रुकावट आने के बाद लागू की गई थीं। घरेलू खाना पकाने वाली गैस की सप्लाई को प्राथमिकता देने के लिए लगाई गई इन पाबंदियों के कारण कमर्शियल ग्राहकों के लिए गैस का आवंटन कम हो गया था, जिससे होटलों, रेस्तरां, बेकरी और उद्योगों को डीज़ल और कोयले पर आधारित विकल्पों का इस्तेमाल करने के लिए मजबूर होना पड़ा था।
सप्लाई के स्थिर होने के साथ, सरकार ने तेल मार्केटिंग कंपनियों को निर्देश दिया कि वे नॉन-डोमेस्टिक पैक्ड LPG सिलेंडरों की पूरी सप्लाई फिर से शुरू करें और बल्क LPG पर लगी पाबंदियों में थोड़ी ढील दें, जिससे संकट से पहले के लेवल के 50% तक खपत की इजाज़त मिल सके। जो कमर्शियल और इंडस्ट्रियल ग्राहक पहले ही पाइप्ड नेचुरल गैस (PNG) पर शिफ्ट हो चुके हैं, उन्हें वापस LPG पर जाने की इजाज़त नहीं होगी, क्योंकि सरकार PNG के इस्तेमाल को बढ़ावा देना जारी रखे हुए है।
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वैश्विक अर्थव्यवस्था इस समय कई तरह की चुनौतियों का सामना कर रही है। ऐसे में एआई पर तेजी से बढ़ रहा निवेश भी अब विशेषज्ञों की चिंता का विषय बनने लगा है। अंतरराष्ट्रीय निपटान बैंक ने अपनी वार्षिक आर्थिक रिपोर्ट 2026 में आगाह किया है कि यदि एआई को लेकर निवेशकों का मौजूदा उत्साह अचानक कम होता है, तो इसका असर केवल इस क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि पूरी वैश्विक वित्तीय व्यवस्था पर पड़ सकता है।
बता दें कि अंतरराष्ट्रीय निपटान बैंक को दुनिया के केंद्रीय बैंकों का बैंक भी कहा जाता है। यह संस्था समय-समय पर वैश्विक अर्थव्यवस्था और वित्तीय प्रणाली से जुड़े जोखिमों का आकलन करती है। अपनी ताजा रिपोर्ट में बैंक ने कहा है कि लगातार मिले कई वैश्विक झटकों के बावजूद दुनिया की अर्थव्यवस्था ने अपेक्षा से बेहतर मजबूती दिखाई है। इसमें आयात शुल्क बढ़ने, पश्चिम एशिया में संघर्ष और होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने जैसी घटनाएं भी शामिल रही हैं।
रिपोर्ट के अनुसार इस मजबूती की एक बड़ी वजह आसान वित्तीय परिस्थितियां और एआई से जुड़े क्षेत्रों में तेज निवेश रहा है। हालांकि बैंक का कहना है कि यही स्थिति आगे चलकर जोखिम का कारण भी बन सकती है। यदि वित्तीय बाजारों को यह महसूस होने लगे कि एआई से भविष्य में मिलने वाले लाभ उम्मीद से कम हैं, तो निवेश में तेज गिरावट आ सकती है और इसका व्यापक असर अर्थव्यवस्था पर देखने को मिल सकता है।
मौजूद जानकारी के अनुसार रिपोर्ट में कहा गया है कि एआई में संभावनाओं की कोई कमी नहीं है। विभिन्न अध्ययनों में यह पाया गया है कि कई कार्यों को पूरा करने में 20 से 50 प्रतिशत तक समय की बचत संभव है। इससे उत्पादकता बढ़ने की उम्मीद भी मजबूत हुई है। लेकिन चिंता इस बात की है कि वित्तीय बाजार इन संभावित लाभों को बहुत पहले ही अपने मूल्यांकन में शामिल कर रहे हैं। यदि भविष्य में अपेक्षित नतीजे नहीं मिले तो बाजार में तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है।
गौरतलब है कि रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि एआई क्षेत्र की कंपनियां लगातार अधिक कर्ज लेकर विस्तार कर रही हैं। वहीं निजी ऋण देने वाली संस्थाओं और गैर-बैंक वित्तीय संस्थानों की भूमिका भी तेजी से बढ़ रही है। यदि बड़ी प्रौद्योगिकी कंपनियां अपने पूंजीगत खर्च में कटौती करती हैं तो इंजीनियरिंग, निर्माण और उपकरण उपलब्ध कराने वाली कंपनियों पर भी इसका सीधा असर पड़ सकता है।
रिपोर्ट में सरकारी वित्त और वित्तीय स्थिरता के बीच बढ़ते संबंधों को भी नई चुनौती बताया गया है। बैंक का कहना है कि कई देशों में सरकारी कर्ज और ऊंची ब्याज दरों के कारण आर्थिक दबाव पहले से अधिक बढ़ गया है। इससे भविष्य में किसी आर्थिक संकट की स्थिति में सरकारों के पास राहत उपायों के लिए सीमित संसाधन बच सकते हैं।
अंतरराष्ट्रीय निपटान बैंक के मौद्रिक और आर्थिक विभाग के कार्यवाहक प्रमुख फ्रैंक स्मेट्स ने कहा है कि सरकारी बॉन्ड के मूल्यों में अचानक गिरावट वित्तीय परिस्थितियों को तेजी से सख्त बना सकती है। इससे मांग पर असर पड़ सकता है, महंगाई का आकलन कठिन हो सकता है और केंद्रीय बैंकों के लिए मौद्रिक नीति तय करना पहले से ज्यादा चुनौतीपूर्ण बन सकता है।
ऐसी स्थिति में बाजार को स्थिर रखने के लिए केंद्रीय बैंकों को हस्तक्षेप करना पड़ सकता है, जिसका प्रभाव वित्तीय अनुशासन और सरकारी वित्त दोनों पर पड़ने की आशंका बनी रहती है। कुल मिलाकर रिपोर्ट यह संकेत देती है कि एआई भविष्य की आर्थिक प्रगति का महत्वपूर्ण आधार बन सकती है, लेकिन इससे जुड़ा अत्यधिक उत्साह और असंतुलित निवेश आने वाले समय में वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए नई चुनौतियां भी खड़ी कर सकता है।
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