Explainer: अफ्रीकी देश कांगो में इबोला का प्रकोप क्यों होता जा रहा और खतरनाक?
Explainer: अफ्रीकी देश डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो (DRC) में इनदिनों इबोला का प्रकोप काफी तेज से फैल रहा है. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक, संक्रमण अब देश में दर्ज सबसे बड़े प्रकोपों में दूसरे स्थान पर पहुंच गया है. स्वास्थ्य अधिकारियों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि अगर संक्रमण की मौजूदा रफ्तार नहीं थमी, तो मृतकों की संख्या पुराने रिकॉर्ड के करीब पहुंच सकती है. जिससे हालात और बिगड़ सकते हैं.
कांगो में अब तक 2000 से ज्यादा लोगों की मौत
डब्ल्यूएचओ के महानिदेशक टेड्रोस एडनॉम घेब्रेयेसस के मुताबिक, कांगो के पांच प्रांतों और 53 स्वास्थ्य क्षेत्रों में अब तक इबोला के 4,449 मामलों की पुष्टि हुई है, जबकि 2,061 लोगों की मौत हो चुकी है. यानी सामने आए मामलों में मृत्यु दर करीब 46 प्रतिशत है.
- यह आंकड़ा 2018 से 2020 के बीच DRC में फैले इबोला प्रकोप के दौरान हुई 2,299 मौतों के बेहद करीब है. WHO का कहना है कि मामलों में हुई अचानक बढ़ोतरी का एक हिस्सा बेहतर जांच और पहले से लंबित मामलों को रिकॉर्ड में शामिल किए जाने से जुड़ा है. हालांकि, संक्रमण के वास्तविक फैलाव में भी तेज वृद्धि देखी जा रही है.
- दुनिया में अब तक का सबसे बड़ा इबोला प्रकोप 2014 से 2016 के बीच पश्चिम अफ्रीका में हुआ था. उस दौरान 28,600 से अधिक मामले सामने आए और 11,325 लोगों की जान गई. WHO ने चेतावनी दी है कि अगर DRC में संक्रमण इसी गति से बढ़ता रहा, तो यह पुराने रिकॉर्ड को भी चुनौती दे सकता है.
इतनी तेजी से क्यों फैल रहा संक्रमण?
बता दें कि कांगो में मौजूदा इबोला प्रकोप की आधिकारिक घोषणा 15 मई को हुई थी, लेकिन जेनेटिक जांच से संकेत मिला कि वायरस का प्रसार फरवरी से ही शुरू हो गया था. शुरुआत में कई मरीजों के लक्षणों को मलेरिया या टाइफाइड से जोड़कर देखा गया.
- बुखार, कमजोरी और शरीर में दर्द जैसी शुरुआती शिकायतें इन बीमारियों में भी आम हैं. इसके अलावा, शुरुआती जांच में इस्तेमाल किए गए कुछ टेस्ट इस विशेष वायरस को तुरंत पहचान नहीं पाए, जिससे संक्रमण की पहचान में देरी हुई.
- इस बार संक्रमण बुंडीबुग्यो वायरस के कारण हो रहा है, जो इबोला वायरस का अपेक्षाकृत दुर्लभ प्रकार है. वैज्ञानिकों के मुताबिक, इस प्रकोप में मिला वायरस 2007 और 2012 में सामने आए बुंडीबुग्यो वायरस के नमूनों से आनुवंशिक रूप से अलग है.
- इससे संभावना जताई जा रही है कि वायरस पहले किसी संक्रमित जानवर से इंसान में आया और इसके बाद इंसानों के बीच फैलता चला गया.
हवा के जरिए नहीं फैसला इबोला
बता दें कि इबोला का वायरस हवा के जरिए नहीं फैलता. आम तौर पर संक्रमण संक्रमित व्यक्ति के खून, लार या शरीर के दूसरे तरल पदार्थों के संपर्क में आने से होता है.
- संक्रमित वस्तुओं, जैसे कपड़े और बिस्तर के संपर्क से भी संक्रमण फैल सकता है. गंभीर रूप से बीमार मरीजों की देखभाल और शवों के संपर्क में आने के दौरान जोखिम काफी बढ़ जाता है.
- इसी वजह से मरीज की जल्द पहचान, उसे अलग रखना, समय पर इलाज देना और सुरक्षित तरीके से अंतिम संस्कार करना संक्रमण की कड़ी तोड़ने के लिए बेहद जरूरी है.
- लेकिन मौजूदा हालात में कई संक्रमित लोग अस्पताल या उपचार केंद्र तक पहुंचने से पहले ही घर या समुदाय में दम तोड़ रहे हैं.
- इसके अलावा, नए मरीजों में ऐसे लोगों की संख्या भी सामने आ रही है जिनका नाम पहले से कॉन्टैक्ट लिस्ट में नहीं था. यह संकेत देता है कि संक्रमण की कई कड़ियां अभी स्वास्थ्य अधिकारियों की निगरानी से बाहर हैं.
हालात पर काबू पाना क्यों है मुश्किल?
कांगो में संक्रमण का सबसे बड़ा हिस्सा इतुरी प्रांत में सामने आया है. यह क्षेत्र लंबे समय से सशस्त्र संघर्ष, विस्थापन और खराब बुनियादी ढांचे जैसी समस्याओं से जूझ रहा है. कई इलाकों में राहत और स्वास्थ्य टीमों का पहुंचना मुश्किल है, जबकि कुछ जगहों पर सुरक्षा संबंधी खतरे भी मौजूद हैं.
- स्वास्थ्य केंद्रों पर मरीजों की बढ़ती संख्या के मुकाबले सुविधाएं सीमित हैं. बेड और जरूरी मेडिकल सामान की कमी के साथ-साथ अफवाहों और गलत सूचनाओं के कारण कुछ लोग इलाज केंद्रों में जाने से भी बच रहे हैं.
- स्वास्थ्य कर्मियों की स्थिति ने भी चुनौती बढ़ा दी है. वेतन से जुड़ी समस्याओं के कारण कुछ कर्मचारियों की हड़ताल ने इलाज, निगरानी और कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग जैसी गतिविधियों को प्रभावित किया है.
- WHO और अफ्रीका CDC के आंकड़ों के अनुसार, 4 अगस्त तक पड़ोसी नॉर्थ किवु प्रांत के उपचार केंद्रों में उनकी क्षमता से लगभग 139 प्रतिशत अधिक मरीज मौजूद थे.
संपर्क में आए व्यक्तियों की हो रही निगरानी
कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग में भी अपेक्षित स्तर हासिल नहीं हुआ है. WHO के मुताबिक, सूची में दर्ज करीब 80 प्रतिशत संपर्कों की निगरानी की जा रही थी, जबकि संक्रमण की छिपी हुई कड़ियों को प्रभावी ढंग से पकड़ने के लिए लगभग 95 प्रतिशत कवरेज जरूरी माना जाता है. फंडिंग की कमी भी बड़ी बाधा है. WHO ने क्षेत्रीय प्रतिक्रिया योजना के लिए 518 मिलियन डॉलर की जरूरत बताई थी, लेकिन अब तक करीब 264 मिलियन डॉलर ही उपलब्ध हो पाए हैं.
क्या वैक्सीन से मिल सकती है राहत?
बता दें कि बुंडीबुग्यो वायरस के खिलाफ फिलहाल कोई स्वीकृत वैक्सीन या विशेष दवा उपलब्ध नहीं है. मरीजों को मुख्य रूप से सहायक उपचार दिया जाता है, जिसमें शरीर में तरल पदार्थ की कमी पूरी करना और बुखार व दर्द जैसे लक्षणों को नियंत्रित करना शामिल है. WHO के मुताबिक, बीते बुधवार तक 886 मरीज स्वस्थ हो चुके थे.
- हालांकि, पहली बार बुंडीबुग्यो वायरस को ध्यान में रखकर विकसित की गई दो वैक्सीन के शुरुआती मानव परीक्षण शुरू किए गए हैं. इससे पहले जानवरों पर किए गए परीक्षणों में उत्साहजनक परिणाम मिले थे.
- वैज्ञानिक यह भी जांच रहे हैं कि आमतौर पर इस्तेमाल होने वाली ज़ैरे इबोला वायरस की वैक्सीन बुंडीबुग्यो संक्रमण से कितनी सुरक्षा दे सकती है. इसके साथ ही संभावित उपचारों पर भी शोध चल रहा है, लेकिन अभी तक किसी दवा को इस वायरस के खिलाफ प्रभावी साबित नहीं किया गया है.
- WHO ने आने वाले 12 हफ्तों में उपचार क्षमता को तीन गुना बढ़ाकर करीब 3,000 बेड करने का लक्ष्य रखा है. इसके लिए बड़ी संख्या में अतिरिक्त स्वास्थ्य कर्मियों की जरूरत होगी. संगठन के मुताबिक, 21,000 से अधिक सामुदायिक स्वास्थ्य कर्मियों को पहले ही प्रशिक्षित किया जा चुका है.
क्या इबोला को रोका जा सकता है?
पड़ोसी देश युगांडा का हालिया अनुभव बताता है कि तेज और संगठित प्रतिक्रिया से संक्रमण पर नियंत्रण पाया जा सकता है. वहां 20 संक्रमित मरीजों और दो मौतों के बाद 28 जुलाई को स्थानीय स्तर पर वायरस के प्रसार को खत्म करने की घोषणा की गई थी.
- हालांकि DRC में जारी संक्रमण के कारण युगांडा समेत आसपास के देशों में वायरस के दोबारा पहुंचने का खतरा बना हुआ है. सीमा पार आवाजाही के चलते संक्रमित व्यक्ति के दूसरे देश में पहुंचने की आशंका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.
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- WHO के हेल्थ इमरजेंसी अलर्ट और रिस्पॉन्स ऑपरेशन्स के निदेशक अब्दिरहमान महामुद के अनुसार, सामान्य परिस्थितियों में किसी ऐसे प्रकोप का चरम करीब छह महीने में आ सकता है. लेकिन अगर स्थिति और बिगड़ती है, तो संक्रमण का दौर नौ महीने से लेकर एक साल तक चल सकता है.
- फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती यही है कि स्वास्थ्य व्यवस्था संक्रमण की रफ्तार से आगे निकल पाए. बेहतर जांच, तेजी से कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग, पर्याप्त उपचार केंद्र, प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी और स्थानीय समुदायों का भरोसा—इन सभी मोर्चों पर एक साथ काम करना ही इस प्रकोप को और घातक बनने से रोकने की कुंजी हो सकता है.
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