Bhakt Dhruv Katha: पौराणिक कथाओं के अनुसार, राजा उत्तानपाद के पुत्र ध्रुव को उनकी सौतेली माँ ने गोद से उतार दिया था, क्योंकि वे राजा की गोद में बैठने की जिद कर रहे थे। अपमानित होकर बालक ध्रुव रोते हुए अपनी माता सुनीति के पास गए। माता ने उन्हें सांसारिक दुखों से ऊपर उठकर भगवान विष्णु की शरण में जाने का मार्ग बताया। बस, उसी पल 5 साल के मासूम ध्रुव ने ठान लिया कि वे ऐसे स्थान को प्राप्त करेंगे जहाँ से उन्हें कोई कभी न हटा सके।
मधुवन की कठोर तपस्या कहा जाता है कि ध्रुव बिना कुछ खाए-पिए घने जंगल (मधुवन) में जाकर तपस्या करने लगे। पहले महीने उन्होंने केवल फल-फूल खाए, फिर जल और अंत में केवल वायु का सेवन करते हुए 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का जाप किया। ध्रुव का संकल्प इतना गहरा था कि उनके तप से तीनों लोक डगमगा उठे। देवताओं को भी चिंता होने लगी कि क्या यह बालक अपना शरीर त्याग देगा।
जब भगवान को आना पड़ा ध्रुव के पास ध्रुव की अटूट भक्ति देखकर स्वयं भगवान विष्णु को साक्षात प्रकट होना पड़ा। भगवान ने बालक के सम्मुख आकर कहा, "तुम्हारी तपस्या से मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ।" भगवान ने न केवल उन्हें राजपाट का वरदान दिया, बल्कि यह भी कहा कि वे मृत्यु के बाद आकाश में 'ध्रुव तारे' के रूप में हमेशा चमकते रहेंगे। आज हजारों साल बाद भी ध्रुव तारा अपनी जगह पर स्थिर है, जो बालक के दृढ़ संकल्प की गवाही देता है।
क्या है इस कथा का संदेश? ध्रुव की यह गाथा सिखाती है कि आयु मायने नहीं रखती, मायने रखता है तो बस 'संकल्प'। अगर इंसान अपने मन में ठान ले कि उसे अपने लक्ष्य को पाना है, तो ब्रह्मांड की कोई भी शक्ति उसे रोक नहीं सकती। ध्रुव का 'तारा' आज भी हमें याद दिलाता है कि जो अपने लक्ष्य पर स्थिर रहता है, दुनिया उसे ही याद रखती है।
डिसक्लेमर (Disclaimer): यह लेख पौराणिक कथाओं और प्रचलित मान्यताओं पर आधारित है। हमारा उद्देश्य केवल संस्कृति और धर्म से जुड़ी जानकारी साझा करना है। पाठक इसे केवल ज्ञानवर्धक उद्देश्यों के लिए पढ़ें।
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