A PHP Error was encountered
Severity: Warning
Message: Attempt to read property "title" on null
Filename: front/post_detail.php
Line Number: 30
Backtrace:
File: /home/ezenews/htdocs/www.ezenews.in/public/application/views/front/post_detail.php
Line: 30
Function: _error_handler
File: /home/ezenews/htdocs/www.ezenews.in/public/application/controllers/Web.php
Line: 161
Function: view
File: /home/ezenews/htdocs/www.ezenews.in/public/application/controllers/Web.php
Line: 296
Function: show_page
File: /home/ezenews/htdocs/www.ezenews.in/public/index.php
Line: 319
Function: require_once
" onclick="javascript:window.open(this.href, '', 'menubar=no,toolbar=no,resizable=yes,scrollbars=yes,height=300,width=600');return false;"
target="_blank" title="Share on Facebook" class="float-right">
A PHP Error was encountered
Severity: Warning
Message: Attempt to read property "description" on null
Filename: front/post_detail.php
Line Number: 45
Backtrace:
File: /home/ezenews/htdocs/www.ezenews.in/public/application/views/front/post_detail.php
Line: 45
Function: _error_handler
File: /home/ezenews/htdocs/www.ezenews.in/public/application/controllers/Web.php
Line: 161
Function: view
File: /home/ezenews/htdocs/www.ezenews.in/public/application/controllers/Web.php
Line: 296
Function: show_page
File: /home/ezenews/htdocs/www.ezenews.in/public/index.php
Line: 319
Function: require_once
किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसकी युवा पीढ़ी के सपनों, ऊर्जा और सृजनशीलता पर निर्भर करता है लेकिन जब यही युवा पीढ़ी नशे की गिरफ्त में आने लगे तो यह केवल एक सामाजिक समस्या नहीं रह जाती बल्कि राष्ट्रीय संकट का रूप धारण कर लेती है। आज भारत सहित दुनिया के अनेक देशों के सामने यही चुनौती खड़ी है। युवाओं की प्रतिभा, उनकी सोच, उनकी रचनात्मकता और उनके भविष्य पर नशे का ऐसा ग्रहण लग रहा है, जो न केवल परिवारों को बल्कि पूरे समाज और राष्ट्र को भीतर से खोखला कर रहा है। इसी गंभीर चुनौती के प्रति वैश्विक जागरूकता पैदा करने के उद्देश्य से प्रतिवर्ष 26 जून को ‘अंतर्राष्ट्रीय नशा एवं मादक पदार्थ निषेध दिवस’ मनाया जाता है। यह दिवस केवल औपचारिक आयोजन नहीं बल्कि पूरी मानवता को चेताने का अवसर है कि यदि नशे के बढ़ते दुष्चक्र को समय रहते नहीं रोका गया तो इसके परिणाम आने वाली पीढ़ियों को भी भुगतने पड़ेंगे।
भारत में नशे की समस्या अब महानगरों तक सीमित नहीं रही। यह गांवों, कस्बों, छोटे शहरों और यहां तक कि स्कूलों तथा कॉलेजों तक पहुंच चुकी है। कभी माना जाता था कि नशीले पदार्थों का सेवन केवल संपन्न वर्ग या शहरी संस्कृति की समस्या है लेकिन आज वास्तविकता इससे कहीं अधिक भयावह है। ग्रामीण क्षेत्रों में भी अफीम, चरस, गांजा, हेरोइन, सिंथेटिक ड्रग्स और इंजेक्शन के माध्यम से लिए जाने वाले नशीले पदार्थों का प्रचलन तेजी से बढ़ रहा है। यह स्थिति बताती है कि नशे का नेटवर्क अब समाज की हर परत तक पहुंच चुका है। आज का युवा अनेक प्रकार के दबावों से घिरा हुआ है। प्रतिस्पर्धा, बेरोजगारी, सामाजिक अपेक्षाएं, पारिवारिक तनाव, मानसिक अवसाद, अकेलापन और त्वरित सफलता की चाह उसे भीतर से कमजोर बना रही है। ऐसे में नशे के सौदागर युवाओं की इन्हीं कमजोरियों का फायदा उठाकर उन्हें अपने जाल में फंसा लेते हैं। कई बार मित्रों का दबाव, आधुनिक दिखने की चाह, रोमांच की तलाश या क्षणिक सुख का आकर्षण युवाओं को नशे की ओर धकेल देता है। शुरुआत अक्सर जिज्ञासा से होती है लेकिन धीरे-धीरे यही जिज्ञासा लत और फिर विनाश का कारण बन जाती है।
इंटरनेट और डिजिटल तकनीक ने जहां ज्ञान के नए द्वार खोले हैं, वहीं नशे के कारोबार को भी नए साधन उपलब्ध कराए हैं। सोशल मीडिया, एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग एप्स और डार्क वेब के माध्यम से मादक पदार्थों की खरीद-फरोख्त पहले से कहीं अधिक आसान हो गई है। अब नशे का सौदा किसी सुनसान गली तक सीमित नहीं बल्कि स्मार्टफोन की स्क्रीन तक पहुंच चुका है। यही कारण है कि कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में नशे की पहुंच चिंताजनक रूप से बढ़ती जा रही है। आज देश के अनेक प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में नशीले पदार्थों की उपलब्धता को लेकर समय-समय पर गंभीर सवाल उठते रहे हैं। यह विडंबना ही है कि जिन परिसरों में देश के भविष्य का निर्माण होना चाहिए, वहां कुछ युवा अपने भविष्य को स्वयं नष्ट करने की राह पर बढ़ रहे हैं। आधुनिकता और स्वतंत्रता की गलत व्याख्या ने भी इस समस्या को बढ़ाया है। कई युवाओं को यह भ्रम होता है कि नशा उन्हें अधिक आत्मविश्वासी, रचनात्मक और आधुनिक बनाता है, जबकि वास्तविकता इसके बिल्कुल विपरीत है। नशा व्यक्ति की सोचने-समझने की क्षमता को धीरे-धीरे समाप्त कर देता है। उसकी निर्णय लेने की शक्ति कमजोर हो जाती है, स्मरणशक्ति प्रभावित होती है, एकाग्रता घटती है और मानसिक संतुलन बिगड़ने लगता है। जो युवा अपने जीवन में बड़े सपने लेकर आगे बढ़ता है, वही नशे की गिरफ्त में आकर अपनी प्रतिभा और संभावनाओं को स्वयं नष्ट कर देता है। यही कारण है कि नशे को केवल स्वास्थ्य समस्या नहीं बल्कि मानव संसाधन के विनाश की समस्या माना जाता है।
नशीले पदार्थों का सबसे घातक प्रभाव यह है कि वे व्यक्ति को मानसिक और शारीरिक दोनों रूपों से गुलाम बना देते हैं। एक बार लत लग जाने पर व्यक्ति उसी प्रभाव को बनाए रखने के लिए लगातार अधिक मात्रा में नशा लेने लगता है। परिणामस्वरूप उसका शरीर कमजोर होने लगता है, भूख कम हो जाती है, वजन घटता है, आंखें लाल रहने लगती हैं, नींद प्रभावित होती है, चिड़चिड़ापन बढ़ता है और अवसाद की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। कई मामलों में व्यक्ति आत्मघाती प्रवृत्तियों का शिकार भी हो जाता है। इंजेक्शन के माध्यम से नशा करने वालों के सामने खतरा और भी गंभीर होता है। एक ही सुई के बार-बार उपयोग से एचआईवी, हेपेटाइटिस और अन्य संक्रमण फैलने की आशंका बढ़ जाती है। यही कारण है कि नशा केवल व्यक्ति को ही नहीं बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए भी गंभीर चुनौती बन जाता है।
नशे का अवैध व्यापार दुनिया के सबसे लाभकारी अपराधों में शामिल है। अरबों-खरबों रुपये का यह कारोबार अंतर्राष्ट्रीय तस्करी, आतंकवाद, संगठित अपराध और मनी लॉन्ड्रिंग जैसे अपराधों से गहराई से जुड़ा हुआ है। भारत की भौगोलिक स्थिति इसे गोल्डन क्रेसेंट और गोल्डन ट्रायंगल जैसे नशीले पदार्थों के प्रमुख उत्पादन क्षेत्रों के बीच महत्वपूर्ण मार्ग बनाती है। पाकिस्तान, अफगानिस्तान, म्यांमार और अन्य पड़ोसी क्षेत्रों से आने वाली तस्करी की खेपें भारत के लिए लगातार चुनौती बनी हुई हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि ड्रग्स का यह अवैध कारोबार अब अत्याधुनिक तकनीकों का उपयोग कर रहा है। ड्रोन, एन्क्रिप्टेड संचार माध्यम, फर्जी पहचान और डिजिटल भुगतान प्रणालियां तस्करों को नई ताकत प्रदान कर रही हैं। ऐसे में केवल पारंपरिक पुलिसिंग से इस समस्या पर नियंत्रण संभव नहीं है। इसके लिए तकनीकी, सामाजिक और कानूनी स्तर पर व्यापक रणनीति की आवश्यकता है।
भारत में हालांकि मादक पदार्थों की तस्करी और सेवन को रोकने के लिए कड़े कानून मौजूद हैं लेकिन कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन की चुनौती अभी भी बनी हुई है। नशे के खिलाफ लड़ाई केवल पुलिस, प्रशासन या सरकार की जिम्मेदारी नहीं हो सकती, यह समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। परिवारों को अपने बच्चों के साथ संवाद बढ़ाना होगा। शिक्षण संस्थानों को नशा विरोधी जागरूकता अभियान चलाने होंगे। धार्मिक और सामाजिक संगठनों को भी इस दिशा में सक्रिय भूमिका निभानी होगी। दरअसल नशे के खिलाफ सबसे प्रभावी हथियार जागरूकता, शिक्षा और सकारात्मक वातावरण है। यदि युवाओं को बेहतर शिक्षा, रोजगार, खेल, कला, संस्कृति और रचनात्मक गतिविधियों से जोड़ा जाए तो वे नशे जैसे विनाशकारी रास्तों से दूर रह सकते हैं। हमें युवाओं को केवल नशे के दुष्परिणाम बताने तक सीमित नहीं रहना चाहिए बल्कि उन्हें जीवन का सकारात्मक उद्देश्य भी देना होगा।
अंतर्राष्ट्रीय नशा एवं मादक पदार्थ निषेध दिवस हमें यही संदेश देता है कि नशे के खिलाफ लड़ाई किसी एक दिन का अभियान नहीं बल्कि सतत सामाजिक आंदोलन है। यदि भारत को विकसित राष्ट्र बनाना है तो सबसे पहले उसकी युवा शक्ति को नशे के अंधकार से मुक्त करना होगा। देश की युवा सोच पर लगा यह ग्रहण तभी हटेगा, जब सरकार, समाज, परिवार और स्वयं युवा मिलकर इस चुनौती का सामना करेंगे। आज आवश्यकता इस बात की है कि युवाओं के हाथों में नशे की पुड़िया नहीं, ज्ञान की पुस्तक हो; उनकी आंखों में नशे का धुंधलापन नहीं, सपनों की चमक हो; और उनकी सोच पर नशे का ग्रहण नहीं बल्कि राष्ट्र निर्माण का उज्ज्वल प्रकाश हो। यही नशा-मुक्त भारत की सबसे बड़ी आवश्यकता है और यही विकसित भारत की सबसे मजबूत नींव भी।
- योगेश कुमार गोयल
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं तथा नशे के दुष्प्रभावों पर 1993 में पुरस्कृत पुस्तक ‘मौत को खुला निमंत्रण’ लिख चुके हैं)
Continue reading on the app