सोने और चांदी में गिरावट का असर: गोल्ड ईटीएफ 2 प्रतिशत और सिल्वर ईटीएफ करीब 4 प्रतिशत लुढ़का
सोने और चांदी की कीमतों में गिरावट का असर गुरुवार को गोल्ड ईटीएफ (एक्सचेंज ट्रेडेड फंड) और सिल्वर ईटीएफ पर देखने को मिला और इनमें करीब 4 प्रतिशत तक की गिरावट आई.
सिल्वर ईटीएफ में करीब 4 फीसदी की बड़ी गिरावट
एनएसई डेटा के अनुसार, दिन के दौरान निप्पॉन इंडिया सिल्वर ईटीएफ (सिल्वर बीईईएस) 3.99 प्रतिशत गिरकर 202.58 रुपए, एसबीआई सिल्वर ईटीएफ 3.93 प्रतिशत घटकर 208.26 रुपए, एचडीएफसी सिल्वर ईटीएफ 4 प्रतिशत घटकर 200.39 रुपए और टाटा सिल्वर ईटीएफ 3.92 प्रतिशत घटकर 20 रुपए पर पहुंच गया.
गोल्ड ईटीएफ भी 2 प्रतिशत से ज्यादा टूटे
सोने से जुड़े ईटीएफ में भी गिरावट देखने को मिली है. निप्पॉन इंडिया गोल्ड ईटीएफ (गोल्डबीईईएस) 2.21 प्रतिशत घटकर 114.55 रुपए, आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल गोल्ड ईटीएफ 2.76 प्रतिशत घटकर 117.95 रुपए, एसबीआई गोल्ड ईटीएफ 2.8 प्रतिशत घटकर 118.17 रुपए और एचडीएफसी गोल्ड ईटीएफ 2.64 प्रतिशत घटकर 117.75 रुपए पर पहुंच गया है.
घरेलू बाजार में सोने के दामों में भारी कमी
इसके अतिरिक्त, सोने और चांदी की कीमतों में भी कमजोरी देखी जा रही है.
इंडिया बुलियन ज्वेलर्स एसोसिएशन (आईबीजेए) के मुताबिक, 24 कैरेट सोने का दाम 2,156 रुपए कम होकर 1,40,022 रुपए प्रति 10 ग्राम पर आ गया है, जो कि पहले 1,42,178 रुपए प्रति 10 ग्राम था.
22 कैरेट सोने की कीमत 1,30,235 रुपए प्रति 10 ग्राम से घटकर 1,28,260 रुपए प्रति 10 ग्राम हो गई है. 18 कैरेट सोने की कीमत कम होकर 1,05,017 रुपए प्रति 10 ग्राम गई है, जो कि पहले 1,06,634 रुपए प्रति 10 ग्राम थी.
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अंतरराष्ट्रीय बाजार का हाल और गिरावट की मुख्य वजह
अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने और चांदी में मिलाजुला कारोबार हो रहा है. खबर लिखे जाने तक कॉमेक्स पर सोना 0.06 प्रतिशत की मजबूती के साथ 4,010.32 डॉलर प्रति औंस और चांदी 0.94 प्रतिशत की कमजोरी के साथ 57.51 डॉलर प्रति औंस पर थी.
सोने और चांदी में गिरावट की वजह अमेरिकी फेड की ओर से ब्याज दर बढ़ाने के संकेत देना है. वहीं, डॉलर इडेक्स के 101 के पार निकलने ने इसे और तेज कर दिया है.
स्रोत--आईएएनएस
डिस्कलेमर- हेडिंग, सबहेड और समरी को छोड़कर पूरी स्टोरी न्यूज एजेंसी IANS की है.
Explainer: क्या आपको पता है फिल्मों के क्लाइमेक्स पहले कैसे शूट होते थे? जानिए VFX आने के बाद कितना बदल गया सिनेमा
Movies Climaxes Shot: जब भी हम किसी फिल्म का दमदार क्लाइमेक्स देखते हैं, तो अक्सर उसके एक्शन, धमाके, लड़ाई के सीन या फिर बड़े पैमाने पर दिखाई गई भीड़ देखकर हैरान रह जाते हैं. आज के दौर में दर्शकों के लिए ये सब आम बात हो गई है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि VFX (Visual Effects) और CGI (Computer Generated Imagery) के आने से पहले फिल्म निर्माता ऐसे सीन्स कैसे शूट करते थे?
आज जिस तरह कुछ क्लिक में आसमान में उड़ते सुपरहीरो, हजारों सैनिकों की सेना, विशाल महल या पूरी की पूरी काल्पनिक दुनिया स्क्रीन पर दिखाई जाती है, वैसा पहले मुमकिन नहीं था. उस दौर में फिल्ममेकर्स को हर सीन को रियल तरीके से तैयार करना पड़ता था, जिसमें समय, मेहनत और पैसा तीनों की बड़ी भूमिका होती थी. तो चलिए जानते हैं कि VFX तकनीक आने से पहले फिल्मों के क्लाइमेक्स कैसे शूट किए जाते थे और इस तकनीक ने सिनेमा को किस तरह बदलकर रख दिया.
जब सब कुछ असली बनाना पड़ता था
आज किसी फिल्म में हजारों लोगों की भीड़ दिखानी हो तो कंप्यूटर की मदद से कुछ सौ लोगों को हजारों में बदला जा सकता है. लेकिन 1980 और 1990 के दशक में ऐसा पॉसिबल नहीं था. उस समय फिल्म निर्माताओं को सच में बड़ी संख्या में जूनियर आर्टिस्ट बुलाने पड़ते थे. अगर किसी युद्ध के सीन में 5,000 सैनिक दिखाने होते थे तो हजारों लोगों को सेट पर लाया जाता था. उनके लिए कॉस्ट्यूम, मेकअप, खाना और सुरक्षा की व्यवस्था करनी पड़ती थी. इसी वजह से बड़े युद्ध या भीड़ वाले सीन शूट करना बेहद महंगा और चुनौतीपूर्ण काम माना जाता था.
क्लाइमेक्स शूट करने में लग जाते थे कई हफ्ते
पुरानी फिल्मों के क्लाइमेक्स अक्सर बड़े पैमाने पर शूट किए जाते थे. किसी किले, महल, फैक्ट्री या गोदाम में होने वाली फाइनल लड़ाई के लिए विशाल सेट तैयार किए जाते थे. एक्शन सीन में इस्तेमाल होने वाले विस्फोट, आग और टूट-फूट भी असली होती थी. अगर किसी इमारत को उड़ाने का सीन फिल्माना होता, तो उसका छोटा मॉडल बनाकर उसे वास्तविक एक्सप्लोजन के साथ शूट किया जाता था. कई बार एक क्लाइमेक्स को शूट करने में कई हफ्तों का समय लग जाता था. क्योंकि अगर कोई गलती हो जाती, तो पूरा सेट दोबारा तैयार करना पड़ता था.
मिनिएचर मॉडल्स का होता था इस्तेमाल
VFX से पहले फिल्मों में मिनिएचर मॉडल्स का खूब इस्तेमाल किया जाता था. ये तकनीक हॉलीवुड और बॉलीवुड दोनों में पॉपुलर थी. इसमें बड़े-बड़े जहाज, इमारतें, ट्रेनें या शहरों के छोटे मॉडल बनाए जाते थे. कैमरे के खास एंगल और लाइटिंग की मदद से इन्हें असली जैसा दिखाया जाता था. उदाहरण के तौर पर, अगर किसी शहर में भयंकर तबाही दिखानी होती, तो पूरा शहर बनाने की बजाय उसका छोटा मॉडल तैयार किया जाता और फिर उसे नष्ट करके फिल्माया जाता था. दर्शकों को स्क्रीन पर ये बिल्कुल रियल दिखाई देता था.
स्टंट कलाकारों पर निर्भर था सिनेमा
आज कई खतरनाक स्टंट VFX और वायर तकनीक की मदद से सुरक्षित तरीके से फिल्माए जाते हैं. लेकिन पहले ऐसा नहीं था. पुरानी फिल्मों में कलाकारों और स्टंटमैन को रियल में ऊंचाई से कूदना पड़ता था, तेज रफ्तार गाड़ियों का पीछा करना पड़ता था या आग के बीच से गुजरना पड़ता था. कई बार स्टंट शूट करते समय कलाकार और स्टंटमैन घायल भी हो जाते थे. इसलिए एक्शन फिल्मों का निर्माण काफी जोखिम भरा माना जाता था.
VFX ने कैसे बदल दिया पूरा खेल?
1990 के दशक के अंत और 2000 के दशक की शुरुआत में VFX तकनीक तेजी से विकसित हुई. इसके बाद फिल्म निर्माण की प्रक्रिया पूरी तरह बदल गई. अब फिल्ममेकर्स को हर चीज वास्तविक रूप से बनाने की जरूरत नहीं रही. कंप्यूटर की मदद से काल्पनिक दुनिया, बड़ी वॉर, खतरनाक जानवर और असंभव दिखने वाले सीन्स तैयार किए जाने लगे. आज एक ग्रीन स्क्रीन के सामने खड़ा कलाकार बाद में कंप्यूटर की मदद से किसी दूसरे ग्रह, महल या युद्धभूमि में दिखाई दे सकता है. यही वजह है कि मॉडर्न फिल्मों का स्केल पहले से कहीं ज्यादा बड़ा हो गया है.
बॉलीवुड में VFX का बढ़ता इस्तेमाल
भारतीय सिनेमा में भी VFX ने बड़ा बदलाव लाया है. पहले जहां फिल्मों में तकनीकी सीमाएं थीं, वहीं अब भारतीय फिल्में इंटरनेशनल स्तर के विजुअल इफेक्ट्स का इस्तेमाल कर रही हैं. 'रा.वन', 'कृष', 'बाहुबली', 'आरआरआर', 'ब्रह्मास्त्र' और 'कल्कि 2898 AD' जैसी फिल्मों ने दिखाया कि भारतीय फिल्म इंडस्ट्री भी बड़े स्तर पर VFX का इस्तेमाल कर सकता है. इन फिल्मों में विशाल युद्ध, काल्पनिक शहर, उड़ने वाले किरदार और दमदार एक्शन सीक्वेंस VFX की मदद से तैयार किए गए थे.
कम बजट में बड़े सीन संभव हुए
VFX का एक बड़ा फायदा ये भी है कि अब कई ऐसे सीन कम बजट में तैयार किए जा सकते हैं, जिनके लिए पहले करोड़ों रुपये खर्च करने पड़ते थे. उदाहरण के लिए हजारों लोगों की भीड़ दिखाने के लिए अब कुछ सौ कलाकारों को शूट करके डिजिटल तकनीक से उनकी संख्या बढ़ाई जा सकती है. इसी तरह बड़े महल, विदेशी लोकेशन या तबाही के सीन कंप्यूटर की मदद से तैयार किए जा सकते हैं. इससे फिल्म निर्माताओं का समय और बजट दोनों बचते हैं.
क्या VFX ने वास्तविकता को कम कर दिया?
हालांकि VFX के बढ़ते इस्तेमाल के साथ एक बहस भी शुरू हुई है. कई दर्शकों और फिल्म विशेषज्ञों का मानना है कि हद से ज्यादा VFX फिल्मों की वास्तविकता को कम कर देता है. जब हर चीज कंप्यूटर से बनाई जाती है तो कुछ सीन्स में भावनात्मक जुड़ाव और वास्तविकता की कमी महसूस हो सकती है. यही कारण है कि आज भी कई निर्देशक वास्तविक लोकेशन, असली सेट और प्रैक्टिकल इफेक्ट्स का इस्तेमाल करना पसंद करते हैं. उनका मानना है कि वास्तविक चीजों को कैमरे में कैद करने का प्रभाव अलग ही होता है.
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