शेयर बाजार में कारोबार के दौरान कुछ चुनिंदा कंपनियों के शेयर निवेशकों के बीच चर्चा का विषय बने रहे। विभिन्न कंपनियों से जुड़े महत्वपूर्ण कारोबारी फैसलों, हिस्सेदारी बिक्री, अधिग्रहण और नए समझौतों के कारण बाजार में इन शेयरों में उल्लेखनीय हलचल देखने को मिली है।
सबसे ज्यादा ध्यान भारतीय रेलवे वित्त निगम यानी आईआरएफसी पर रहा। मौजूद जानकारी के अनुसार भारत सरकार कंपनी में अपनी दो प्रतिशत हिस्सेदारी बेचने की तैयारी में है। इसके साथ ही अतिरिक्त एक प्रतिशत हिस्सेदारी बेचने का विकल्प भी रखा गया है। यह हिस्सेदारी बिक्री पेशकश के माध्यम से की जा रही है। इस घोषणा के बाद कंपनी के शेयरों में लगभग पांच प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि जब किसी कंपनी में बड़ी हिस्सेदारी बिक्री की घोषणा होती है तो अल्पकालिक दबाव देखने को मिल सकता है क्योंकि बाजार में अतिरिक्त शेयर उपलब्ध हो जाते हैं।
दूसरी ओर सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र की प्रमुख कंपनी इन्फोसिस के शेयरों में मजबूती देखने को मिली है। कंपनी ने वैश्विक अर्धचालक निर्माता ग्लोबलफाउंड्रीज के साथ अपने बहुवर्षीय सहयोग को और विस्तार देने की घोषणा की है। बता दें कि ग्लोबलफाउंड्रीज अर्धचालक निर्माण क्षेत्र की प्रमुख कंपनियों में गिनी जाती है। इस समझौते के तहत इन्फोसिस कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित प्रबंधित सेवाएं उपलब्ध कराएगी। इस सकारात्मक खबर के बाद कंपनी के शेयरों में करीब दो प्रतिशत तक की बढ़त दर्ज की गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल सेवाओं से जुड़े बड़े अनुबंध आने वाले समय में सूचना प्रौद्योगिकी कंपनियों की आय वृद्धि में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
गौरतलब है कि राशी पेरिफेरल्स भी निवेशकों के रडार पर रही। कंपनी ने वीडीए इन्फोसोल्यूशंस में 67 प्रतिशत हिस्सेदारी खरीदने के लिए अंतिम समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। इस सौदे का आकार लगभग 368.50 करोड़ रुपये बताया गया है। हालांकि यह अधिग्रहण कुछ निर्धारित शर्तों के पूरा होने के बाद ही प्रभावी होगा। बाजार ने इस कदम को कंपनी के विस्तार की दिशा में महत्वपूर्ण माना है, जिसके चलते शेयरों में लगभग दो प्रतिशत की तेजी आई और यह अपने 52 सप्ताह के उच्च स्तर तक पहुंच गया है।
वहीं वित्तीय प्रौद्योगिकी क्षेत्र की कंपनी पाइन लैब्स के शेयरों में भी तेजी देखने को मिली है। मौजूद जानकारी के अनुसार कंपनी के लगभग 41.9 लाख शेयर बड़े सौदों के जरिए खरीदे और बेचे गए हैं। इन शेयरों का कुल मूल्य करीब 63.5 करोड़ रुपये रहा है। प्रति शेयर मूल्य 152 रुपये के आसपास दर्ज किया गया। बड़े संस्थागत लेनदेन को बाजार आमतौर पर सकारात्मक संकेत के रूप में देखता है, जिसके चलते शेयरों में करीब तीन प्रतिशत की बढ़त दर्ज की गई है।
बता दें कि हाल के दिनों में बाजार की दिशा केवल व्यापक आर्थिक संकेतकों से ही नहीं बल्कि कंपनियों से जुड़ी विशिष्ट खबरों से भी प्रभावित हो रही है। नए समझौते, अधिग्रहण, हिस्सेदारी बिक्री और बड़े निवेश संबंधी फैसले निवेशकों की धारणा को प्रभावित कर रहे हैं। ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले कारोबारी सत्रों में भी कंपनी आधारित गतिविधियां बाजार की चाल तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रहेंगी और कई शेयरों में खबरों के आधार पर उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है।
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अमेरिका और भारत के बीच व्यापारिक संबंधों को लेकर एक नया खुलासा सामने आया है। एक नई पुस्तक में दावा किया गया है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत द्वारा अमेरिकी उत्पादों पर लगाए जाने वाले शुल्क संबंधी अपनी ही सरकार के आधिकारिक आंकड़ों को मानने से इनकार कर दिया था। ट्रंप का मानना था कि भारत अमेरिकी वस्तुओं पर कम से कम 175 प्रतिशत शुल्क लगाता है, जबकि अमेरिकी अधिकारियों के पास उपलब्ध आंकड़े इससे काफी कम थे।
बता दें कि यह दावा पत्रकार मैगी हैबरमैन और जोनाथन स्वान की पुस्तक ‘रेजीम चेंज: इनसाइड द इम्पीरियल प्रेसिडेंसी ऑफ डोनाल्ड ट्रंप’ में किया गया है। पुस्तक में ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के शुरुआती 14 महीनों की घटनाओं और प्रशासन के भीतर हुई चर्चाओं का विस्तार से उल्लेख किया गया है।
मौजूद जानकारी के अनुसार यह घटना उस समय की है जब ट्रंप प्रशासन अप्रैल 2025 में घोषित किए गए अपने बड़े व्यापारिक अभियान की तैयारी कर रहा था। इसी अभियान के तहत अमेरिका ने कई देशों पर जवाबी शुल्क लगाने की नीति अपनाई थी। पुस्तक में दावा किया गया है कि ट्रंप अपने अधिकारियों से चीन और भारत द्वारा अमेरिकी उत्पादों पर लगाए जाने वाले शुल्क के स्पष्ट आंकड़े मांग रहे थे।
बताया गया है कि अमेरिकी वाणिज्य सचिव हावर्ड लटनिक ने ट्रंप को अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय द्वारा तैयार किए गए आधिकारिक आंकड़े दिखाए। हालांकि ट्रंप इन आंकड़ों से संतुष्ट नहीं हुए और उन्होंने इन्हें गलत बताते हुए खारिज कर दिया। पुस्तक के अनुसार ट्रंप बार-बार यह कहते रहे कि भारत अमेरिकी उत्पादों पर वास्तविकता में कहीं अधिक शुल्क लगाता है।
गौरतलब है कि अमेरिका लंबे समय से भारत के शुल्क ढांचे और अन्य व्यापारिक बाधाओं को लेकर चिंता जताता रहा है। अमेरिकी प्रशासन का तर्क रहा है कि भारत कृषि उत्पादों, वाहनों और कुछ अन्य वस्तुओं पर अपेक्षाकृत अधिक शुल्क लगाता है। व्हाइट हाउस की एक जानकारी के अनुसार भारत में कुछ कृषि उत्पादों पर औसत शुल्क 37 प्रतिशत तक पहुंचता है, जबकि कुछ वाहनों पर यह 100 प्रतिशत से भी अधिक बताया गया था।
ट्रंप के वरिष्ठ व्यापार सलाहकार पीटर नवारो ने भी एक समय भारत को शुल्कों का "महाराजा" बताया था। उन्होंने अमेरिका द्वारा अपनाई गई सख्त व्यापारिक नीति का बचाव करते हुए कहा था कि भारतीय बाजार में अमेरिकी उत्पादों के लिए कई तरह की बाधाएं मौजूद हैं।
बता दें कि अप्रैल 2025 में ट्रंप प्रशासन ने भारत पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क लगाया था। इसके बाद अगस्त 2025 में रूस से कच्चे तेल की खरीद जारी रखने के मुद्दे पर भारत पर 25 प्रतिशत और शुल्क लगा दिया गया। इससे कई भारतीय उत्पादों पर कुल अमेरिकी शुल्क 50 प्रतिशत तक पहुंच गया था।
इन फैसलों के बाद दोनों देशों के बीच व्यापारिक बातचीत प्रभावित हुई थी। साथ ही भारत और पाकिस्तान के बीच संभावित संघर्ष को रोकने को लेकर ट्रंप के दावों ने भी दोनों देशों के संबंधों में अतिरिक्त तनाव पैदा किया था, जिसे भारत ने स्वीकार नहीं किया था।
हालांकि कई महीनों की बातचीत और मतभेदों के बाद फरवरी 2026 में भारत और अमेरिका ने एक अंतरिम व्यापारिक ढांचे पर सहमति बनाई। इस व्यवस्था के तहत अमेरिका ने भारतीय वस्तुओं पर लगाए गए 25 प्रतिशत जवाबी शुल्क को घटाकर 18 प्रतिशत करने पर सहमति जताई। वहीं रूस से तेल खरीद को लेकर लगाया गया अतिरिक्त 25 प्रतिशत शुल्क भी हटा दिया गया।
इसके बदले भारत ने कई अमेरिकी औद्योगिक और कृषि उत्पादों पर शुल्क कम करने या समाप्त करने का प्रस्ताव दिया। विशेषज्ञों का मानना है कि यह समझौता दोनों देशों के बीच व्यापारिक रिश्तों को फिर से सामान्य बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
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