देश की उत्तर पूर्वी बेल्ट एक ऐसी जगह है जहां हम घूमने जाने का प्लान बनाते हैं। कसैली सच्चाई ये है कि इन घूमने जाने के प्लान के अलावा हमारी बातों में, हमारी जिक्रों में, फिक्रों में शामिल नहीं रहता। असम को अगर पूर्वोत्तर की आत्मा कहा जाता है तो मणिपुर को मुकुट कहते हैं। दोनों राज्यों के जनादेश का असर सेवन सिस्टर्स के शेष पांच राज्यों पर भी पड़ता है। भारत के उत्तर पूर्व में सात राज्यों अरूणाचंल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड एवं त्रिपुरा को सात बहनें या सेवन सिस्टर्स कहा जाता है वैसे तो सिक्कम राज्य भी पूर्वात्तर में ही है लेकिन जव सेवन सिस्टर्स का गठन हुआ था तव वह भारत का हिस्सा नहीं था। सिक्कम भारत में बाद में शामिल हुआ। उत्तर पूर्व के इन राज्यों की एक दुसरे की निर्भरता के कारण ज्योति प्रकाश साक़िया ने सात बहनों की भूमि का नाम दिया था। पश्चिम बंगाल में सिलीगुड़ी कॉरिडोर, 21 से 40 किमी की चौड़ाई के साथ, उत्तर पूर्वी क्षेत्र को भारत की मुख्य भूमि से जोड़ता है और भारत के लिए महत्वपूर्ण है। यह क्षेत्र पड़ोसी देशों के साथ 5,182 किमी, उत्तर में तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र के साथ 1,395 किमी, पूर्व में म्यांमार के साथ 1,643 किमी, दक्षिण-पश्चिम में बांग्लादेश के साथ 1,596 किमी, नेपाल के साथ 97 किमी की अंतर्राष्ट्रीय सीमा साझा करता है। पश्चिम में और उत्तर-पश्चिम में भूटान के साथ 455 किमी। इसमें 262,230 वर्ग किमी का क्षेत्र शामिल है, जो भारत का लगभग 8 प्रतिशत है। इन राज्यों को देश के बाकी हिस्सों से जो अलग करता है वह विभिन्न ऐतिहासिक पृष्ठभूमि वाले विविध जातीय समूहों के साथ संवेदनशील भू-राजनीतिक स्थान है। समग्र रूप से उत्तर पूर्व एक समान राजनीतिक पहचान वाली एक इकाई नहीं है। इसके बजाय, इसमें कई अन्य जनजातियाँ शामिल हैं, जिनमें से प्रत्येक अपने राजनीतिक भविष्य की दृष्टि के साथ हैं। भारत का पूर्वोत्तर क्षेत्र उपमहाद्वीप के लिए अपने इलाके, स्थान और विशिष्ट जनसांख्यिकीय गतिशीलता के कारण अत्यधिक भू-राजनीतिक महत्व रखता है। यह शासन करने के लिए सबसे चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में से एक है और दक्षिण पूर्व एशिया का प्रवेश द्वार है क्योंकि इसकी सीमा बांग्लादेश, भूटान, म्यांमार, नेपाल और चीन से लगती है। पूर्वोत्तर भारत में जनजातीय समुदाय तीन महान राजनीतिक समुदायों, भारत, चीन और बर्मा के हाशिये पर रहते हैं। उनमें से कुछ ने बफर समुदायों की भूमिका निभाई।
अगर चीन, बांग्लादेश और म्यांमार से एक साथ दबाव बने तो?
यह सिर्फ एक काल्पनिक सवाल नहीं, बल्कि भारतीय रणनीतिकारों के लिए एक वास्तविक सुरक्षा परिदृश्य है। भारत की पूर्वी सीमाओं पर तीन अलग-अलग चुनौतियां मौजूद हैं—उत्तर में चीन, दक्षिण में बांग्लादेश और पूर्व में म्यांमार। अगर किसी बड़े क्षेत्रीय संकट के दौरान इन तीनों दिशाओं से एक साथ दबाव बनता है, तो सबसे अधिक संवेदनशील क्षेत्र होगा सिलिगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक), जो पूरे पूर्वोत्तर भारत को देश के बाकी हिस्से से जोड़ता है। चीन अरुणाचल और डोकलाम क्षेत्र में सैन्य दबाव बढ़ा सकता है, म्यांमार सीमा पर अस्थिरता और उग्रवादी गतिविधियां बढ़ सकती हैं, जबकि बांग्लादेश से जुड़ी सीमा पर सुरक्षा और अवैध घुसपैठ की चुनौतियां सामने आ सकती हैं। हालांकि वर्तमान में भारत और बांग्लादेश के संबंध सहयोगपूर्ण हैं, लेकिन सुरक्षा योजनाएं हमेशा सबसे खराब स्थिति को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं। भारत ने इसी कारण पूर्वोत्तर में सड़क, रेल, एयरबेस, ब्रह्मोस मिसाइल तैनाती और सीमा अवसंरचना पर तेजी से काम किया है। लक्ष्य यह है कि किसी भी बहु-मोर्चीय दबाव की स्थिति में पूर्वोत्तर भारत की कनेक्टिविटी और सुरक्षा बनी रहे।
पूर्वोत्तर का आर्थिक और रणनीतिक महत्व
प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने पूर्वोत्तर को भारत का 'अष्ट लक्ष्मी' (आठ राज्यों के संदर्भ में समृद्धि के आठ रूप) कहा है। बुनियादी ढांचे के विकास (जैसे रेलवे, नए हवाई अड्डे, और नेशनल हाइवे) ने इस क्षेत्र की दूरी को कम किया है। संक्षेप में कहें तो, पूर्वोत्तर भारत की सुरक्षा के लिए एक मजबूत ढाल भी है और देश के आर्थिक भविष्य की एक नई खिड़की भी। असम भारत के सबसे पुराने तेल उत्पादक राज्यों में से एक है (डिगबोई)। इसके अलावा, यहां प्राकृतिक गैस, कोयला, चूना पत्थर (Limestone) और भारी मात्रा में वन संपदा (बांस, लकड़ी) मौजूद है। भारत सरकार इसे "बांस अर्थव्यवस्था" (Bamboo Economy) के रूप में भी विकसित कर रही है। अपनी अनूठी संस्कृति, जैव-विविधता (Biodiversity), काजीरंगा और मानस जैसे राष्ट्रीय उद्यानों के कारण यह क्षेत्र पर्यटन का एक बड़ा केंद्र है। इको-टूरिज्म यहां के स्थानीय रोजगार को बढ़ावा दे रहा है। दक्षिण-पूर्व एशिया (ASEAN) के साथ व्यापार बढ़ाने के लिए कालादान मल्टी-मोडल ट्रांजिट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट (जो कोलकाता को म्यांमार के सितवे बंदरगाह और वहां से मिजोरम से जोड़ता है) गेम-चेंजर साबित हो रहा है। इस क्षेत्र की सीमाएं पांच देशों—चीन, म्यांमार, बांग्लादेश, भूटान और नेपाल से मिलती हैं। भारत की बाहरी सुरक्षा और पड़ोसी देशों के साथ संबंधों के लिहाज से यह बेहद संवेदनशील है। चीन अरुणाचल प्रदेश पर अपना दावा ठोकता रहता है। भारत के लिए पूर्वोत्तर में मजबूत सैन्य बुनियादी ढांचा (जैसे बोगीबील पुल, उन्नत लैंडिंग ग्राउंड्स) बनाए रखना चीन की विस्तारवादी नीति को रोकने के लिए आवश्यक है।
2047 तक भारत की पूर्वी सुरक्षा रणनीति
भारत के दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों (ASEAN) के साथ कूटनीतिक और व्यापारिक संबंधों को मजबूत करने के लिए पूर्वोत्तर ही एकमात्र जमीनी मार्ग है। म्यांमार और थाईलैंड को जोड़ने वाला त्रिपक्षीय राजमार्ग इसका बड़ा उदाहरण है। अतीत में यह क्षेत्र उग्रवाद और अलगाववाद से प्रभावित रहा है। म्यांमार और बांग्लादेश की सीमाओं पर चौकसी और वहां की सरकारों के साथ सहयोग भारत की आंतरिक शांति के लिए महत्वपूर्ण है।
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आज की कहानी एक ऐसे देश की है जहां डेमोक्रेसी को गोलियों से उड़ा दिया गया। जहां सिविलियंस प्रोटेस्ट करते रहे और मिलिट्री उन्हें टैंक से कुचलती रही। ये देश है म्यांमार। लेकिन यह सिर्फ एक इंटरनल फाइट नहीं है। इसके पीछे छुपी है एक डेंजरस ग्लोबल पावर गेम। अमेरिका, चीन, रूस, भारत और बांग्लादेश। सबका अपना-अपना एजेंडा है। आज हम सिर्फ म्यांमार के बारे में नहीं पूरी साउथ एशिया की जिओपॉलिटिक्स को डिकोड करेंगे।म्यांमार जिसको पहले बर्मा कहते थे। साउथ ईस्ट एशिया में इंडिया का एक इंपॉर्टेंट बॉर्डरिंग कंट्री है। यह देश 100 से ज्यादा एथनिक ग्रुप से भरा हुआ है। डिकेड्स तक मिलिट्री रूल था। फिर 2015 में लोगों ने डेमोक्रेसी का टेस्ट चखा। आंग सांगस सुकी की पार्टी नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी जीती। उम्मीद थी की बदलानव आएगा। लेकिन 2021 में जब उनकी पार्टी फिर से जीती तो मिलिट्री ने रिजल्ट को झूठा बता दिया और तख्तापलट कर दिया जिसमें यह माना जा रहा है कि चीन ने इसको सपोर्ट किया है। आंग सु की को जेल भेज दिया गया और पूरे देश में सिविल वॉर फूट पड़ा। तब से ले आज तक म्यांमार में सिविल वॉर चल रहा है। म्यांमार में जो कुछ आज हो रहा है वो नया नहीं है। उसका इतिहास पुराना है। और यह सब म्यांमार के ब्रिटिश से इंडिपेंडेंट होने के साथ शुरू होता है। जब म्यांमार को आजादी मिली थी 4 जनवरी 1948 को तब देश एक नहीं था बल्कि 100 से ज्यादा एथेनिक ग्रुप्स का संघ था। मेजॉरिटी थी बर्मन या बामर कम्युनिटी की। लेकिन करेन, शान, कचिन, चिन जैसे ग्रुप्स भी अपने लिए हक मांग रहे थे। यह ग्रुप्स चाहते थे कि उनको अपना एरिया मैनेज करने का अधिकार मिले। अपनी लैंग्वेज, अपना कल्चर, अपना गवर्नेंस। लेकिन सेंट्रल गवर्नमेंट ने सारा पावर बर्मन लेड सिस्टम के पास रख दिया और इस तरह से सिविल वॉर की शुरुआत हो गई। अब देखते हैं 1962 का टाइम। 1962 में पहला मिलिट्री को होता है। जनरल नेविन ने बोला कि डेमोक्रेसी बर्बादी है। देश को बचाना होगा और 1962 में मिलिट्री ने कंट्रोल अपने हाथ में ले लिया। जैसा कि हर तानाशाह करता है।
मणिपुर संकट और सीमा
मणिपुर में पिछले कुछ वर्षों में जो हिंसा और अस्थिरता देखने को मिली, उसने एक बार फिर भारत-म्यांमार सीमा की संवेदनशीलता को चर्चा के केंद्र में ला दिया। मणिपुर की लगभग 400 किलोमीटर लंबी सीमा म्यांमार से लगती है, जहां 2021 के सैन्य तख्तापलट के बाद गृहयुद्ध जैसी स्थिति बनी हुई है। इसी कारण बड़ी संख्या में शरणार्थी, हथियार और उग्रवादी गतिविधियों की आशंकाएं बढ़ीं। भारत और म्यांमार के बीच लंबे समय तक Free Movement Regime (FMR) लागू था, जिसके तहत सीमा के दोनों ओर रहने वाले समुदाय बिना वीजा सीमित दूरी तक आ-जा सकते थे। लेकिन सुरक्षा चिंताओं के चलते भारत ने इस व्यवस्था की समीक्षा शुरू की और सीमा पर फेंसिंग की योजना को आगे बढ़ाया। मणिपुर संकट ने यह सवाल भी खड़ा किया कि क्या सीमा पार की अस्थिरता भारत के आंतरिक सामाजिक और सुरक्षा समीकरणों को प्रभावित कर सकती है। म्यांमार में सक्रिय कई सशस्त्र समूहों, ड्रग्स तस्करी और हथियारों के नेटवर्क को लेकर सुरक्षा एजेंसियां लगातार सतर्क रही हैं।
फ्री मूवमेंट रिजीम क्या है
भारत और म्यांमार के बीच एक विशेष व्यवस्था थी, जिसके तहत सीमा के दोनों ओर रहने वाले पारंपरिक जनजातीय समुदाय बिना वीजा एक निश्चित दूरी तक एक-दूसरे के क्षेत्र में आ-जा सकते थे। भारत-म्यांमार सीमा को ब्रिटिश काल में खींचा गया था। इससे कई जनजातियां जैसे नागा, कुकी, चिन, मिजो आदि दो देशों में बंट गईं। उनके पारिवारिक, सांस्कृतिक और व्यापारिक संबंध बने रहे। इन्हीं रिश्तों को ध्यान में रखकर FMR लागू किया गया था। 2024 में भारत सरकार ने FMR को समाप्त/कड़ा करने और भारत-म्यांमार सीमा पर फेंसिंग (बाड़) लगाने की घोषणा की, ताकि अवैध घुसपैठ और सुरक्षा चुनौतियों पर नियंत्रण किया जा सके।
इसके तहत क्या सुविधा थी?
सीमा पार रहने वाले लोग बिना वीजा यात्रा कर सकते थे।
पहले लगभग 16 किमी तक आने-जाने की अनुमति थी।
सीमावर्ती समुदाय पारिवारिक, सामाजिक और व्यापारिक गतिविधियां कर सकते थे।
भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी पर असर
भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी का उद्देश्य पूर्वोत्तर भारत को दक्षिण-पूर्व एशिया से जोड़ना और ASEAN देशों के साथ व्यापार, कनेक्टिविटी तथा रणनीतिक संबंधों को मजबूत करना है। लेकिन म्यांमार में जारी अस्थिरता और मणिपुर संकट ने इस नीति के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। भारत की कई महत्वपूर्ण परियोजनाएं, जैसे India-Myanmar-Thailand Trilateral Highway और Kaladan Multi-Modal Transit Transport Project, म्यांमार से होकर गुजरती हैं। म्यांमार में गृहयुद्ध, सैन्य संघर्ष और सुरक्षा संकट के कारण इन परियोजनाओं की गति प्रभावित हुई है। दूसरी ओर, मणिपुर और अन्य पूर्वोत्तर राज्यों में बढ़ती सुरक्षा चिंताओं ने सीमा पार व्यापार और लोगों की आवाजाही को भी प्रभावित किया है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भारत अपनी Act East Policy को उसी गति से आगे बढ़ा पाएगा, जैसी उसने कल्पना की थी?
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