रांची के मैक्लुस्कीगंज में थम गया रेल का पहिया, मुआवजे और नौकरी की मांग पर रैयतों का चक्का जाम
Ranchi News: रांची के मैक्लुस्कीगंज में नौकरी और उचित मुआवजे की मांग को लेकर रैयतों ने राजधर साइडिंग रेलवे लाइन जाम कर दी. हेसालौंग गंझूटोला के पास कोयला रैक रोककर धरना शुरू किया गया. रैयत विस्थापित मोर्चा ने मांगें पूरी होने तक आंदोलन और रेल परिचालन बाधित रखने की चेतावनी दी है. इससे जुड़ी खबर नीचे पढ़ें.
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गरीबी झेली, दर-दर भटके, अब बने 'एथलीट ऑफ द सेंचुरी':पिता ने छोड़ा, रंग पर झेले ताने; 1.4 बिलियन नेटवर्थ वाले 'किंग जेम्स' की संघर्ष कहानी
दुनिया के महानतम बॉस्केटबॉल खिलाड़ियों में शुमार लेब्रॉन जेम्स आज कॅरिअर के शिखर पर हैं, लेकिन उनका जीवन बड़े अभावों से भरा रहा है। हाल ही टाइम मैगजीन ने उन्हें कवर पेज पर स्थान देकर "एथलीट ऑफ सेंचुरी' बताया है। जानते हैं उनकी संघर्ष से सफलता की कहानी… "किंग जेम्स' के नाम से मशहूर लेब्रॉन को जीवन के संघर्ष जन्म से ही मिले। अमेरिका के एक्रोन शहर में 30 दिसंबर 1984 को जन्मे लेब्रॉन की मां ग्लोरिया जेम्स महज 16 साल की सिंगल मदर थीं। लेब्रॉन के जन्म से पहले ही उनके पिता परिवार छोड़ कर चले गए थे। ऐसे में उन्हें कभी भी पिता का प्यार नसीब नहीं हुआ। लेब्रॉन अपनी मां के साथ नानी के घर रहते थे। मां के पास आय का कोई साधन नहीं होने के कारण उनका बचपन अत्यंत गरीबी के हालात में गुजरा। संघर्ष - परवरिश के लिए मां ने दूसरों को सौंपा, नस्लभेद का शिकार भी बने जेम्स 5 साल के थे तो प्रशासन ने उनकी नानी का घर जर्जर बता कर गिरा दिया। मां-बेटे के पास कोई ठिकाना नहीं था। वे रिश्तेदारों, दोस्तों के घरों में रहते थे। 5 से 9 साल की उम्र में जेम्स और उनकी मां को एक दर्जन मकान बदलने पड़े। जेम्स ने एक साक्षात्कार में बताया कि चौथी कक्षा में वे सौ दिन तक स्कूल नहीं जा पाए। बेटे की परवरिश लायक पैसे नहीं थे तो मजबूरन मां ने नौ साल के जेम्स को अपने परिचित फुटबॉल कोच फ्रैंकी वॉकर को सौंप दिया। उन्हें कई वर्ष मां से दूर रहकर बिताने पड़े। करिअर में जेम्स को नस्लभेद भी झेलना पड़ा। मैदान में उनके रंग पर टिप्पणी की जाती थीं। 2017 में उनके घर की दीवारों पर नस्लभेदी शब्द लिखे गए। जेम्स ने सार्वजनिक बयान में कहा, आप भले ही कितने ही मशहूर हों, लेकिन अमेरिका में अश्वेत होना मुश्किल भरा है। शुरुआत - हाई स्कूल टूर्नामेंटों से बनी पहचान, एनबीए टीम का अनुबंध मिला कोच वॉकर ने जेम्स की कद-काठी देख कर उन्हें बॉस्केटबॉल से परिचित कराया। जल्द ही जेम्स स्कूल टीम से खेलने लगे। हाई स्कूल टूर्नामेंटों में उनका प्रदर्शन इतना दमदार रहा कि उन्हें तीन बार "ओहायो मिस्टर बॉस्केटबॉल' चुना गया। उनकी ख्याति ओर प्रदर्शन देख कर 2003 में क्लीवलैंड कैवेलियर्स टीम ने उनसे एनबीए के लिए पहला अनुबंध किया। सफलता - ओलंपिक और एनबीए खिताब जीते, गरीब बच्चों को देते हैं फ्री शिक्षा जेम्स तीन बार ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता टीम के कप्तान रहे हैं। चार एनबीए चैम्पियनशिप जीत कर वे ऑल टाइम लीडिंग स्कोरर बने हैं। जेम्स की सामाजिक संस्था आई प्रॉमिस स्कूल के जरिए गरीब बच्चों को फ्री शिक्षा और कॉलेज स्कॉलरशिप देती है। उनकी खुद की फिल्म निर्माण कंपनी है, जबकि कई स्पोर्ट्स ब्रांड के साथ उनके अनुबंध हैं। उनकी नेटवर्थ 1.4 बिलियन डॉलर बताई जाती है।






















