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कौन हैं गुरनूर बरार? 6,6,6,6…से टेस्ट मैच में मचाई सनसनी, श्रीलंका के गेंदबाजों की जमकर की धुनाई!

India vs Sri Lanka के वॉर्म-अप मैच में शानदार खेल दिखाने वाले गुरनूर बरार खूब सुर्खियां बटोर रहे हैं। दरअसल एक ही ओवर में चार छक्के लगाने वाले गुरनूर के अलग अंदाज को देखकर हेड कोच गौतम गंभीर भी मुस्कुराते और तालियां बजाते नजर आए। लेकिन गुरनूर बरार की कहानी सिर्फ इस विस्फोटक पारी तक सीमित नहीं है। लंबी कद-काठी वाले इस तेज गेंदबाज ने चोट, टीम से बाहर होने और लंबे इंतजार के बाद भारतीय टीम तक पहुंचने का रास्ता तय किया है।

गुरनूर बरार कौन हैं?

दरअसल गुरनूर बरार पंजाब के तेज गेंदबाज हैं, जिन्होंने कम उम्र में क्रिकेट को गंभीरता से अपनाया। करीब 6 फीट 5 इंच लंबाई की वजह से उन्हें गेंद को उछाल दिलाने और बल्लेबाजों को परेशान करने में खास फायदा मिलता है। उन्होंने करीब 15 साल की उम्र में क्रिकेट को अपना पूरा समय देना शुरू किया था। इससे पहले वह मोहाली में टेनिस बॉल क्रिकेट खेलते थे और किसी बड़ी क्रिकेट अकादमी से नियमित ट्रेनिंग नहीं लेते थे।

वहीं परिवार के सपोर्ट के बाद उन्होंने चैंपियंस क्रिकेट अकादमी में ट्रेनिंग शुरू की। बाद में तेज गेंदबाजी के विशेषज्ञ कोच वरिंदर सिंह के साथ काम किया। लगातार मेहनत के साथ उनकी रफ्तार और गेंद पर कंट्रोल बेहतर हुआ। शुरुआती दौर में वह करीब 135 किमी/घंटे की रफ्तार से गेंद डालते थे। इसके बाद उनकी फिटनेस, रन-अप और गेंदबाजी एक्शन पर काम किया गया, जिससे उनके खेल में बड़ा बदलाव देखने को मिला।

चोट से वापसी कर घरेलू क्रिकेट में किया धमाका

दरअसल गुरनूर बरार ने पंजाब की अंडर-23 टीम से अपनी पहचान बनानी शुरू की। विजय हजारे ट्रॉफी 2021-22 में उन्होंने सीनियर क्रिकेट में कदम रखा। इसके बाद रणजी ट्रॉफी में उनका डेब्यू भी यादगार रहा। रेलवे के खिलाफ मुकाबले में उन्होंने सिर्फ 16 रन देकर 4 विकेट लिए और पंजाब को बड़ी बढ़त दिलाने में अहम भूमिका निभाई। 2023 में चोटिल राज अंगद बावा की जगह उन्हें पंजाब किंग्स के साथ आईपीएल कॉन्ट्रैक्ट मिला। आईपीएल में उन्हें ज्यादा मौके नहीं मिले। लखनऊ सुपर जायंट्स के खिलाफ अपने पहले मैच में उन्होंने तीन ओवर गेंदबाजी की और 42 रन दिए। इसके बाद वह टीम से बाहर हो गए।

पीठ में स्ट्रेस फ्रैक्चर की समस्या सामने आई

वहीं इसी दौरान उनकी पीठ में स्ट्रेस फ्रैक्चर की समस्या सामने आई और वह 2023-24 के घरेलू सीजन से बाहर हो गए। यह दौर उनके करियर के लिए मुश्किल था, लेकिन उन्होंने वापसी की तैयारी शुरू कर दी। कोच वरिंदर सिंह के साथ करीब तीन महीने के खास ट्रेनिंग प्रोग्राम में उनकी गेंदबाजी तकनीक, फिटनेस और ताकत पर काम किया गया।

हालांकि इस मेहनत का असर 2024 में दिखा। शेर-ए-पंजाब टी20 कप में गुरनूर ने 22 विकेट लिए और टूर्नामेंट के सबसे ज्यादा विकेट लेने वाले गेंदबाज बने। इसके बाद 2024-25 रणजी ट्रॉफी में उन्होंने पंजाब के लिए 7 मैचों में 26 विकेट लेकर अपनी दावेदारी मजबूत की। इसी प्रदर्शन के बाद उनका नाम राष्ट्रीय स्तर पर भी गंभीरता से लिया जाने लगा।

गुजरात टाइटन्स से भारतीय टीम तक का सफर

वहीं गुरनूर की मेहनत का अगला बड़ा पड़ाव आईपीएल बना। नवंबर 2024 की मेगा नीलामी में गुजरात टाइटन्स ने उन्हें 1.3 करोड़ रुपए में खरीदा। टीम में अनुभवी तेज गेंदबाजों की मौजूदगी के कारण उन्हें लगातार खेलने का मौका नहीं मिला, लेकिन उन्होंने इस दौरान टीम के बड़े खिलाड़ियों से काफी कुछ सीखा। कैगिसो रबाडा और मोहम्मद सिराज जैसे गेंदबाजों के साथ रहना और आशीष नेहरा की देखरेख में ट्रेनिंग करना उनके लिए अहम रहा।

इससे पहले गुरनूर को भारतीय टीम के नेट्स में भी गेंदबाजी करने का मौका मिल चुका था। उन्होंने रोहित शर्मा और विराट कोहली जैसे बल्लेबाजों को गेंदबाजी की और गेंदबाजी कोच मोर्ने मोर्कल से भी काम करने का अवसर मिला। ऐसे अनुभवों ने उनके आत्मविश्वास को मजबूत किया। दरअसल अब चर्चा में आने की सबसे बड़ी वजह उनका श्रीलंका XI के खिलाफ वॉर्म-अप मैच का प्रदर्शन है। मुकाबले के दूसरे दिन भारत की पारी के आखिरी हिस्से में गुरनूर ने सिर्फ 18 गेंदों पर नाबाद 36 रन बना दिए। उन्होंने 4 छक्के और 2 चौके लगाए। उनका स्ट्राइक रेट 200 रहा।

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गुरु पूर्णिमा: भगवा ध्वज, हिंदुत्व और राष्ट्र निर्माण की अखंड चेतना

भारत केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि हजारों वर्षों से प्रवाहित एक जीवंत सांस्कृतिक राष्ट्र है। इसकी आत्मा वेदों, उपनिषदों, ऋषियों, संतों, महापुरुषों और गुरु-शिष्य परंपरा में बसती है। गुरु पूर्णिमा इसी अमर परंपरा का महापर्व है, जो हमें ज्ञान, संस्कार, सेवा और राष्ट्रधर्म के प्रति पुनः समर्पित होने की प्रेरणा देता है।

भारतीय जीवन-दर्शन में गुरु का स्थान सर्वोपरि है। गुरु केवल शिक्षा देने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि वह चेतना है जो मनुष्य के भीतर चरित्र, अनुशासन, आत्मविश्वास, कर्तव्यबोध और राष्ट्रभक्ति का प्रकाश प्रज्वलित करती है। गुरु ही व्यक्ति को स्वयं से ऊपर उठकर समाज और राष्ट्र के लिए जीने का मार्ग दिखाता है। यही कारण है कि हमारी संस्कृति में गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश के समान पूज्य माना गया है।

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने इस महान गुरु परंपरा को एक अनूठी और कालजयी अभिव्यक्ति दी है। संघ में किसी व्यक्ति विशेष को गुरु नहीं माना जाता, बल्कि भगवा ध्वज को गुरु के रूप में वंदन किया जाता है। इसका संदेश अत्यंत स्पष्ट और प्रेरक है-व्यक्ति सीमित होता है, किंतु आदर्श अमर होते हैं। भगवा ध्वज त्याग, तप, बलिदान, सेवा, शौर्य, आत्मसंयम और सनातन भारतीय संस्कृति की अखंड चेतना का प्रतीक है। यह प्रत्येक स्वयंसेवक को निरंतर स्मरण कराता है कि राष्ट्र सर्वोपरि है और व्यक्तिगत जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य समाज एवं मातृभूमि की सेवा है।

लगभग एक शताब्दी से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने सेवा, संगठन और राष्ट्रनिष्ठा की ऐसी परंपरा विकसित की है, जिसने भारत के सामाजिक जीवन पर गहरा प्रभाव छोड़ा है। 

प्राकृतिक आपदाओं में राहत कार्य, शिक्षा, ग्राम विकास, सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण, स्वास्थ्य सेवा और जनजागरण जैसे अनेक क्षेत्रों में स्वयंसेवकों की निस्वार्थ भागीदारी इस विचार को साकार करती है कि राष्ट्र निर्माण केवल विचारों से नहीं, बल्कि सतत सेवा और समर्पण से होता है।

हिंदुत्व का वास्तविक स्वरूप भी इसी सांस्कृतिक चेतना में निहित है। हिंदुत्व किसी संकीर्ण आग्रह का नाम नहीं, बल्कि भारत की सनातन सभ्यता, सांस्कृतिक निरंतरता और जीवन मूल्यों का व्यापक दर्शन है। यह सत्य, करुणा, सहअस्तित्व, समरसता, कर्तव्य, आध्यात्मिकता और लोकमंगल का मार्ग प्रशस्त करता है। "वसुधैव कुटुम्बकम्", "सर्वे भवन्तु सुखिनः" तथा "एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति" जैसे सनातन सूत्र इसी उदात्त दृष्टिकोण को अभिव्यक्त करते हैं।

राष्ट्रवाद भी केवल राजनीतिक अवधारणा नहीं, बल्कि मातृभूमि के प्रति आत्मीय श्रद्धा, सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण, नागरिक कर्तव्यों के निर्वहन और राष्ट्रहित को सर्वोच्च मानने का जीवन मूल्य है। जब समाज का प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्तव्य को राष्ट्रसेवा का माध्यम बना लेता है, तभी एक शक्तिशाली, आत्मनिर्भर और विकसित भारत का निर्माण संभव होता है।

आज भारत अपनी प्राचीन सांस्कृतिक धरोहर और आधुनिक विकास यात्रा को समान गति से आगे बढ़ा रहा है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में विकसित भारत का जो संकल्प देश ने लिया है, उसकी सफलता केवल आर्थिक प्रगति से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आत्मविश्वास, सामाजिक एकता, सेवा भाव और राष्ट्रीय चरित्र की मजबूती से सुनिश्चित होगी। गुरु पूर्णिमा हमें इसी राष्ट्रीय चेतना को अपने जीवन का आधार बनाने का संदेश देती है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने गुरुओं के प्रति कृतज्ञ रहें, भगवा ध्वज के आदर्शों से प्रेरणा ग्रहण करें, सनातन संस्कृति के जीवन मूल्यों को आत्मसात करें और राष्ट्रहित को व्यक्तिगत हितों से ऊपर रखते हुए समाज के अंतिम व्यक्ति तक सेवा का भाव पहुँचाएँ। यही सच्चे अर्थों में गुरु परंपरा का सम्मान है और यही भारत को पुनः विश्व के नैतिक एवं सांस्कृतिक नेतृत्व के शिखर पर स्थापित करने का मार्ग भी है।

आइए, गुरु पूर्णिमा के इस पावन अवसर पर हम सभी यह संकल्प लें कि सेवा हमारा संस्कार बने, समरसता हमारी पहचान बने और "राष्ट्र प्रथम" हमारा जीवन मंत्र बने। यही गुरु के प्रति सच्चा आदर, सम्मान होगा और यही एक सशक्त, समृद्ध, सांस्कृतिक तथा विकसित भारत के निर्माण की आधारशिला भी बनेगी।

- नंदन जैन 
भाजपा प्रदेश उपाध्यक्ष छत्तीसगढ़

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अनाहत सिंह ने भरी हुंकार, एशियन गेम्स में इस बार मेडल का रंग बदलना है पक्का

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