IND-A vs SL-A Final: वैभव सूर्यवंशी से उलझना श्रीलंका को पड़ा भारी, 11 गेंद में ठोकी तूफानी फिफ्टी, तोड़ा वर्ल्ड रिकॉर्ड
Vaibhav Sooryavanshi Fastest List-A Fifty: भारतीय क्रिकेट को एक और सुपरस्टार मिलने की आहट सुनाई देने लगी है। महज 15 साल के वैभव सूर्यवंशी ने श्रीलंका-ए के खिलाफ ट्राई सीरीज फाइनल में ऐसी बल्लेबाजी की, जिसने क्रिकेट रिकॉर्ड बुक को ही बदल दिया। युवा बल्लेबाज ने सिर्फ 11 गेंदों में अर्धशतक जड़कर लिस्ट-ए क्रिकेट के इतिहास का सबसे तेज अर्धशतक बनाने का विश्व रिकॉर्ड अपने नाम कर लिया। हालांकि, वो शतक बनाने से चूक गए।
वैभव ने 29 गेंद में 94 रन की पारी खेली। वैभव ने फाइनल में पिछले मुकाबलों की सारी कसर निकाल दी। उन्होंने 94 रन की इस पारी में 8 छक्के और 10 चौके मारे। यानी 94 में से 88 रन तो वैभव ने सिर्फ बाउंड्री से हासिल किए। बता दें कि इसी ट्राई सीरीज में एक मुकाबले के दौरान वैभव का श्रीलंकाई खिलाड़ी से विवाद हो गया था। नौबत हाथापाई तक की आ गई थी और फाइनल में वैभव ने तूफानी पारी खेल श्रीलंका को अपनी ताकत का अंदाजा करा दिया।
वनडे में सबसे तेज अर्धशतक का रिकॉर्ड दक्षिण अफ्रीका के पूर्व बैटर एबी डिविलियर्स के नाम है, जिन्होंने 2015 में वेस्टइंडीज के खिलाफ 16 गेंदों में ये उपलब्धि हासिल की थी। हालांकि, इंडिया-ए के मुकाबलों को इंटरनेशनल दर्जा नहीं मिलता है, इसलिए वैभव की यह पारी अंतरराष्ट्रीय रिकॉर्ड में शामिल नहीं होगी।
????VAIBHAV SURYAVANSHI WITH ICONIC BATTING????
— Ajay Jadeja (@AjayJadeja171) June 21, 2026
Vaibhav Sooryavanshi got trolled after the Super over, but today in the Finals, he not only broke the world record of fastest List A fifty, but also smashed 94 in just 28 balls????
Now, trollers can cry harder????pic.twitter.com/pI9LoKxH0j
दांबुला के रंगिरी इंटरनेशनल स्टेडियम में खेले गए फाइनल में श्रीलंका-ए ने पहले गेंदबाजी का फैसला किया। इसके बाद बल्लेबाजी के लिए उतरे वैभव ने पहली ही गेंद से अपने इरादे साफ कर दिए। उन्होंने मोहम्मद शिराज की पहली गेंद पर चौका लगाकर आक्रमण की शुरुआत की और फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा।
This is how you reply with the bat!
— Abhi (@AbhiMSD_07) June 21, 2026
Well played Vaibhav ????pic.twitter.com/nc53cEyHgW https://t.co/WN2PFQEdpH
फाइनल से पहले वैभव का प्रदर्शन कुछ खास नहीं रहा था। लगातार कम स्कोर और हाल ही में विपक्षी खिलाड़ी के साथ हुई धक्का-मुक्की की घटना के कारण वह चर्चा में थे। लेकिन बड़े मुकाबले में उन्होंने अपने बल्ले से सभी आलोचनाओं का जवाब दे दिया।
वैभव ने शिराज के दूसरे ओवर में तो तूफान ही ला दिया। इस ओवर में उन्होंने तीन छक्के और दो चौके लगाए और कुल 26 रन बटोरे। इसके बाद उन्होंने लॉन्ग ऑन के ऊपर अपना पांचवां छक्का जड़ते हुए सिर्फ 11 गेंदों में अर्धशतक पूरा कर लिया।
11 ball 50 runs for Vaibhav Sooriyavanshi in the A team Tri series Final against Sri Lanka. All 50 runs came in Boundaries for Vaibhav Sooriyavanshi. #SLAVINDA pic.twitter.com/ohoW8ZGnv1
— Nibraz Ramzan (@nibraz88cricket) June 21, 2026
गेंद के लिहाज से लिस्ट-ए क्रिकेट की सबसे तेज फिफ्टी
| गेंद | खिलाड़ी | टीम | साल |
| 11 | वैभव सूर्यवंशी | India-A | 2026 |
| 12 | के वीरारत्ने | Ragama Cricket Club v Kurunegala Youth Cricket Club | 2005/06 |
| 13 | एनएलटीसी परेरा | Sri Lanka Army Sports Club v Bloomfield Cricket and Athletic Club | 2020/21 |
| 14 | आरके क्लेनवेल्ट | Western Province v KwaZulu-Natal | 2010/11 |
| 15 | एडम होलियोक | Surrey v Yorkshire | 1994 |
इस पारी के साथ वैभव ने 20 साल पुराना विश्व रिकॉर्ड तोड़ दिया। इससे पहले श्रीलंका के कौशल्या वीररत्ने के नाम लिस्ट-ए क्रिकेट का सबसे तेज अर्धशतक था, जिन्होंने 12 गेंदों में यह कारनामा किया था। अब यह रिकॉर्ड भारतीय बल्लेबाज के नाम दर्ज हो गया।
वैभव ने भारत का रिकॉर्ड भी अपने नाम कर लिया। इससे पहले सबसे तेज लिस्ट-ए अर्धशतक का भारतीय रिकॉर्ड सरफराज खान के नाम था, जिन्होंने विजय हजारे ट्रॉफी में पंजाब के खिलाफ 15 गेंदों में फिफ्टी लगाई थी। दिसंबर 2024 में लिस्ट ए क्रिकेट में डेब्यू करने वाले वैभव अब तक केवल 12 मैच खेले हैं। लेकिन कम समय में ही अपनी छाप छोड़ चुके हैं। घरेलू क्रिकेट में बिहार के लिए खेलते हुए वह 190 रन की शानदार पारी भी खेल चुके हैं।
फाइनल से पहले तक वैभव ने ट्राई सीरीज में अपने नाम के हिसाब से प्रदर्शन नहीं किया था। वो 4 मुकाबलों में 117 रन ही बना सके थे। लेकिन फाइनल में उन्होंने सारी कसर निकाल दी।
Father's Day 2026: पापा के नाम भावुक पत्र, ‘आपकी सीख ही मेरी सबसे बड़ी विरासत है’
Father's Day 2026: 18 मई 2021 को 84 सालों के एक बेहतरीन सफ़र पर पूर्णविराम लग गया। चंद पलों में एक सशक्त व्यक्तित्व यादों में तब्दील हो गया। कोई नहीं जानता कि कब किसके साथ आपका आख़िरी पल है।
इस दिन मैंने सिर्फ़ अपने पिता को नहीं खोया, बल्कि एक दोस्त, एक गाइड, एक प्रेरणा, एक संबल, एक भरोसा, एक आत्मविश्वास, एक जज़्बा और एक मनोबल को भी खोया।
कहते हैं, एक बेटी अपने पिता के दिल के सबसे क़रीब होती है। लेकिन मैं शायद उनके दिल का एक ऐसा अहम हिस्सा थी कि न जाने कैसे वे बिना देखे, सिर्फ़ फ़ोन पर “हेलो” से मेरे मन को समझ जाते थे। अगर कभी मन बेचैन हो या किसी बात से उदास हो, तो “हेलो” सुनते ही पूछते थे—“बेटा, क्या बात है? आज तबीयत नरम है?”
चाहे आप कितना भी अपने भावों को ढकने की कोशिश करें, लेकिन वे कुरेदकर बात उगलवा ही लेते थे। और उनके आगे मन को खाली कर जो सुकून मिलता था, उसे सिर्फ़ महसूस किया जा सकता था।
बचपन से लेकर आज तक के ढेरों पल मानो एक फ़िल्म की तरह आँखों के सामने चल रहे हों। हर मुस्कुराहट, ठहाका, सीख, उम्मीद और विश्वास—कितना ख़ूबसूरत था वह सब।
मिस्टर जी. एस. चौहान—यह नाम और उनका जीवन अपने आप में एक मिसाल रहा है। जिस जीवन-संघर्ष में अपने आत्मसम्मान के साथ उन्होंने विजय पाई थी, वह हर किसी के लिए आसान नहीं था। दो साल की उम्र में अपनी माँ को खोना, 16 साल की उम्र से अपनी तालीम ख़ुद अपने दम पर पूरी करना और जीवन में एक ऊँचा मुक़ाम हासिल करना—ऐसे न जाने कितने ही किस्से हैं, जो उनके जीवन को प्रेरणा की मिसाल बनाते हैं।
अपने जीवन के सार और अनुभवों से जो कुछ उन्होंने सिखाया था, वह हमेशा काम आया। उनकी सीख एक ऐसी “Quotation Book” की तरह है कि जब कभी किसी कश्मकश में फँस जाओ, तो उसमें उसका हल ज़रूर मिल जाता है।
किस तरह विपरीत परिस्थितियों में, संघर्षों में टूटकर बिखरने की बजाय पूरी मुस्तैदी से उनका सामना करना है, और फिर चाहे आप उन मुश्किल पलों में अकेले ही क्यों न हों, हिम्मत और ख़ुद पर भरोसा कभी नहीं छोड़ना—यह एक ऐसी सीख थी जो अमूल्य थी। हम बातों को सुनते और पढ़ते तो बहुत हैं, लेकिन जीवन में उन मुश्किल पलों को जब जीते हैं, तभी असली परीक्षा होती है।
उनका यूँ अचानक जाना और उसके बाद संभलना मेरे जीवन का कठिनतम दौर था। लेकिन मैंने उनकी उपस्थिति हर पल महसूस की। पता नहीं कहाँ से इतनी हिम्मत और ठहराव आया, मानो वे जाते-जाते अपनी सीखों और परवरिश की परीक्षा लेना चाहते थे। मुझे उम्मीद है कि शायद मैंने आपको निराश नहीं किया, पापा।
यह सोचकर भी मन भर आता है कि अब वे बातें, वे मुलाकातों का वक़्त सिर्फ़ यादों में ही सीमित होगा। अजीब-सा एहसास है कि आज फादर्स डे पर पापा को विश करने के बजाय उनकी स्मृतियों से बातें हो रही हैं। वैसे तो माता-पिता के लिए कोई दिन तय नहीं होता, उनके होने से ही हमारा वजूद है।
पूरे छह वर्ष हो गए जब आप शारीरिक रूप से हमारे पास नहीं हैं, लेकिन एक पल को भी नहीं लगा कि आप नहीं हैं। मानो आप हमारे साथ हैं। और अब तो मम्मी भी आपके पास चली गईं। सिर्फ़ दो महीने हुए हैं, लेकिन लगता है कि आप लोग हमेशा की तरह साथ रहेंगे। आज हरिवंश राय बच्चन जी की कविता “माता-पिता कहीं नहीं जाते...” की गहराई समझ पा रही हूँ।
समय ने कैलेंडर के पन्ने बदल दिए, लेकिन आपके जाने से जो खालीपन बना था, वह आज भी वैसा ही है। फ़र्क बस इतना है कि अब उस खालीपन के साथ जीना सीख लिया है।
पापा का कहा एक वाक्य हमेशा मेरे ज़हन में ताज़ा रहता है—
“इंसान के रूप में इस दुनिया में आए हो तो कुछ ऐसा करो कि ख़ुद गर्व कर सको, वरना जीते तो कीड़े और जानवर भी हैं।”
और अब तो माँ भी आपके पास चली गई हैं।
कभी-कभी सोचती हूँ, जिन दो लोगों की छाँव में मैंने दुनिया को समझना सीखा, आज वही दोनों आँखों से ओझल हैं। घर आज भी वही है, दीवारें भी वही हैं, लेकिन उनके अर्थ बदल गए हैं। अब किसी कमरे से आपकी आवाज़ नहीं आती, माँ की पुकार नहीं सुनाई देती। फिर भी अजीब बात है कि आप दोनों की उपस्थिति पहले से कहीं ज़्यादा महसूस होती है।
पापा, आप सिर्फ़ जीना नहीं सिखाकर गए, आपने सिखाया कि कैसे जीना है।
आत्मसम्मान के साथ जीना, सच्चाई और ईमानदारी के साथ खड़े रहना, विपरीत परिस्थितियों में टूटना नहीं बल्कि और मज़बूत होकर उभरना, अपने निर्णयों की ज़िम्मेदारी लेना और सबसे बढ़कर, दुनिया कुछ भी कहे, अपने भीतर के विश्वास को कभी न खोना।
आप जाते-जाते भी सिखा गए कि इंसान की सबसे बड़ी ताकत उसके बाहर नहीं, उसके चरित्र में होती है। जब जीवन ने मुझे आपके जाने का दुःख दिया, तब समझ आया कि आपकी सीख केवल शब्द नहीं थी, वह मेरे व्यक्तित्व की नींव बन चुकी थी। शायद यही कारण है कि हर मुश्किल घड़ी में मैं गिरती तो हूँ, रोती भी हूँ, लेकिन टूटती नहीं। क्योंकि मेरे भीतर आपका साहस है, आपकी परवरिश है, आपका विश्वास है।
कई बार बहुत मन करता है कि बस एक बार फ़ोन उठाऊँ और आपसे कहूँ—
“पापा, आज मन थोड़ा भारी है...”
और फिर उसी पल एहसास होता है कि अब आपके नम्बर पर घंटी नहीं बजेगी, लेकिन मेरी हर ख़ामोशी अब भी आप तक पहुँच जाती होगी।
पहले मैं आपकी बेटी थी, फिर आपकी सीखों की ज़िम्मेदारी बनी, और अब मैं आपकी विरासत हूँ। शायद यही आपकी सबसे बड़ी देन है कि आपने मुझे ऐसा बनाया कि आपके न होने पर भी मैं आपके होने का प्रमाण बन सकूँ।
आज फादर्स डे पर आपको याद करते हुए दुःख तो बहुत होता है, लेकिन उससे कहीं ज़्यादा गर्व होता है कि मुझे आपका सान्निध्य मिला। आप और माँ दोनों अब इस संसार में नहीं हैं, पर मेरे हर निर्णय में, हर साहस में, हर मुस्कान में और हर संघर्ष में आप दोनों जीवित हैं।
आप जाते-जाते भी बहुत कुछ सिखा गए, पापा—कि प्रेम कभी समाप्त नहीं होता, रिश्ते मृत्यु से नहीं टूटते, और माता-पिता अपने बच्चों को छोड़कर कहीं नहीं जाते, वे बस उनके भीतर बस जाते हैं।
ज़िंदगी को अब और सही मायनों में सार्थक बनाने के लिए हर कोशिश आपको सच्ची श्रद्धांजलि होगी। आप हर वक़्त मेरे साथ हैं, इसका एहसास मुझे खुली आँखों से भी होता है।
मैं आज भी वही हूँ—आपकी बेटी, जिसे आपने आत्मसम्मान से जीना सिखाया, और जो हर दिन कोशिश करती है कि ऐसा जीवन जिए, जिसे देखकर आप दोनों कह सकें- “हमें तुम पर गर्व है।”
लव यू पापा... और माँ, आप भी हमेशा मेरे साथ हैं।
— डॉ. कीर्ति सिसोदिया
होम
जॉब
पॉलिटिक्स
बिजनेस
ऑटोमोबाइल
गैजेट
लाइफस्टाइल
फोटो गैलरी
Others 
Haribhoomi