झारखंड राज्यसभा चुनाव में बड़ा उलटफेर,एनडीए समर्थित परिमल नाथवानी जीते,कांग्रेस उम्मीदवार प्रणव झा की करारी हार
रांची: झारखंड से राज्यसभा चुनाव को लेकर एक बहुत बड़ी खबर सामने आ रही है। राज्य की दो राज्यसभा सीटों के लिए हुए बेहद दिलचस्प और हाई-प्रोफाइल मुकाबले में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और एनडीए (NDA) समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवानी ने शानदार जीत दर्ज की है। वहीं दूसरी ओर, विपक्षी ‘इंडिया’ (INDIA) गठबंधन के …
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हेमंत सोरेन को NDA विधायक ने दिया चौंकाने वाला ऑफर! ‘कांग्रेस को करें सत्ता से बाहर, हमारे साथ बनाएं सरकार’
झारखंड की राजनीति में उस समय हलचल बढ़ गई, जब हाल ही में हुए राज्यसभा चुनाव के नतीजों ने न सिर्फ सत्तारूढ़ महागठबंधन के अंदर के मतभेद सामने ला दिए, बल्कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के सामने एक अप्रत्याशित राजनीतिक प्रस्ताव भी रख दिया। इन चुनावों में हुई क्रॉस वोटिंग के कारण कांग्रेस को बड़ा झटका लगा है, जिससे राज्य की राजनीति में नए समीकरणों और संभावनाओं की चर्चा तेज हो गई है।
दरअसल इन राज्यसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवानी ने शानदार जीत हासिल की, जबकि कांग्रेस के उम्मीदवार प्रणव झा को हार का सामना करना पड़ा, जिससे पार्टी को बड़ी निराशा हुई। वहीं, झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) के बैद्यनाथ राम अपनी सीट जीतने में सफल रहे, जो महागठबंधन के लिए राहत की बात रही। राज्य की दो राज्यसभा सीटों के लिए कुल तीन उम्मीदवार मैदान में थे और इन नतीजों ने राजनीतिक जानकारों के कई अनुमान गलत साबित कर दिए, जिससे राज्य की राजनीति को लेकर कई सवाल खड़े हो गए हैं।
कांग्रेस को सरकार से बाहर करने का ऑफर
वहीं नतीजों के तुरंत बाद राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के प्रमुख विधायक सरयू राय ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को एक चौंकाने वाला राजनीतिक प्रस्ताव दिया। सरयू राय ने खुलकर कहा कि हेमंत सोरेन को कांग्रेस को सरकार से बाहर कर देना चाहिए और एनडीए के साथ मिलकर सरकार चलानी चाहिए। राय ने यह भी दावा किया कि महागठबंधन में अब बड़ी दरार आ चुकी है और यह कभी भी टूट सकता है। उन्होंने मुख्यमंत्री को बिना भाजपा और बिना कांग्रेस के सरकार चलाने का सुझाव दिया। साथ ही कहा कि एनडीए समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार की जीत पहले से तय थी, जो क्रॉस वोटिंग के आंकड़ों से भी साफ दिखाई देता है।
झारखंड में सरकार का गणित समझिए
दरअसल अब सवाल उठता है कि क्या झारखंड में बिना कांग्रेस और भाजपा के सरकार बनाना राजनीतिक रूप से संभव है? राज्य विधानसभा में कुल 81 सीटें हैं और सरकार बनाने के लिए 41 विधायकों का समर्थन चाहिए। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा के पास अभी 34 विधायक हैं। ऐसे में बिना कांग्रेस और भाजपा के सरकार चलाने के लिए उन्हें सात और विधायकों की जरूरत होगी। अगर राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के चार, भाकपा (माले) के दो और सरयू राय के एक वोट को जोड़ दिया जाए, तो हेमंत सोरेन 41 के जरूरी आंकड़े तक पहुंच सकते हैं और अपनी सरकार बिना कांग्रेस या भाजपा के चला सकते हैं। इससे सरयू राय का प्रस्ताव एक संभावित विकल्प बन जाता है।
गठबंधन पर भी पड़ सकता है असर
वहीं राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस की अप्रत्याशित हार के बाद सत्तारूढ़ महागठबंधन के अंदर की खींचतान खुलकर सामने आ गई है। झारखंड कांग्रेस प्रभारी के राजू ने इस हार पर चिंता जताते हुए कहा कि इसका असर गठबंधन पर भी पड़ सकता है। उन्होंने साफ आरोप लगाया कि कांग्रेस की हार इसलिए हुई क्योंकि उनके अपने सहयोगियों ने उन्हें वोट नहीं दिया। के राजू ने खास तौर पर राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) और भाकपा (माले) पर पार्टी को धोखा देने का आरोप लगाया, जिसके कारण कांग्रेस उम्मीदवार चुनाव हार गए। ये आरोप महागठबंधन की एकजुटता पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं और भविष्य में इसके बने रहने पर भी असर डाल सकते हैं।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि सरकार में शामिल होने के बावजूद कांग्रेस को इस चुनाव में हार क्यों मिली? झारखंड विधानसभा में कुल 81 विधायक हैं और एक राज्यसभा सीट जीतने के लिए पहली पसंद के 28 वोट चाहिए होते हैं। महागठबंधन के पास कुल 56 विधायकों का समर्थन था, जिसमें से झारखंड मुक्ति मोर्चा के बैद्यनाथ राम अपनी सीट जीत गए। जेएमएम की जीत के बाद महागठबंधन के पास कांग्रेस उम्मीदवार के लिए 28 वोट बचने चाहिए थे, लेकिन कांग्रेस उम्मीदवार प्रणव झा को केवल 20 वोट ही मिले, जो साफ तौर पर क्रॉस वोटिंग की ओर इशारा करता है। दूसरी ओर, एनडीए के पास कुल 24 विधायक होने के बावजूद उनके समर्थित उम्मीदवार को 28 वोट मिले, जिससे यह साफ होता है कि महागठबंधन के कुछ वोट एनडीए के खाते में चले गए। इस चुनाव में तीन वोट रद्द भी हुए, जिनमें भाजपा के दो और कांग्रेस का एक वोट अमान्य पाया गया। इन सभी घटनाओं के बीच परिमल नाथवानी तीसरी बार झारखंड से राज्यसभा के लिए चुने गए हैं, जो राज्य की बदलती राजनीतिक तस्वीर का साफ संकेत माना जा रहा है।


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